राजा कृष्णदेव राय उन दिनों रायचूर, बीजापुर और गुलबर्ग पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे थे।

उन्होंने राज्यपाल से कहा कि वे सेना के लिए आदमी और धन इकट्ठा कर भेजे, ताकि शत्रु का सिर पूरी तरह कचल दिया जाए।

उड़ीसा के राजा को तो वह हरा ही चुके थे। अब उत्तर के मुसलमान राज्यों की बारी थी।

उनकी तैयारियां, सेना की शक्ति और साधन देखकर बीजापुर का सुल्तान चिंता में पड़ गया। अगर कृष्णदेव राय ने हमला कर दिया, तो सल्तनत बचाना नामुमकिन होगा। उसने एक मुसलमान जासूस को ब्राह्मण के भेष में राजा अय्यर बनाकर विजयनगर भेजा ताकि वह राजा का विश्वास प्राप्त कर सके और सही मौका हाथ आते ही राजा को मार डाले।

सुल्तान ने सोचा कि अगर राजा को मार डाला गया तो इस साल हमला नहीं हो सकेगा और राजा की मौत से जो आपा-धापी मचेगी, उसका लाभ उठाकर विजयनगर पर धावा बोला जा सकता है।

राजा असल में मथुरा का रहने वाला था और काफी पढ़ा-लिखा था। वह मथुरा के सुल्तानों का वंशज था, जिन्हें विजयनगर के राजाओं ने खदेड़ दिया था।

राजा के लिए अपने पूर्वजों की पराजय का बदला लेने का यह अच्छा मौका था। वह कट्टर मुसलमान था। उसका रंग काला था और तमिल ब्राह्मणों के रीति-रिवाजों से अय्यर अच्छी तरह परिचित था।

तमिल ब्राह्मण का भेष बनाकर वह विजयनगर के दरबार में पहुंचा। वहां वह शुद्ध संस्कृत बोलता, वेदों का पाठ करता, शास्त्रों, पुराणों और नाटकों के अंश सुनाया करता।

राजा कृष्णदेव राय विद्वानों का आदर तो करते ही थे नकली राजा अय्यर ने दरबार में एक विशेष स्थान बना लिया। उसे दिन या रात किसी भी समय राजा के महल में जाने की इजाजत भी मिल गई।

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शुरू में तो वह सावधान रहा, लेकिन धीरे-धीरे वह महल के अंदर के कमरों में आने-जाने लगा।

वह ऐसे स्थान की तलाश में था, जहां मौका पाकर वह राजा पर वार कर सके। एक समस्या यह थी कि राजा जहां भी आता-जाता, कुछ लोग हमेशा उसके साथ रहते थे। ऐसे मौके पर पकड़ लिए जाने का खतरा था। तेनालीराम हर वक्त राजा के साथ रहता था, इसलिए राजा अय्यर को उससे बड़ी चिढ़ थी। तेनालीराम को भी वह अच्छा नहीं लगता था। उसे शक हो गया था कि हो न हो, राजा अय्यर जासूस है। वह उसे फंसाने की चाल सोचने लगा।

एक दिन अचानक तेनालीराम ने राजा के सामने ही राजा अय्यर से पूछ लिया- “तुम्हारा वेद और गौत्र कौन-सा है?”

“कृष्णा यजुर्वेद और संस्कृति गौत्र।” झट से राजा सका अय्यर ने उत्तर दिया।

अय्यर के जाने पर राजा ने तेनालीराम से पूछा – “तुमने उससे यह प्रश्न क्यों किया?” 

“महाराज, मुझे शक है कि यह आदमी जासूस है। इस पर भरोसा करने से पहले इसे परख लेना चाहिए। गलत आदमी पर की गई कृपा बहुत नुकसान पहुंचाती है।”

“तम्हारी बात में कुछ दम तो है, पर मुझे यकीन नहीं होता। मुझ अकेले को मारकर उसे क्या मिलेगा? मेरे मरने पर भी मेरे लाखों सिपाही तो जीवित रहेंगे।” राजा ने कहा।

“एक शेर लाखों भेड़ों से अधिक ताकतवर होता और फिर आपके न होने से सेना में फूट पड़ जाएगी। इससे शत्रु को हमें कुचलने का अवसर मिल जायेगा। अगर महाराज आज्ञा दें तो मैं सिद्ध कर सकता हूं कि यह आदमी शत्रु का जासूस है।” तेनालीराम ने कहा।

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“वह कैसे?” राजा ने पूछा।

“एक बहुत ही सरल तरीका है, जिससे उसकी पोल खुल सकती है।” तेनालीराम ने कहा।

“मेरी ओर से तुम्हें आज्ञा है, लेकिन तुम जो भी करना चाहते हो, तुम्हें मेरे सामने करना पड़ेगा। जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो जाए, उस पर आंच नहीं आनी चाहिए।” राजा बोले।

उस रात जब राजा अय्यर अपने कमरे में घोड़े बेचकर सो रहा था, तेनालीराम, राजा कृष्णदेव राय के साथ वहीं पहुंचा और जोंकों से भरी ठंडे पानी की बाल्टी उस पर उड़ेल दी। एकाएक राजा चिल्लाता हुआ उठ बैठा – “या अल्लाह अल्लाह!”

क्रोध में आकर उसने अपनी तलवार निकाली। वह  तेनालीराम पर वार करना ही चाहता था कि राजा कृष्णदेव राय ने तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

इस तरह तेनालीराम ने अपनी समझदारी सूझबूझ से महाराज कृष्णदेव राय की जान बचा ली।

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