पुरानी बात है धूलकांत नामक नगर था। उसमें नीलकंठ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके पास धन संपत्ति नहीं थी। मेहनत मजदूरी करके वह अपना काम चलाता था। निर्धन होने के कारण जीवन बड़ी कठिनाई से बीत रहा था। फिर भी वह और उसकी पत्नी घबराते नहीं थे।

उनके घर जो भी मेहमान आता, उनका आदर सत्कार करना, वे अपना कर्तव्य समझते थे। एक दिन उनके घर कोई सन्यासी आया। उन्होंने सन्यासी की खूब सेवा की, जाते समय प्रसन्न होकर सन्यासी उन्हें एक घड़ा दे गया। उस घड़े की विशेषता यह थी की वह हर समय पानी से भरा रहता था। जितना जी चाहे पानी उड़ेल लो, परंतु घड़ा खाली नहीं होता था। न ही उसे पानी भरने के लिए किसी कुआं या तालाब में डूबाना पड़ता था।

परंतु सन्यासी ने एक शर्त लगाई थी – “जितना जी चाहे, परोपकार कमाओ, लेकिन इस घड़े का उपयोग लाभ के लिए मत करना। नहीं तो यह फूट जाएगा।”

नीलकंठ ने यह बात गांठ बांध ली थी। नगर का एक दुकानदार अक्सर उसे समझाता- “यह घड़ा तेरे लिए व्यर्थ है, सौ-पचास ले-ले और घड़ा मुझे दे दे। मैं इसका जल बेचकर धन कमाऊंगा, तू तो व्यापार के बारे में कुछ जानता नहीं है, इसलिए तेरे लिए ये घड़ा बेकार है।”

ब्राह्मण उसकी बात हर बार टाल जाता। गंभीर होकर ब्राह्मण व्यापारी से कहता – “सन्यासी जी का आदेश है, इस जल से मोल नहीं कमाना है और परोपकार करने के लिए ही इसका इस्तेमाल करना है।”

“परोपकार कमाते कमाते तो तेरे प्राण ही निकल जाएंगे। तुझे कुछ भी नहीं मिलेगा, तेरे बच्चे भीख मांगते ही रह जाएंगे। यदि लाभ नहीं कमाना तो उस सन्यासी ने तुझे मटका क्यों दिया था?”- दुकानदार उसे लालच देता हुआ हमेशा कहता था।

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बरसों बीत गए, नीलकंठ ने वह घड़ा नहीं बेचा और ना ही उस घड़े से कोई लाभ कमाया। वह हर किसी को उस घड़े का जल पिलाकर परोपकार करता रहता था। लोग उसके इस अच्छे काम की सराहना करते थे। उसी वर्ष इतनी गर्मी पड़ी की नदी, नाले, तालाब और कुएं आदि सूख गए। नीलकंठ के राज्य में अकाल पड़ गया था। लोग राज्य को छोड़कर भागने लगे थे। बरसात आने पर भी जब पानी नहीं बरसा तो राज्य के राजा वीरेंद्र की चिंताएं दुगनी हो गई थी।

राजधानी के कुएं भी सूखने लगे थे। लोग पानी के अभाव में प्यास से दम तोड़ने लगे थे। राजा ने राज महल के कुएं प्रजा के लिए खोल दिए। लेकिन उनसे भी कब तक काम चलता। एक दिन मंत्री ने आकर राजा को ब्राम्हण नीलकंठ के घड़े के बारे में बताया। राजा मंत्री के साथ ब्राम्हण के पास गए और उससे जल मांगा, तो नीलकंठ ने घड़े से पानी पिला दिया।

यह देखकर राजा चकित रह गया और प्रसन्न होकर बोला- “हे ब्राह्मण! तुम्हें जो मांगना है मांग लो”

नीलकंठ ने बड़ी ही नम्रता के साथ बोला – “नहीं महाराज! पानी का मोल मैं नहीं कर सकता।”

“परंतु मैं तुम्हें इनाम देना चाहता हूं। सुना है तुम लोगों को पानी पिला कर जान बचा रहे हो।” – राजा ने कहा।

“महाराज यह तो मेरा धर्म है। इसमें इनाम लेने की बात कहां से आ गई? मैं कुछ नहीं लूंगा।” –  ऐसा ब्राम्हण ने कहा।

“ठीक है तुम्हारी मर्जी” – इतना कहकर राजा और मंत्री वहां से चले गए और अगले रोज राजा ने ब्राह्मण को दरबार में पेश होने का आदेश दिया।

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आदेश की बात सुनकर लोग तरह तरह की बातें करने लगे – “मूर्ख ब्रांहण ने राजा की बात ठुकरा दी है। पता नहीं राजा अब उसे क्या दंड देंगे?”

अगले रोज जब वह राज दरबार में गया तो उसका स्वागत किया गया। राजा ने उसे स्वर्ण जड़ित सिंहासन पर बैठाते हुए कहा – “आज से तुम हमारे राज्य के जल प्रबंधक हो। तुम्हें 500 स्वर्ण मुद्राएं प्रतिमाह वेतन मिलेगा। क्या तुम्हें स्वीकार है? यह तो पानी का मोल नहीं है ना।”

ब्राम्हण ने राजा की उस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। अब उसका जीवन बड़ी सुविधा के साथ बीतने लगा। चमत्कारी घड़े से राज्य के प्यासे लोगों को पानी पिला कर, अब उसे और भी संतोष मिलता था।

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