मध्य प्रदेश में धान उत्पादन

MP Patwari Exam : मध्य प्रदेश कृषि प्रधान राज्य हैं और इसकी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर करती है। यहां लगभग सभी प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं, जिनमें खाद्यान फसले महत्वपूर्ण है। खाद्यान्न फसलों में धान की फसल मुख्य फसल है। विभाजन से पूर्व चावल मध्यप्रदेश की एक प्रमुख फसल की लेकिन वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने के बाद धान का कटोरा कहा जाने वाला मध्य प्रदेश का धान क्षेत्र छत्तीसगढ़ में चला गया और बचे हुये मध्य प्रदेश में धान का सीमित क्षेत्र ही शेष रह गया। मध्य प्रदेश को 7 कृषि क्षेत्रों में बांटा गया है जिसमें एक क्षेत्र चावल और कपास का क्षेत्र है, जो खंडवा में है और एक चावल का क्षेत्र भी है धान के इन क्षेत्रों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. धान का दक्षिण क्षेत्र – मध्य प्रदेश में धान का सिंचित क्षेत्र दक्षिण क्षेत्र है, जिसमें प्रदेश के बालाघाट, बैतूल, छिंदवाड़ा, मंडला आदि जिले आते हैं।
  2. धान का मध्य क्षेत्र – मध्यप्रदेश में चावल के मध्य क्षेत्र के अंतर्गत रीवा, सतना, जबलपुर, दमोह, सिवनी जिले सम्मिलित किए जाते हैं।
  3. धान का उत्तर पश्चिमी क्षेत्र- इस क्षेत्र के अंतर्गत प्रमुख धान उत्पादक जिले ग्वालियर, शिवपुरी, भिंड, मुरैना आते हैं
  4. अन्य क्षेत्र – ऊपर दिये क्षेत्रों के अतिरिक्त जो भी क्षेत्र बच जाते हैं, जैसे खंडवा, खरगोन, होशंगाबाद, झाबुआ आदि ये भी धान उत्पादक जिले हैं, जो कि अन्य क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।
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मध्य प्रदेश में धान की खेती के मुख्य समस्याएं(MP Patwari Exam )

मध्य प्रदेश एक पिछड़ा राज्य है, जिसकी कृषि भी पिछड़ी हुई है। जिसका कारण कृषि संबंधित समस्याएं हैं। इन समस्याओं से ग्रसित धान की खेती भी एक है। धान की खेती के मुख्य समस्याओं को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

सिंचाई की अपर्याप्त साधन – धान खरीफ की फसल है जो वर्षा ऋतु पर आधारित है, लेकिन वर्षा की अनिश्चितता के कारण धान की खेती के लिए पर्याप्त सिंचाई की सुविधा उपलब्ध ना होने से उत्पादन घट जाता है।

उन्नत किस्मों का अभाव – प्रदेश में अधिक उत्पादन देने वाली हाइब्रिड किस्मों के बीज का अभाव है। फल स्वरुप देसी किसमें अधिक उपज नहीं दे पाती हैं।

खाद एवं उर्वरकों का सीमित उपयोग – धान की फसल को आवश्यक तत्वों की उपलब्धता के लिए उचित अनुपात तथा आवश्यक मात्रा में खाद एवं उर्वरकों की आवश्यकता होती है। लेकिन प्रदेश में इनकी मात्रा काफी सीमित रहने से आशा अनुरूप उत्पादन नहीं हो पाता है। कीटो एवं रोगों का उचित निदान नहीं है, धान की फसल में लगने वाली बीमारियां व कीटों की रोकथाम के लिए आवश्यक उपचारों की कमी भी धान के फसल की एक मुख्य समस्या है।

पिछड़ी तकनीक – धान की खेती अभी भी परंपरागत तरीकों से की जाती है तथा नए तकनीकों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। फलस्वरूप उत्पादन कम होता है।

उचित भंडारण का ना होना – धान की उत्पादित फसल का उचित भंडारण ना होने से बहुत मात्र मे धान कीड़ो द्वारा नष्ट कर दिया जाता है। भंडारण की समस्या भी एक महत्वपूर्ण विषय है।

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ऊपर दिये समस्याओं के अलावा मृदा अपरदन, खेतों का छोटा आकार, यंत्रीकरण का अभाव, उचित वित्तीय व्यवस्था न होना भी धान की खेती के मार्ग में समस्या बनी हुई है। अतः सरकार द्वारा इस दिशा में समुचित प्रयास किए जाने चाहिए।

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