1- मूर्ख शिष्य को पढाने से , दुष्ट औरत को पालने से और दुखी लोगो के साथ मित्रता करने से, ज्ञानी व्यक्ति भी पीड़ा पता हैं।

2- जवाब देने वाला नौकर, साँप वाले घर मे रहने से, मूर्ख मित्र का संगत, दुष्ट स्त्री इन सबको मृत्यु का दूसरा रूप कहा गया हैं।

3- जिस देश मे आपका आदर ना हो, आपका बंधु वहाँ न रहता हो, जीविका का कोई साधन न हो, विद्या का महत्व न हो, उस देश को जितनी जल्दी हो छोड़ देना चाहिए।

4- जिस स्थान मे ज्ञानी, धनिक, राजा, नदी और वैद्य न हो ऐसी स्थान मे एक दिन भी वास नहीं करना चाहिए।

5- काम मे लगाने पर सेवक की, विधवा होने पर स्त्री की, विपत्ति मे मित्र की और दुख मे भाई की परीक्षा हो जाती हैं।

6- जो निश्चित वस्तु को छोड़ कर, अनिश्चित की सेवा करता हैं, उसकी निश्चित वस्तुयों का नाश हो जाता हैं।

7- बुद्धिमान कुल की स्त्री अगर कुरूप हैं तब भी जीवन संगनी उसे ही चुने, दुष्ट स्त्री अगर सुंदरी हैं, तब भी उससे दूर रहे, वह मृत्यु तुल्य हैं।

8- नदियो का, शस्त्र धारियो का, नाखून वाले, नोकीले दाँत वाले और सींघ वाले जन्तुओ का, दुष्ट स्त्री का और राजपरिवार का कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए।

9- पुरुषो की तुलना मे महिलाओ का आहार दोगुना, लज्जा चार गुना , साहस छह गुना और काम आठ गुना होता हैं।

10- कुमित्र पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए, इसके अलावा मित्र जितना भी भरोसे वाला हो उस पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिस दिन वो नाराज होगा, उस दिन वह आपकी सभी निजी बाते प्रसिद्ध कर देगा।

11- मन मे सोचे कार्य को कभी भी बोल कर उजागर न करे, गुप्त रूप से उस पर काम करे। एक दिन उस कार्य की सफलता ही आपको प्रसिद्ध करेगी।

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12- जिस माता और पिता ने अपने पुत्र को नहीं पढ़ाया, वह अपने पुत्र के दुश्मन समान होते हैं, क्योंकि वह किसी बीच सभा मे कोयलो के बीच कौए की तरह दिखेगा।

13- प्यार से दोष आता हैं, इस लिए पुत्र और शिष्य के प्रति कठोर होना उचित हैं।

14- अपने जनो से अनादर, युद्ध से बचा शत्रु, बुरे राजा कि सेवा, गरीबी, अविवेकी लोगो की सभा करना ये बिना चेतावनी तन और मन को जलाती रहती हैं।

15- नदी के किनारे के पेड़, दूसरे के घर मे जाने वाली स्त्री, बिना मंत्री का राजा, शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।

16- वैश्या गरीब पुरुष को, जनता शक्तिहीन राजा को, पक्षी फल रहित वृक्ष को और अतिथि भोजन कर के घर को छोड़ देते हैं।

17- इंसान के आचरण से कुल की, बोली से देश की और शरीर से आहार की पहचान होती हैं।

18- कन्या को अपने से श्रेष्ठ कुल मे देना चाहिए, संतान को विद्या मे लगाना चाहिए, शत्रु को संघार करना चाहिए और मित्र को धर्म का उपदेश करना चाहिए।

19- दुर्जन और साँप मे अगर चुनाव करना हो तो साँप अच्छा क्योंकि, साप संकट आने पर काटेगा, लेकिन दुर्जन पग पग मे काटेगा।

20- समुद्र प्रलय के समय अपनी मर्यादा को छोड़ देते हैं परंतु साधुलोग प्रलय काल मे भी अपनी मर्यादा को नहीं  छोड़ते हैं।

21- गायको की सोभा उनका स्वर हैं, स्त्री की सोभा उनका चरित्र हैं, कुरूप की सोभा उनका ज्ञान हैं और तपस्वियों की सोभा उनकी क्षमा हैं।

