क्रिमिया का युद्ध रूस और तुर्की के बीच

क्रीमिया युद्ध के कारण और उसके महत्व का विश्लेषण

1841 से 1852 तक टर्की साम्राज्य में शांति बनी रही और टर्की के सुल्तान को अपने साम्राज्य की दशा सुधारने का पर्याप्त अवसर मिला परंतु रूढ़िवादी मौलवियों और उलेमाओं के कारण सुधारवादी योजनाएं सफल नहीं हो सकी और शासन तंत्र कमजोर और भ्रष्टाचार पूर्ण बना रहा. अतः टर्की साम्राज्य में रहने वाले ईसाइयों में तीव्र संतोष बना रहा, 1854 में पूर्वी समस्या से संबंधित क्रीमिया युद्ध शुरू हो गया।

क्रीमिया युद्ध के कारण

1- रूस की महत्वकांक्ष – टर्की साम्राज्य में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता था, वह बास्फोरस एवं ड़ार्डेनलीज के जल मार्गों पर अधिकार करना चाहता था। रूस यह उद्देश्य टर्की साम्राज्य के विघटन से ही प्राप्त कर सकता था । अंततः रूस ने टर्की साम्राज्य के विघटन की योजना बनाना शुरू कर दिया। रूस के राजा निकोलस ने अपनी इंग्लैंड यात्रा के मध्य 1844 मे टर्की के विभाजन का प्रस्ताव ब्रिटिश प्रधानमंत्री एबर्डीन के सम्मुख रखा, परंतु इंग्लैंड ने इन प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया। 1853 में रूसी सम्राट निकोलस ने इंग्लैंड के राजदूत सर हैमिल्टन सेमूर से बातचीत करते हुए कहा – ” तुर्की की स्थिति चिंताजनक है। यह राज्य कई हिस्सों में बटेगा, यानी हमारे सामने एक मरणासन्न रोगी है। इसलिए यह जरूरी है कि बीमार आदमी की मृत्यु के पहले ही उसकी संपत्ति का बंटवारा किया जाए” परंतु इंग्लैंड की सरकार तुर्की साम्राज्य का विघटन नहीं चाहती थी। इसलिए उसने रूस के राजा के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। जिसके परिणाम स्वरूप रूस ने अकेले ही तुर्की साम्राज्य में हस्तक्षेप करने का निश्चय कर लिया।

पवित्र तीर्थ स्थानों की समस्या- तुर्की साम्राज्य के अंतर्गत फिलिस्तीन में स्थित जेरूसलम के पवित्र तीर्थ स्थानों में  यूनानी सन्यासी और कैथोलिक सन्यासी रहते थे। तुर्की के प्रसिद्ध सम्राट सुलेमान ने तीर्थ स्थानों के संरक्षण और देखभाल का काम कैथोलिक सन्यासियों को सौंपा हुआ था और फ्रांस को रोमन ईसाई का संरक्षक बना दिया था। परंतु 1789 के बाद फ्रांस ने पवित्र स्थानों के मामलों में रुचि लेना बंद कर दिया और कैथोलिक सन्यासी भी अपने कर्तव्यों मे लापरवाही बरतने लगे। परिणाम स्वरूप पवित्र स्थानों पर यूनानी सन्यासियों का अधिकार हो गया। रूस यूनानी सन्यासियों का संरक्षक माना जाता था।

1850 में फ्रांस के राष्ट्रपति लुई नेपोलियन ने टर्की के सुल्तान से अनुरोध किया कि फ्रांस को रोमन निवासियों का संरक्षक माना जाए। परंतु रूस ने इसका घोर विरोध किया और यूनानी सन्यासियों के अधिकारों को यथावत बनाए रखने के लिए टर्की के सुल्तान पर दबाव डाला। जब टर्की सुल्तान ने फ्रांस की मांग स्वीकार कर ली तो रूस बहुत ज्यादा नाराज हुआ। मार्च 1853 में रूस के राजा ने प्रिंस मेनाशीफाक नामक दूत को टर्की भेजा। उसने टर्की के सुल्तान से कहा की टर्की साम्राज्य के समस्त यूनानी चर्च के मानने वाले ईसाइयों का संरक्षक बनने की मांग को टर्की ने ठुकरा दिया जिससे रूस और टर्की के बीच शत्रुता बढ़ेगी और इसका उत्तरदाई केवल टर्की होगा।

