रीवा सीधी नाम का एक राज्य था। इस राज्य मे एक गाँव था, नंदनपुर मे एक पंडित रहा करते थे, उनका नाम भागवत था। उनकी स्थिति ठीक नहीं थी। वो एक मंदिर मे पुजारी, गाँव वाले मंदिर जो चढ़ावा देते उसी से भागवत पंडित का घर चलता था। पंडित जी के तीन बेटे थे। पत्नी उनकी बहुत पहले ही गुजर चुकी थी। घर बिना महिला का था, इसलिए वो पंडित जी और उनके तीन लड़के बड़ी लापरवही के साथ रहते थे।

इसलिए लक्ष्मी ने उनके घर को छोड़ दिया था। और दरिद्रता ने उनके यहाँ निवास करती थी। एक बार भागवत पंडित जी भीतरी नामके गाँव मे कथा सुनाने गए थे। वहाँ से कथा सुनने के बाद वह अपने घर वापस लौट रहे थे, भीतरी से नंदनपुर पहुचने मे 10 घंटे लगते थे। भागवत पंडित जी नंदनपुर (आज का रीवा शहर) की तरफ पैदल पैदल चल दिये। रास्ते मे एक जंगल पड़ता था, उसे पार करते वक्त पंडित जी वहाँ से बहने वाली बिछिया नदी के किनारे लगे एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे, तभी वहाँ एक दूसरे पंडित जी आए, वह नदानपुर से भीतरी जा रहे थे, वें एक शिक्षक थे। उनका नाम मनमोहन तिवारी था। दोनों ने एक दूसरे का परिचय लिया, बातो-बातों मे पता चला की मनमोहन तिवारी रीवा मे लड़के देखने गए थे, मनमोहन तिवारी के तीन बेटियाँ थी, पर उन्हे कोई शादी पसंद नहीं आई, तब भागवत जी ने लड़के न पसंद आने का कारण पूछा तो मनमोहन तिवारी ने बताया की वें अपनी तीनों बेटी की शादी ऐसे ही घर मे करेंगे, जिस घर मे तीन लड़के होंगे।

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तब भागवत जी ने अपने तीनों लड़के के बारे मे बताया तो मनमोहन तिवारी बड़े खुश हुये, उन्होने अपनी तीनों लड़की की शादी भागवत पंडित के लड़को के साथ तय कर दी।

तीनों लड़के की शादी हो गई, भगवात के यहाँ मनमोहन की लड़कियां बहू बनकर आ गई। तीनों सगी बहनो के पास जादुई शक्तियाँ थी, बड़ी बहू, बहुत ही मीठा बोलने की शक्ति थी, दूसरी बहू के पास स्वादिष्ट खाना बनाने की शक्ति थी, और तीसरे बहू के पास ज्ञान की शक्ति थी।

जब से तीनों जादुई बहने ब्याह के भागवत पंडित जी के यहाँ आए, तब से पंडित जी की किस्मत बदल गई, पूरा गाँव उनकी तरक्की देख कर यही कहता था, की भागवत की बहुए लक्ष्मी का रूप हैं, जब से आई हैं, भागवत की किस्मत ही बदल गई हैं। भागवत ने गाँव मे गुरुकुल खोल लिया था, जिसमे घर के सभी लोग मेहनत करते थे। भागवत के गुरुकुल मे दूर दूर से लोग पढ़ने आया करते थे। भागवत की तरक्की की कहानी दूर देश के एक दुष्ट राजा तक पहुंची। उसने सोचा की उन तीनों जादुई बहनो को हम अपने यहाँ ले आते हैं। इसलिए उस दुष्ट राजा ने अपनी सेना के साथ एक दिन भागवत के यहाँ पहुँच गया।

उसने गुस्से मे तलवार निकाल कर भागवत को धमकी दी की वह अपनी तीनों जादुई बहुयों को उसके हवाले कर दे। वरना वो सबको मार देगा।

तब भागवत की आज्ञा लेकर बड़ी बहू बाहर आई और उसने अपनी जादुई ताकत का इस्तेमाल करते हुये दुष्टा राजा से बात किया, उसे गुस्सा शांत करने के लिए कहा, बड़ी बहू की आवाज बहुत ही कोमल और मीठी थी, उस आवाज को सुन कर दुष्ट राजा का गुस्सा शांत हो गया।

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बड़ी बहू ने उसे घर मे आने और भोजन करने का निमंत्रण दिया। दुष्ट राजा जैसे वश मे हो चुका हो, वह निमंत्रण को स्वीकार करके, अंदर आ गया, वहाँ पर भागवत पंडित जी और उसके तीनों लड़के मौजूद थे, राजा खाना का इंतेजार करने लगा। इस दौरान वो सभी से बात करने लगा, और सभी के साथ घुल-मिल गया। इसके बाद दूसरी बहूँ ने खाना बना कर लाई, जब दुष्ट राजा ने उसे खाया तो उसे अपनी बड़ी बहन याद आ गई, यह खाना बिलकुल उसकी बहन के हाथो का बना लग रहा था। इसके बाद जब वह खाना खा रहा था, तो तीसरी बहू भी आ गई, और उसने राजा से बात करते हुये शास्त्र उपदेश दिया, जिससे राजा का धार्मिक भाव उदार हुआ, और उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।

खाना खाने के बाद उसने भगवात पंडित जी को खूब सारा धन दिया, और कहा की एक भाई की तरफ से यह अपनी तीनों बहनो के लिए भेट हैं, इसे स्वीकार्य करे।

और इसके बाद वह अपने देश को लौट गया।

शिक्षा – अगर कोई अच्छा बोल, अच्छा ज्ञान और अच्छा खाना बनाना, जानता हैं। वह किसी भी परिस्थिति से लड़ कर अंत मे विजय पाएगा।

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