हीरु और गोलु नाम के दो शैतान बालक थे। दोनों ही छटे-छटाए जेल लाइन के शरारती बालक थे। दोनों दिनभर पुरे मोहल्ले मे शैतानिया करते रहते थे। वही एक और लड़का था जिसका नाम बीरु था। वह बहुत ही सीधा साधा लड़का था।
वह बिलकुल भी शैतानी नहीं करता था। एक बार परसोती काका के बगीचे मे खूब अमरूद फले हुये थे। तीनों एक ही साइकल मे स्कूल जा रहे थे। साइकल के डंडे मे हीरु बैठा था। केरियाल मे गोलु बैठा था, पर सीट मे कौन बैठा था ?
अरे हा याद आया, सीट मे बीरु बैठा था और साइकल अपने आप ऑटो चालक मे चल रही थी। तभी हीरु के दिमाग मे बल्ब जला और उसने कहा चल भैया, हम लोग परसोती काका के बगीचे के अमरूद तोड़ लेते हैं। फिर स्कूल मे बैठ के खाएँगे।
इस पर गोलु के दिमाग की घंटी बजी और उसने भी सहमति मे कहा – “आज ही के लिए बस क्यो? कल के लिए भी आज ही तोड़ लेते हैं।
जैसा की मैंने पहले ही बताया की बीरु एक सीधा और साधा लड़का था। इसलिए उसने उन्हे माना किया की हमे किसी का नुकसान नहीं करना चाहिए, बल्कि सत्यानाश करना चाहिए ।
और कहते ही बीरु ने अपने बैग से एक कुल्हाड़ी नकाली और देखते ही देखते पूरा का पूरा अमरूद का पेड़ ही काट डाला। अब तो तीनों उस पेड़ को घसीटते हुये स्कूल की ओर ले जाने लगे, तभी बीच मे स्कूल के प्राचार्य महोदय ने उन्हे रोक लिया और खूब डाटा।
फिर उनसे वह पेड़ छीनते हुये वापस परसोती के बाग की ओर चल दिये, क्यूंकी वह उसे वापस करना चाहते थे पर परसोती ने उन्हे कटे हुये पेड़ के साथ देख गलत समझ बैठा और सोचा की पेड़ प्राचार्य महोदय ने कांटे हैं तो उसने अपनी मोगरी (कपड़ा धोने वाला बैट) उठाई और प्राचार्य महोदय जी को अमरूद के पेड़ मे लगे अमरूद की संख्या के अनुपात मे ही खूब बजाया………!!
यह दृश्य देख तीनों (बीरु , हीरु और गोलु) हसी से लोटपोट हो रहे थे और समोसे के स्वाद का लुफ्ट उठा रहे थे।
 
(यह कहानी अजीत गौतम ने 1 जनवरी 2014 को लिखी थी, बचपन की शरारत को याद करते हुये )
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