जब बादशाह अकबर का जन्म हुआ जन्म के कुछ दिनों बाद ही उसकी माँ चल बसी। उस समय अकबर दूध के अलावा कुछ भी खाते पीते नहीं थे। अब उन्हे दूध कहा से मिले तब महल मे एक दासी काम करती थी जिसका बच्चा भी अकबर के उम्र का था। अकबर के पिता ने उसे अकबर को दूध पिलाने को कहा तो वह मान गई।  दासी अपने लड़के और अकबर दोनों को एक साथ दूध पिलाती थी।

उस दासी ने अपने बेटे का नाम युसुफ रखा था। अकबर और युसुफ एक ही माँ का दूध पीते थे, जिस वजह से उन दोनों का रिस्ता दूध – भाई का था। साथ में रहने के कारण अकबर का युसुफ की तरफ झुकाव था।

अब समय की दौड से कौन बच पाया हैं। दोनों बड़े हो गए अकबर  के पिता भी गुजर गए उनकी गद्दी में अकबर को बैठाया गया। अकबर अब बादशाह बन गया। लेकिन एक गरीब की किस्मत में यह सुख कहा युसुफ तो एक मामूली सा सिपाही भी नहीं बन पाया। युसुफ ने अपना पेट भरने के लिए कोई भी अच्छा या बुरा काम करने को तैयार हो जाता। धीरे-धीरे उसे जुआ खेलने की लत लग गई। अब वह जुआ खेलता और जो पैसा जीतता उसे उड़ा देता पहले तो वह खुश हुआ, कि बिना मेहनत के पैसे मिल जाते हैं। कुछ दिनों बाद वह जुए मे लगातार हारता रहा उसके खाने के लाले पड़ गए। गली गली भीख मागने लगा। तब कुछ स्थानीय लोगो ने उसे बादशाह के पास जाने कि सलाह दी।

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युसुफ को लोगो कि सलाह अच्छी लगी, वह अकबर के पास जाने को तैयार हो गया।

युसुफ जब अकबर के पास जा रहा था,तब उसके मन मे कई सवाल थे। जैसे कि वह इतने बड़े राजा है। वह मुझे पहचानेगे कि नहीं, वे मेरी सहायता करेंगे की नहीं? 

लेकिन जब युसुफ दरबार में अकबर के सामने उपस्थित हुए, तो बादशाह उसे देखते ही, युसुफ को गले लग लिया। बहुत दिनों बाद युसुफ को देख कर अकबर के आंखो से खुशी के आँसू निकल आए। लोगो को देखने में ऐसा प्रतीत हुआ जैसा अकबर अपने सगे भाई से मिल रहे हो। अकबर ने युसुफ कि हर परेशानी को दूर कर दिया उसकी गरीबी को मिटा दिया।

अकबर युसुफ को अपना दरबारी बना लिया। उसके लिए अच्छा सा घर दिया,सारी सुविधाए दी। घोडा गाड़ी, महीने में बेतन भी किया करते थे। युसुफ को अब कोई समस्या नहीं थी। हँसी खुसी से जीवन बीत रहा था।

‘एक दिन बादशाह ने युसुफ से पूछा तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं है। अगर कोई भी चीज कि आवश्यकता हो तो बिना किसी संकोच के बताना। मैं उन्हे पूरी करुगा।

युसुफ ने बादशाह से कहा जी हुजूर, “आपने जो हमारे लिए किया  है वह बहुत है आपने मुझे राजसी जिंदगी दी। इतनी ज्यादा इज्जत दी, जिसके काबिल तक मैं नहीं था। सर ऊंचा करके जीने कि वजह दी अब इससे ज्यादा क्या चाहिए। आज मैं बहुत खुश किस्मत इंसान हु, जो आप का हाँथ मेरे सर पर हैं। यह तो मेरे लिए गर्व कि बात है कि इतना बड़ा सम्राट मेरे जैसे गरीब को अपना भाई मानता है। बस कुछ नहीं चाहिए, अब एक ही ख्वाइस हैं, हुजूर कि जिस तरह से बीरबल आप का सलाहकार हैं। अगर कोई उन्ही कि तरह मुझे भी कोई सलाह देता।”

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अकबर ने मन में कहा युसुफ मैं तुम्हारी इस चाह को भी अवश्य ही पूरा करुगा। अकबर ने बीरबल से कहा बीरबल देखो, “युसुफ मेरे भाई जैसा है। मैंने उसे सारे सुख दिए हैं, उसकी सारी इच्छा पूरी कि हैं। बस उसकी एक आखिरी इच्छा हैं ,एक तुम्हारे जैसे सलाहकार कि। मैं चाहता हूँ उसकी सारी इच्छा पूरी हो। तो इसलिए तुम अपने जैसा ही सलाहकार लाओ युसुफ के लिए। समझ गए तुम, मेरी बात को ना।”

बीरबल को बादशाह कि बात ज्यादा समझ में नहीं आई। क्योकि युसुफ में एसी कोई काबिलियत नहीं थी। जो कि उसे सलाहकार कि जरूरत हो। लेकिन बादशाह के हुक्म का पालन तो करना जरूरी था।  “जी हुजूर !” बीरबल बोले , “आप जो चाहते हैं वही होगा मैं ऐसा सलाहकार लाउगा जो कि मेरे भाई कि तरह ही होगा।”

“ठीक हैं।” अकबर बोले।

बीरबल सोच में पड़ गया, आखिर कहा से लाऊं अपने जैसा सलाहकार। आखिर हुजूर को उसकी यह माग को नहीं मानना था। वह तो खुद किस्मत वाला हैं, हुजूर उसको अपना भाई मानते हैं। हुजूर ने उसके लिए सब कुछ तो किया हैं। इतनी ऐशो-आराम भारी जिंदगी दी हैं। अब ऊपर से उसे एक सलाहकार चाहिए। बीरबल को युसुफ कि यह बात सही नहीं लगी। अकबर बीरबल को बहुत चाहते थे।बीरबल भी अकबर को बहुत मानता था। परंतु युसुफ मे ऐसा कुछ नहीं था।  बीरबल सोच में था कि इस समस्या से कैसे निकला जाए। तभी पास के एक पशुशाला में सांड़ के चिल्लाने कि आवाज सुनाई पड़ी । बीरबल के दीमाग में घंटी बजी उसे उसके भाई जैसा सलाहकार मिल गया।

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दूसरे दिन बीरबल उस सांड़ को अपने साथ महल मे लेकर अकबर के सामने पेश हुआ।

“अकबर ने सांड को देख कर बीरबल से सवाल किया तुम इसे महल में लेकर क्यो आए हो,  बीरबल ?’

तब बीरबल ने जबाब दिया कि – ‘हुजूर’ यह मेरा भाई है, “हम दोनों ने एक ही मां का दूध पीया हैं….गऊ माता का दूध। इसलिए यह सांड़ मेरे भाई जैसा है…दूध-भाई। यह बोलता भी कम है। जो इसकी भाषा समझ लेता है, उसे यह अच्छी सलाह  देता है। इसे युसुफ को दे दें, मेरे जैसा सलाहकार पाने की उसकी इच्छा पूरी हो जायगी।”

बीरबल का यह उत्तर सुनकर अकबर को अपनी गलती का अहसास हुआ। तब उन्हें लगा कि  उन जैसा कोई दूसरा नहीं, वैसे ही बीरबल भी एक ही है।