बीदर का कोई चित्रकार घूमता-घूमता हम्पी पहुँचा। वहाँ सम्राट कृष्णदेव राय की कला-प्रियता के बारे में सुना, तो महल में जा पहुंचा। राजा का आदेश था – समय कोई भी हो, किसी भी कलाकार को उन तक पहुंचने से न रोका जाए। वह चित्रकार जब पहुंचा, रात्रि के आठ बज रहे थे। राजा अपने परिवार के साथ भोजन कर रहे थे। उन्होंने चित्रकार को वहीं बुलवा लिया। न नाम पूछा, न धाम। बोले – “तुम चित्रकार हो, तो हमारा खाना खाते समय का चित्र बनाओ। देखते हैं, कितनी फुर्ती है तुममें।”

“चित्रकार प्रसन्न हो उठा। तूलिका निकालकर दीवार पर कागज लटकाया। अभी खाने की मेज ही बना पाया था कि सम्राट कृष्णदेव राय मुँह पोंछ खाने की मेज से उठ गए। बोले- “बन गया चित्र?”

चित्रकार अवाक्। क्या करे, क्या न करे! उसे चुप देख सम्राट ने उसे महल से निकलवा दिया।

इस अपमान ने चित्रकार को विचलित कर दिया। महल के सामने ही वह राजा के व्यवहार की आलोचना करने लगा। भीड़ जमा हो गई।

संयोग से तेनालीराम भी उधर से गुजरा।

भीड़ देखकर रुक गया। पूछताछ की, तो सारी बात का पता चला। कुछ सोच, उसने चित्रकार को पास बुलाया। कहा- “राजा से अपने इस अपमान का बदला लेना चाहते हो, तो मेरे साथ आओ।”

चित्रकार क्रोध से भरा था। तेनालीराम के साथ चला गया। तेनालीराम उसे अपने घर ले गया। नहला-धुलाकर अपने साथ भोजन करवाया। चित्रकार का क्रोध कुछ हल्का हुआ, तो उसने कहा- “तुम गजब के स्वाभिमानी हो चित्रकार, तभी तो अनजान प्रदेश में वहाँ के शासक की खुलेआम आलोचना कर रहे थे। किन्तु अपमान का बदला लेने का ढंग खतरनाक होता है। राजा के सैनिक तुम्हें बंदी भी बना सकते थे।”

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“तो बना लेते।” चित्रकार ने दो टूक उत्तर दिया- “बनाया क्यों नहीं?”

तेनालीराम हंसकर बोला- “इसलिए नहीं बनाया कि यह विजयनगर है। यहाँ प्रजा को सम्राट की प्रशंसा करने का अधिकार है, तो आलोचना करने का भी है। मगर आलोचना करने को बदला लेना तो नहीं कहा जा सकता।”

चित्रकार उलझ गया। बोला- “तो फिर मैं क्या करूं? जब तक सम्राट कृष्णदेव राय अपने किए की मुझसे क्षमा नहीं मांगेंगे, मझे चैन नहीं मिलेगा। जहाँ जाऊंगा, उनकी आलोचना करूंगा।”

तेनालीराम उसके कान में कुछ कहके बोला- “ऐसा करोगे, तो सम्राट निःसन्देह तुमसे क्षमा मांग लेंगे।”

चित्रकार मान गया। तेनालीराम के कहे अनुसार, उसने तेनालीराम का एक बहुत सुन्दर चित्र बनाया। चित्र इतना सजीव था कि लगता था, जीता-जागता तेनालीराम, लाल कालीन पर बैठा है। चित्र बन गया, तो तेनालीराम ने उसे चुपके से सम्राट के कक्ष में लाल कालीन बिछे तख्त पर रखवा दिया फिर घर चला गया।

सम्राट आए। कक्ष में घुसते ही उनकी नजर तेनालीराम पर पड़ी।

उन्हें देखकर न वह उठा, न सिर झुकाकर प्रणाम किया। इस पर सम्राट क्रोध में भर उठे। कई बार उसे पुकारा। जब सम्राट की कठोर वाणी भी तेनालीराम का ध्यान भंग न कर सकी, तो उन्होंने द्वारपाल को बुलाकर उसे कक्ष से बाहर फेंक देने का आदेश दिया।

द्वारपाल, तेनालीराम के पास पहुंचा, तो हक्का-बक्का रह गया। वह तेनालीराम नहीं उसका चित्र था। सम्राट को असली बात पता चली, तो चकित हो उठे। चित्र के पास आ उसे प्रशंसाभरी दृष्टि से देखने लगे।

“ऐसा सजीव चित्र तो मैंने आज तक नहीं देखा। कौन है, वह महान चित्रकार जिसने इसे बनाया।” उन्होंने आदेश दिया- “तेनालीराम को तुरन्त बलाया जाए।” 

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तेनालीराम आया, तो सम्राट कृष्णदेव राय  ने चित्र की प्रशंसा करते हुए चित्रकार से मिलने की इच्छा प्रकट की।

तेनालीराम जानता था, ऐसा ही होगा। उसने अगले दिन दरबार में चित्रकार को लाने का वायदा किया।

सारी रात सम्राट कृष्णदेव राय, चित्रकार के बारे में सोचते रहे। अगले दिन समय से पहले ही दरबार में पहुंच गए। तेनालीराम की प्रतीक्षा करने लगे। एक-एक मिनट एक-एक घंटे के समान लग रहा था।

नियत समय पर तेनालीराम आया। साथ में चित्रकार भी था। सम्राट ने उसे देखा, तो बेचैन हो उठे। उसी चित्रकार को तो उन्होंने महल से निकलवाया था। उन्हें अपनी गलती महसूस होने लगी। चित्रकार समीप आया तो वह बोले- “चित्रकार, हमें क्षमा करना। हम तुम्हें और तुम्हारी कला को पहचान न सके थे। आज से हम तुम्हें अपने दरबार में स्थान देते हैं। विजयनगर के सारे कला-संस्थान आज से तुम ही देखोगे।”

चित्रकार गदगद हो उठा। उसने तेनालीराम की ओर देखा। फिर हाथ जोड़कर बोला- “महाराज, क्षमा तो मुझे माँगनी है। मैंने ही आपको नहीं पहचाना। यदि तेनालीराम मुझे अपने साथ नहीं ले जाते, तो मैं न जाने आपके बारे में लोगों से क्या-क्या कहता फिरता। उन्होंने मुझे एक गलत काम से बचा लिया।”

सम्राट ने तेनालीराम की ओर देखा। बोले – “इन्होंने तुम्हें ही नहीं, मुझे भी बचाया। क्या तुम्हारे मुँह से ऐसी-वैसी बातें सुनकर जनता में मेरी प्रतिष्ठा कम न हो जाती।” कहकर उन्होंने तेनालीराम को गले से लगा लिया।”

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