कम्प्यूटर के विकास का इतिहास (History of Computer Development)

कम्प्यूटर के विकास का इतिहास (History of Computer Development)

आवश्यकता अविष्कार की जननी है। यह कहावत कम्प्यूटर हेतु भी सत्य है। कम्प्यूटर का विकास इसिलए हुआ क्योंकि मनुष्य तीव्र एवं शुद्ध (एक्यूरेट) गणना करने वाले उपकरणों की खोज में था।  पहली मैकेनिकल एडिंग मशीन (जोड़ करने वाली) का अविष्कार 1642 में ब्लेज पास्कल द्वारा किया गया। बाद में 1671 में जर्मनी के बेरॉन गॉटफ्रिड विलहेम वॉन लेबनीज में गुणा करने हेतु प्रथम केलकुलेटर का अवष्किर किया। अमेरिका में 1880 के लगभग की-बार्ड से चलने वाली मशीन बनाई गई एवं ये आज भी उपयोग की जा रही है। इस समय के दौरान हर्मन होलरिथ ने पंच कार्ड की प्रणाली पेश की जो कि 1970 के दशक तक कम्प्यूटर में एक इनपुरट माध्यम हेतु उपयोग की गई। बिजनेस मशीन एवं केलकुलेटर यूरोप और अमेरिका में 19वीं शताब्दी के अन्त तक बनाये गये।

चार्ल्स बाबेज को अधुनिक डिजिटल कम्प्यूटर का जनक कहा जाता है। उनके समय में क्लर्क के समूह द्वारा गणितीय एवं साख्यिकीय टेबल बनाई जाती थी। इनमें मानवीय त्रुटियों को दूर करने की व्यवस्था भी नहीं थी। बाबेज ने इस टेबल्स को चेक करने हेतु कई घण्टे परिश्रम किया एवं बहुत जल्दी वह इस कार्य से ऊब गये। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने एक ऐसी मशीन के निर्माण के बारे में विचार करना शुरू किया जो टेबल्स में त्रुटिरहित गणना कर सके।

इस प्रोसेस में, बाबेज ने 1822 में डिफरेन्स इंजन का डिजाइन बनाया जिसके द्वारा विश्वसनीय टेबल्स बनाई जा सकती थी। 1842 में बाबेज ने एक नई मशीन ‘एनालिटिकल इंजन’ का अविष्कार किया जो कि पूर्णतः ऑटोमेटिक थी। यह किसी भी मेथेमेटिकल (गणितीय) कार्य को करने में सक्षम एवं यह 60 जोड़ प्रति मिनट की औसत गति से कार्य करती थी। दुर्भाग्य से बाबेज इस मशीन का वर्किंग मॉडल नहीं बना सके, क्योंकि प्रिसीजन इंजीनियरिंग हेतु जरूरी निर्माणकर्ता इस समय उपलब्ध नहीं थे। हालांकि उनके प्रयस्त्नों से कई सिद्धान्त स्थापित हुए जो कि किसी भी डिजिटल कम्प्यूटर के डिजाइन हेतु आधार होते हैं।

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कम्प्यूटर के विकास पर विचार करने के लिए हम कुछ प्रारम्भिक कम्प्यूटर पर विचार करते है। ये इस तरह हैं :-

मार्क कम्प्यूटर (MARK Computer 1937-44)

इसे ऑटोमेटिक सिक्वेंस कन्ट्रोल्स केलकुलेटर के रूप में भी जाना जाता है। यह पहली पूर्णतः आटोमेटिक केलकुलेटिंग मशीन थी जिसे हॉवर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हॉवर्ड ए.आइकेल  ने आई.बी.एम. (इंटरनेशनल बिजनेस मशीन) कॉर्पोरेशन के सहयोग से बनाया था। इसका डिजाइन पंचकार्ड मशीन हेतु विकासित तकनीकी पर आधारित था। इसके डिजाइन में मेकेनिकल तथा इलेक्ट्रानिक कम्पोनेंन्ट्स दोनों का उपयोग किया गया, इस कारण इसे इलेक्ट्रो-मेकेनिकल डिवाइस (उपकरण) कहा गया। 

हालाकि यह मशीन पूर्णतः विश्वसनीय सिद्ध हुई पर इसका डिजाइन बहुत जबटिल एवं आकार बहुत बड़ा था। इसके ऑपरेशनस् को नियंत्रित करने हेतु 3000 से अधिक इलेक्ट्रिकल स्विच का उपयो किया गया एवं यह 50 फीट लम्बी और 8 फीट ऊंची थी। यचह पांच बेसिक अर्थमेटिक ऑपरेशनस् जोड़, घटाव, गुणा, भाग एवं टेबल रेफरेन्स करने में सक्षम थी। इस मशीन में दशमलव के 23 अंकों तक उपयोग किये जा सकते थे।

यह मशीन दो संख्याओं को जोड़ने में 0.3 सेकण्ड एवं दो संख्योओं का गुणा करने में 4.5 सेकण्ड का समय लेती थी। इस तरह वर्तमान कम्प्यूटर की तुलना में यह बहुत धीमी मशीन थी।

एटनसॉफ-बेरी कम्पयूटरी (1939-42)