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फ्रांस का रूस विरोधी दृष्टिकोण- फ्रांस का नेपोलियन तृतीय महत्वकांक्षी व्यक्ति था, वह अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में गौरव प्राप्त करने के लिए लालायित रहता था, इसके अतिरिक्त रूस को पराजित कर नेपोलियन बोनापार्ट महान की पराजय का बदला लेना चाहता था। इसलिए उसने पवित्र स्थानों के संरक्षण के मामले पर रूस को चुनौती दी जिससे फ्रांस और रूस के बीच तनाव बढ़ गया। कई इतिहासकार नेपोलियन तृतीय को इस युद्ध का उत्तरदाई मानते हैं। इतिहासकार के अनुसार नेपोलियन तृतीय ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए और फ्रांस की जनता की गौरव की भावना को संतुष्ट करने के लिए टर्की के पवित्र स्थानों के विषय में रूस से विवाद को बढ़ाया, और इंग्लैंड को भड़का कर अपना सहयोगी बना लिया।

इंग्लैंड का दृष्टिकोण- इंग्लैंड टर्की साम्राज्य का विघटन नहीं चाहता था, वह टर्की साम्राज्य में रूस का प्रभाव सहन नहीं कर सकता था। इंग्लैंड का मुख्य उद्देश्य यूरोप में रूस के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना था, जिससे यूरोप का शक्ति संतुलन पहले जैसा बना रही। कुछ इतिहासकारों के अनुसार टर्की में मौजूद ब्रिटिश के राजदूत लॉर्ड स्टेट फोर्ड द रेडक्लिफ भी क्रीमिया युद्ध को भड़काने के लिए उत्तरदाई थे। वह रूस का कट्टर विरोधी था, उसके भड़काने पर टर्की सुल्तान ने रूस के ईसाइयों पर संरक्षण की मांग को अस्वीकार कर दिया था।

तुर्की में उग्र राष्ट्रीयता- इतिहासकारों के अनुसार क्रीमिया युद्ध का मूल कारण यह भी था, उस समय तुर्की में राष्ट्रीयता की भावना अपने चरम पर पहुंच गई थी। तुर्की के राष्ट्रवादी सैनिक अधिकारियों की दृष्टि से रूस की मांगे ना केवल अपमानजनक थी, साथ में तुर्की के साम्राज्य के संतुलन के लिए भी घातक थी। इसलिए वह रूस की मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे और रूस का विरोध करने के लिए तैयार थे, चाहे भले ही युद्ध करना पड़े।

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तुर्की साम्राज्य में रूसी सेनाओं का हमला – जब टर्की के सुल्तान ने रूस की मांगों को अस्वीकार कर दिया, तो रूस बड़ा क्रोधित हुआ। 21 जुलाई 1853 को रूसी सेनाओं ने टर्की के प्रांत मोल्डविया और वालेशिया पर अधिकार कर लिया। रूस की सैनिक कार्यवाही से स्थिति अत्यंत जटिल हो गई। इंग्लैंड और फ्रांस ने रूस की आक्रामक नीति का घोर विरोध किया और रूसी कार्यवाही का विरोध करने के लिए परस्पर विचार विमर्श करना शुरू कर दिया।

वियना नोट- जुलाई 1853 में इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया और प्रशा ने रूस और टर्की के विवाद को हल करने के लिए वियना में एक सम्मेलन किया। चारों राज्यों के प्रतिनिधियों ने मिलकर, एक नोट तैयार किया जिसे वियना नोट कहते हैं। इस नोट के अनुसार यह कहा गया कि पवित्र स्थानों का संरक्षण आवश्यक है। यह संरक्षण किसके द्वारा होगा यह स्पष्ट नहीं था। रूस के सम्राट निकोलस ने समझा कि यह संरक्षण रूस करेगा। टर्की के सुल्तान ने समझा कि संरक्षण का कार्य तुर्की करेगा। रूस ने इस नोट को स्वीकार कर लिया। परंतु ब्रिटिश राजदूत रेडक्लिफ के भड़काने पर टर्की के सुल्तान ने नोट को अस्वीकार कर दिया। इससे रूस और टर्की का विवाद और बढ़ गया।

