सुंदरगढ़ी नामका एक राज्य था, उसके राजा मन सिंह जी थे, उनकी पहली पत्नी बच्चा जन्म देते समय गुजर गई थी। रानी ने एक लड़के को जन्म दिया था।
राजा को लड़के के प्रति बहुत ही चिंता हुई इसलिए उसने लड़के की परवरिश के लिए दूसरी माँ ले आया।
राजा की दूसरी पत्नी का नाम चंद्रावती था। चंद्रावती कभी भी उस नवजात शिशु को अकेला नहीं छोड़ती थी, उसे हमेशा अपने गोद मे ही लिए रहती थी।
समय बीतता गया, लड़का दो वर्ष का हो गया था। इधर रानी को भी एक संतान हो चुका था, उसकी उम्र एक वर्ष थी। लेकिन रानी अपने बच्चे से ज्यादा राजा के पहले पुत्र को मानती थी। और उसे कभी भी अकेला नहीं छोड़ती थी, और हमेशा उसे गोद मे ही लिए रहा करती थी।
पूरे राज्य मे बात फैल गयी की राजा की दूसरी पत्नी, राजा के पहले लड़के को बहुत मानती हैं, सौतेली माँ होने के बावजूद वह अपने सगे लड़के से भी ज्यादा सौतेले बेटे को मानती हैं।
चंद्रावती कभी भी अपने सगे बेटे को अपने गोद मे नहीं लेती थी, हरपल-हरघड़ी वह सिर्फ राजा के पहले लड़के को ही गोद मे लिए रहती थी।
एक बार चंद्रावती अपने माइके गई हुयी थी, वहाँ पर भी वह राजा के पहले लड़के को अपने साथ ले गई थी। यह देख कर चंद्रावती की माँ ने उसे टोका की तुम हर समय अपने इस सौतेले बच्चे को ही क्यो गोद मे ली रहती हो, कभी अपने बच्चे से भी लाड-दुलार करो, उसे भी कभी अपनी गोद मे लो, आखिर ऐसा भी क्या प्रेम इस सौतेले लड़के से, की अपने बच्चे को समय नहीं देती हो।
तब चंद्रावती ने इधर-उधर देखा और माँ से कहा की माँ तुम क्या समझती हो की क्या मैं अपने लड़के से प्रेम नहीं करती, अपने लड़के की भविष्य के लिए ही मैं राजा के पहले लड़के को अपने गोद मे लिए रहती हूँ, और अपने लड़के को खिला नहीं पा रही, उसे प्यार नहीं दे पा रही।
चंद्रावती की माँ ने पूछा – कैसे, मैं नहीं समझी, साफ साफ बताओ?
तब चंद्रावती ने कहाँ की मैं राजा के पहले लड़के से प्रेम नहीं करती, मैं तो उसे अपंग बनाने के लिए हमेशा गोद मे लिए रहती हूँ, न ही वो कभी चलना सीख पाएगा, और ना ही मैं उसे कभी अक़्लमंद होने दूँगी। मैं कभी उसे उसके दिमाग से सोचने ही नहीं दूँगी। मैं कभी उसे अपने पैरो से चलने नहीं दूँगी। उसका हर कार्य वो खुद नहीं करेगा बल्कि मैं करूंगी,  इसकी वजह से वो कभी विकास नहीं कर पाएगा, और हमेशा मुझ पर ही निर्भर रहेगा।
तब जा कर चंद्रावती की माँ को पूरी बात समझ मे आई।
कहानी से शिक्षा- कई सगे माता-पिता भी अपने बेटे से इतना लाड-प्यार करते हैं, की उनका बेटा दुनिया की चुनौती को झेलने योग्य नहीं बन पते, और हमेशा हार और निराशा से घिरे रहते हैं। अगर अपने बच्चे को चुनौतियों  से लड़ना सीखना हैं, तो उन्हे चुनौतियों से खुद ही लड़ने दे।