England mein Punarjagran – यद्यपि इटली में हुए पुनर्जागरण का प्रभाव इंग्‍लैण्‍ड में एडवर्ड चतुर्थ के रज्‍यकाल में प्रकट होने लगा था, परन्‍तु हेनरी सप्‍तम के समय में पुनर्जागरण ने अपनी जड़ों को मजबूत बनाया। इंग्‍लैण्‍ड में उस समय दो प्रसिद्ध विश्‍वविद्यालय, आक्‍सफोर्ड त‍था केम्ब्रिज थे। ये विश्‍वविद्यालय ही इंग्‍लैण्‍ड में पुनर्जागरण के केन्‍द्र बने। ऑक्‍सफोर्ड विश्‍वविद्यालय के कुछ छात्र इटली अध्‍ययन हुतु गए। 1465 ई. में विलियम सैलिंग प्रथम व्‍यक्ति था जिसने यूनानी लिपि का अध्‍ययन किया। सैलिंग का शिष्‍य थॉमस लिनेकर भी इटली गया तथा यूनानी भाषा के अध्‍ययन के साथ-साथ उसने ज्ञान की प्रत्‍येक शाखा का अध्‍ययन किया। उसने अपनी विशिष्‍ट रूचि औषधि-विज्ञान में प्रदर्शित की तथा चिकित्‍सक बनकर वह वापस इंग्‍लैण्‍ड आया। शीघ्र ही लिनेकर ट्यूडर शासको का राजकीय चिकित्‍सक नियुक्‍त हो गया। लिनकर ने लन्‍दन में चिकित्‍सकों का एक विद्यालय ( Royal College of Physicians ) स्‍थापित किया। इसके अतिरिक्‍त यूनानी साहित्‍य के विद्वान ग्रोसिन तथा लाइनाक्रे भी इटली गये तथा लौटकर विश्‍वविद्यालयों में यूनानी साहित्‍य पर व्‍याख्‍यान दिये। इनके अतिरिक्‍त कुछ विद्वान जिन्‍होनें पुनर्जागरण के लिये कार्य किया इस प्रकार थे।

जान कालेट-  जान कोलेट लन्‍दन के अमीर व्‍यापारी का पुत्र था। अध्‍ययन करने के लिये वह इटली गया तथा महान् आलोचक बनकर 1497 ई. में इंग्‍ल्‍ौण्‍ड लौटा। वह सेण्‍टपॉल विद्यालय में अध्‍यापक बन गया तथा पोप एवं पादरियों की कटु आलोचना की। उसने अपने व्‍याख्‍यानों में परम्‍परागत विचारों के मूल में जाने का प्रयास किया। उसने अनेक विद्यालयों की भी स्‍थापना की जिनसे नवीन विचारों के प्रसारण में सहायता मिली।

इरैस्‍मस (1466-1536) –  इरैस्‍मस एक फ्रांसीसी विद्वान था तथा अपने समय के प्रकाण्‍ड पण्डितों में से एक था। इरैस्‍मस ने भी इंग्‍लैण्‍ड में पुनर्जागरण को गति प्रदान की। इरैस्‍मय ब्रम्हज्ञान के विद्वान के रूप में ऑक्सफोर्ड विश्‍वविद्यालय मे कार्यरत था। उसके व्‍याख्‍यानों ने जनता के क्रान्ति उत्‍पन्‍न कर दी। छापेखाने के द्वारा सम्‍पूर्ण यूरोप मे प्रसिद्धि प्राप्‍त करने वाला वह प्रथम व्‍यक्ति था। उसने एक पुस्‍तक ‘पेज ऑफ फोली’ की रचना की जिसमें उसने चर्च की बुराइयों का वर्णन किया। अपनी एक अन्‍य रचना ‘ग्रीक टेस्‍टामेण्‍ट’ में भी इरैस्‍मय ने पोप तथा चर्च की आलोचना की तथा धार्मिक रूढि़वादिता पर गहरा आघात किया।

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टॉमस मूर- इंग्‍लैण्‍ड में पुनर्जागरण को सर्वाधिक शक्ति प्रदान करने वाला व्‍यक्ति टॉमस मूर था। टॉमस मूर, कालेट तथा इरैस्‍मस का मित्र था। टॉमस मूर ने राजनीति के क्षेत्र में मुक्‍त आलोचना की नयी चेतना का प्रयोग किया तथा 1516 ई. में प्रकाशित अपनी कृति ‘Utopia’ (काल्‍पनिक आदर्श राज्‍य) में एक ऐसे समाज का चित्र खींचा जिसमें सम्‍पत्ति का अच्‍छा फैलाव था, प्रत्‍येक व्‍यक्ति शिक्षित था, कोई निर्धन अथवा पीडि़त न था। कोई क्रूर मालिक न था। प्रत्‍येक व्‍यक्ति को अपनी इच्‍छानुसार ईश्‍वर की आराधना का अधिकार था। इस चित्र का स्‍थान उसने अज्ञात नयी दुनिया बताया। यह पुस्‍तक इंग्‍लैण्‍ड के धनी वर्ग एवं चर्च पर व्‍यंग्‍य था। जनात प इस पुस्‍तक का व्‍यापक प्रभाव पड़ा। इस पुस्‍तक ने जनता को तत्‍कालीन इंग्‍लैण्‍ड मे व्‍याप्‍त बुराइयों के विषय मे सोचने पर बाध्‍य किया तथा आधुनिक युग के समाज का आदर्श प्रस्‍तुत किया। रैम्‍जे म्‍योर के शब्‍दों में- यूरोपियों एक पवित्र प्रजातंत्र है जहाँ व्‍यवहारत: न तो कोई सरकार है, न कर-व्‍यवस्‍था है और न कोई अपराध ही होता है। ऑक्‍सफोर्ड विश्‍वविद्यालय के समान ही कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय के विद्वानों ने भी पुनर्जागरण का प्रसार किया। इन विद्वानों ने, जिनमें रिचर्ड क्रोक, थॉमस स्‍माइट, चेके तथा गजा प्रमुख हैं। अनेक पुस्‍तकों की रचनाएँ कीं तथा अन्‍य साहित्यिक कार्य कर पुनर्जागरण को शक्ति प्रदान की।

इन विद्वानों के अतिरिक्‍त पुनर्जागरण की सफलता का श्रेय ट्यूडर शासकों को भी है। हेनरी सप्‍तम, हेनरी अष्‍टम ने अपना सम्‍पूर्ण सहयोग पुनर्जागरण की प्रगति के लिये दिया। महारानी एलिजाबेथ के शासनकाल में पुनर्जागरण अपनी सफलता की चरम सीमा तक पहुँच गया। उसके शासनकाल में विशिष्‍ट सांस्‍कृतिक उन्‍नति इस बात का घोतक है।

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