टर्की द्वारा युद्ध घोषणा- 5 अगस्त 1853 को टर्की ने रूस से यह मांग की कि वालेशिया और माल्डेविया के प्रदेशों को 12 दिन के अंदर खाली कर दे। परंतु रूस ने टर्की की मांग को अस्वीकार कर दिया। ब्रिटिश राजदूत रेडक्लिफ के प्रोत्साहन पर 23 अक्टूबर 1853 को टर्की ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

साइनोप का हत्याकांड – जब तुर्की ने डैन्यूब नदी पर जहाजी बेड़ों पर आक्रमण कर दिया तो रूस के जहाजी बेड़े ने साईनोप की खाड़ी में स्थित तुर्की के जहाजी बेड़ों को नष्ट कर दिया, और उन जहाजी बेड़ों में मौजूद तुर्कों का नरसंहार किया। इस घटना को साईनोप का हत्याकांड कहा गया। इस घटना के पश्चात इंग्लैंड तथा फ्रांस ने भी रूस का विरोध करने का निश्चय कर लिया। 4 जनवरी 1854 को इंग्लैंड तथा फ्रांस के जहाजी बेड़े काले सागर में प्रवेश कर गए। उन्होंने रूस को चेतावनी दी कि यदि उसने अपनी सेनाएं वालेशिया और माल्डेविया से नहीं हटाई तो वह भी युद्ध में कूद पड़ेंगे। जब रूस ने इस चेतावनी को अस्वीकार कर दिया तो 28 मार्च, 1854 को इंग्लैंड और फ्रांस ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अब एक ओर इंग्लैंड, फ्रांस और टर्की थे तो दूसरी तरफ अकेला रूस इस युद्ध में शामिल हो गया।

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युद्ध में क्या हुआ और उसका परिणाम क्या निकला?

मार्च 1854 के अंत में रूसी सेनाओं ने डेन्यूब नदी को पार करके सिलीस्ट्रिया पर घेरा डाला किंतु तुर्कों के प्रबल विरोध के कारण रूस को अधिक सफलता नहीं मिली। इंग्लैंड तथा फ्रांस के दबाव डालने पर रूस ने वालेशिया और माल्डेविया के प्रदेश खाली कर दिए परंतु मित्र राष्ट्र इससे संतुष्ट नहीं हुए और वह रूस को नीचा दिखाना चाहते थे। जुलाई 1854 में मित्र राष्ट्र ने युद्ध को समाप्त करने के लिए चार मांगे रखी परंतु रूस ने इन्हें अस्वीकार कर दिया।

इस प्रकार 14 सितंबर 1854 को मित्र राष्ट्रों की सेना एंलॉर्ड रगनल और सेंट आर्नोय के नेतृत्व में आगे बढ़ी। एल्मा और बेल्कालावा के क्षेत्र मे युद्ध में मित्र राष्ट्र की विजय हुई और रूस की पराजय हुई। 5 नवंबर 1854 को रूसी सेनाओं ने इंकरमैन नामके स्थान पर आक्रमण करके मित्र राष्ट्रों के घेरे को तोड़ना चाहा, परंतु रूसी सेनाएं फिर असफल हुई। मार्च 1855 में रूस के राजा निकोलस की मृत्यु हो गई, परंतु रूसी सेनाओं ने युद्ध को जारी रखा। मित्र राष्ट्रों ने शीघ्र ही मालाकाफ पर अधिकार कर लिया, जिससे सेबास्टपोल की रक्षा करना असंभव हो गया। इस प्रकार 9 सितंबर 1855 को रुसियों ने अपने गोला बारूद के भंडारों में आग लगा दी और बास्टपोल के किले को छोड़कर पीछे हट गए। इस प्रकार 349 दिन के घेरे के बाद मित्र राष्ट्रों ने सेबास्टपोल नाम के स्थान पर अधिकार कर लिया। अंत में रूस मित्र राष्ट्रों से संधि के लिए तैयार हो गया।

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