इस इलेक्ट्रानिक मशीन का विकास डॉ. जॉन एटनसॉफ ने कुछ निश्चित गणितीय समीकरणपों को हल करने हेतु किया था। इस मशीन को इसके अविष्कारकर एवं उनके सहयोगी क्लिफबोर्ड बेरी के नाम पर एटनसॉफ बेरी कम्प्यूटर (एबीसी) काह गया। इसमें डाटा संग्रहन हेतु केपेसिटर्स एवं आंतरिक लॉजिक हेतु 45 वेक्यूम ट्यूब का उपयोग किया गया।

इनिएक (ENIAC 1943-46)

इलेक्ट्रानिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एण्ड केलकुलेटर (ई.एन.आई.ए.सी.) पहला इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर था। इसका निर्माण पेनसिल्वेनिया युनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग विभाग के मूरे स्कूल में प्रो. जे. प्रेस्पर एकर्ट एवं जॉन मोशले के नेतृत्व में एक वैज्ञानिक समूह ने किया था।

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इनिएक सैन्य जरूरतों हेतु विकसित किया गया था एवं कई वर्षों तक बेलस्टिक (लक्ष्य भेदने की) समस्याओं के हल हेतु उपयोग किया गया। इसके लिए 20ग40 स्क्वेयर फीट स्थान की आवश्यता होती थी तथा इसमें 18000 वेक्यूम ट्यूब (निर्वात नलिका) का उपयोग किया गया था। दो संख्याओं का जोड 200 माइक्रोसेकण्ड में एवं गुणा 2000 माइक्रोसेकण्ड में प्राप्त किया जात सकता था।

एडवेक (1946-52) (EDVAC)

EDVAC की सबसे बड़ी कमी यह थी कि इसके प्रोग्राम बोर्ड की वायरिंग में होते थे जो कि प्रोग्राम में परिवर्तन करने में कठिनाई पैदा करते थें। इस समस्या को डॉ. जॉन वॉन न्यूमन के स्टोर्ड प्रोग्राम की विचारधारा से दूर किया गया। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य यह था कि डाटा एवं सूचनाओं का एक क्रम में कम्प्यूटर की मेमोरी में संग्रहित किया जा सके, ताकि ऑपरेशन्स के प्रवाह की दिशा ऑटोमेटिक हो। इस विशेषता को आधुनिक डिजीटल कम्पयूटर के विकास के रूप में देखा जा सकता है जिससे एक ही कम्प्यूटर पर विभिन्न प्रोग्राम लोड एवं संचालित किया जा सकें। इस विशेषता के कारण हम कई बार आधुनिक डिजीटल कम्प्यूटर को स्टोर्ड प्रोग्राम डिजिटल कम्प्यूटर भी कहते हैं।

इलेक्ट्रानिक डिस्क्रीट वरिएबल ऑटोमेटिक कम्पयूटर (ई.डी.वी.ए.सी) को स्टोर्ड प्रोग्राम की अवधारणा पर डिजाइन किया गया था। वॉन न्यूमन को डाटा एवं सूचनाओं को बायनरी (ऐसा सिस्टम जिससे सभी अक्षरों को सिर्फ 0 एवं 1 के रूप में प्रदर्शित किया जाता है) में संग्रहित करने का भी श्रेय दिया जाता है जो पहले डेसिमल अंक अथवा मनुष्य द्वारा पड़े जा सकने वाले शब्दों के रूप में होते थे।

एडसेक (EDSAC) (1947-49)

अमेरिका के एडवैक के विकास के समय ही ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रानिक डीले स्टोरेज ऑटोमेटिक केलकुलेटर (एडसेक) विकसित किया। इस मशीन द्वारा पहला प्रोग्राम मई 1949 में संचालित (एक्जीक्यूट) किया गया। इस मशीन में जोड़ने का कार्य 1500 माइक्रोसेकण्ड एवं गुणा करने का कार्य 4000 माइक्रोसेकण्ड में पूर्ण होता था। इस मशीन को केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की गणित प्रयोगशाला में प्रो. मौरिस विल्केस के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा विकसित किया गया था।

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यूनिवैक-आई (UNIVAC-I) (1951) 

यूनिवर्सल ऑटोमेटिक कम्प्यूटर (यूनिवैक) प्रथम डिजिटल कम्प्यूटर था जो कई तरह के कार्य करता था। कई यूनिवेक मशीन बनाई गई, जिनमें से पहली 1951 में सेन्सस ब्यूरों में स्थापित की गई एवं निरन्तर 10 वर्षों तक उपयोग की गई। कम्प्यूटर का प्रथम व्यापारिक उपयोग 1954 में जनरल इलेक्ट्रिक कॉर्पोरेशन द्वारा यूनिवेक फर्स्ट से किया गया।

1952 में इन्टरनेशनल बिजनेस मशीन (आई.बी.एम.) कॉर्पोरेशन द्वारा 701 कामर्शियल (व्यापारिक) कम्प्यूटर बनाए गए। इनके बहुत शीघ्र सफल होने से यूनिवैक फर्स्ट एवं अन्य 700 श्रृंखला (सीरीज) के कम्प्यूटर के विकसित मॉडल बनाये गय। 1953 में आई.बी.एम. ने आई.बी.एम. 650 कम्पयूटर बनाया।

व्यापारिक कार्यों हेतु उपलब्ध डिजीटल कम्प्यूटर्स जो व्यापारिक एवं वैज्ञानिक कार्यों में उपयोग किये जा सके, ऐसे कम्प्यूटर्स बनाये गये।

 

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