22- कुल की रक्षा के लिए एक जन का त्याग, ग्राम की रक्षा के लिए एक कुल का त्याग, देश के लिए एक ग्राम का त्याग भी देना पड़े तो उचित हैं।

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23- उपाय करने वाले गरीब नहीं रहते, जप करने वालों मे पाप नहीं रहता, चुप रहने से कलह नहीं होता और जागने वालों को भय नहीं होता।

24- अति सुंदर होने से सीता माँ का अपहरण हुआ, अति गर्व की वजह से रावण का नाश हुआ और अति दान की बजह से बलि को बंधना पड़ा। इसलिए अति हर जगह निषेध हैं।

25- पुत्र को पाँच वर्ष होने तक प्यार करे, 16 वर्ष होने तक ताड़न करे और 16 वर्ष होने के बाद मित्र की तरह व्यवहार करे।

26- बुरे देश मे वास, बुरे कुल की सेवा, खराब खाना, लड़ाकू औरत, मूर्ख संतान और विधवा पुत्री हर समय शरीर को कष्ट देती हैं।

27- बिना अभ्यास के पढ़ाई, बिना पचे भोजन, दरिद्रों की संगत और बूढ़ो को युवती विष के समान होती हैं।

28- दया रहित धर्म को छोड़ देना चाहिए, विद्या विहीन गुरु का त्याग कर देना चाहिए, जो पत्नी हमेशा क्रोध मे रहे उसे अलग हो जाना चाहिए, बिना प्रेम के संबंध को खत्म कर देना चाहिए।

29- घिसना, काटाना, पीटना और तपाना इन चार प्रकारो से स्वर्ण की परीक्षा की जाती हैं ठीक उसी प्रकार से दान, शील, गुण और आचरण से पुरुष की परीक्षा होती हैं।

30- तब तक ही भय से डरना चाहिए जब तक भय आया न हो और आए हुये भय को देखकर उस पर प्रहार करने को उचित बताया गया हैं।

31- मूर्ख लोग ज्ञानी पुरुष से , विधवा औरते सुहागिन औरतों से, व्यभिचारिणी स्त्री कुलीन औरतों से, गरीब लोग धनी लोग से हमेशा ईर्षा करते हैं।

32- आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती हैं, बिना सेनापति के सेना नष्ट हो जाती हैं, दूसरे के हाथ मे धन जाने से धन निरर्थक हो जाता हैं।

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33- दान से दरिद्रता का नाश होता हैं, उदारता से दुर्गति का और शिक्षा से अज्ञानता और भय का नाश होता हैं।

34- काम से बड़ा कोई रोग नहीं, अज्ञान से बड़ा कोई बैरी नहीं, क्रोध से बड़ा कोई अग्नि नहीं और ज्ञान से बड़ा कोई सुख नहीं हैं।

35- विदेश मे शिक्षा से बड़ा कोई मित्र नहीं, घर मे पत्नी से बड़ा कोई मित्र नहीं, रोगी का औषधि से बड़ा कोई मित्र नहीं और मरे हुये का धर्म से बड़ा कोई मित्र नहीं।

36- राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, भाई की पत्नी और सास सब को माँ तुल्य ही समझना चाहिए।

37- लालची को धन से, बलबान को हाथ जोड़ कर के, मूर्खो को उनही की तरह बातों से और ज्ञानी को सच्चाई से वश मे किया जा सकता हैं।

38- खूब खाने की इच्छा होते हुये भी कम खाना, गहरी नींद मे भी झट से जग जाना, स्वामी की भक्ति और वीरता यह गुण कुत्ते से सीखे जा सकते हैं।

39- अन्न और धन के व्यापार मे, शिक्षा के प्राप्ति मे, आहार और व्यवहार मे जो पुरुष लज्जा को दूर रखेगा, वही सुख को भोग पाएगा।

40- जिस प्रकार वन मे टेढ़े पेड़ो को छोड़ कर सीधे पेड़ो को काटा जाता हैं ठीक उसी प्राकर अत्यंत सीधे स्वभाव वाले को दुनिया परेशान करती हैं।