अज़रबाइजान और आर्मेनिया के विवाद और युद्ध का इतिहास

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष एक लंबे समय से चली आ रही संघर्ष है जो विवादित क्षेत्र नॉर्नकोर्बाख के कब्जे को लेकर है। इस क्षेत्र में ज्यादातर जातीय अर्मेनियाई लोग रहते हैं, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अज़रबैजान का हिस्सा माना जाता है।

इस संघर्ष की जड़ें 19वीं सदी की शुरुआत में हैं, जब अर्मेनियाई और अज़रबैजानी लोगों ने इस क्षेत्र में बसना शुरू किया था। दोनों समूहों के अलग-अलग संस्कृति और धर्म हैं, और उनके बीच लंबे समय से संघर्ष का इतिहास रहा है।

20वीं सदी की शुरुआत में, यह क्षेत्र रूसी साम्राज्य का हिस्सा था। रूसी क्रांति के बाद, क्षेत्र को सोवियत संघ द्वारा नियंत्रित किया गया था। सोवियत काल के दौरान, नॉर्नकोर्बाख को अज़रबैजान सोवियत समाजवादी गणराज्य के भीतर स्वायत्त दर्जा दिया गया था।

1980 के दशक की शुरुआत में, नॉर्नकोर्बाख के अर्मेनियाई लोगों ने अर्मेनिया के साथ एकीकरण की मांग शुरू कर दी। इस मांग का अज़रबैजानी सरकार ने विरोध किया, और 1988 में दोनों समुदायों के बीच हिंसा भड़क उठी।

यह संघर्ष 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद युद्ध में बदल गया। यह युद्ध छह साल तक चला और अनुमानित 30,000 लोगों की मौत हो गई। 1994 में, एक युद्धविराम पर बातचीत की गई, लेकिन इसे कभी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया।

दूसरा नॉर्नकोर्बाख युद्ध सितंबर 2020 में शुरू हुआ। यह युद्ध 44 दिनों तक चला और अज़रबैजान की जीत हुई। अर्मेनिया ने नॉर्नकोर्बाख के अधिकांश हिस्से और आसपास के सात जिलों पर नियंत्रण खो दिया।

इस संघर्ष ने दोनों देशों पर विनाशकारी प्रभाव डाला है। हजारों लोग मारे गए या घायल हुए हैं, और सैकड़ों हजारों लोग अपने घरों से विस्थापित हो गए हैं। इस संघर्ष ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचाया है और उनकी विकास को बाधित किया है।

यह क्षेत्र अभी भी तनावपूर्ण है। युद्ध के बाद से कई बार युद्धविराम का उल्लंघन किया गया है, और फिर से लड़ाई छिड़ने का खतरा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक शांति समझौते में मध्यस्थता करने के लिए काम कर रहा है, लेकिन अब तक कोई समझौता नहीं हुआ है।

यहां अर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष के इतिहास में कुछ प्रमुख घटनाएँ दी गई हैं:

  • 1923: नॉर्नकोर्बाख स्वायत्त ओब्लास्ट को अज़रबैजान सोवियत समाजवादी गणराज्य के भीतर स्थापित किया गया था।
  • 1988: नॉर्नकोर्बाख के अर्मेनियाई लोगों ने अर्मेनिया के साथ एकीकरण की मांग की।
  • 1991: पहला नॉर्नकोर्बाख युद्ध छिड़ गया।
  • 1994: एक युद्धविराम पर बातचीत की गई।
  • 2020: दूसरा नॉर्नकोर्बाख युद्ध छिड़ गया।
  • 2021: एक युद्धविराम पर बातचीत की गई।
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आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष एक जटिल और अघुलनशील है। कोई आसान समाधान नहीं है, और यह क्षेत्र में आने वाले कई वर्षों तक तनाव का स्रोत बनी रहने की संभावना है।

अज़रबाइजान और आर्मेनिया विवाद के कारण

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष के कारण जटिल हैं और इतिहास में निहित हैं। कुछ मुख्य कारणों में शामिल हैं:

  • जातीय और धार्मिक मतभेद। नॉर्नकोर्बाख में ज्यादातर लोग जातीय अर्मेनियाई हैं, जबकि अज़रबैजान में ज्यादातर लोग जातीय अज़रबैजानी हैं। 19वीं शताब्दी से दोनों समूहों के बीच एक लंबा संघर्ष का इतिहास रहा है।
  • क्षेत्रीय विवाद। नॉर्नकोर्बाख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अज़रबैजान का हिस्सा माना जाता है, लेकिन यह ज्यादातर जातीय अर्मेनियाई लोगों द्वारा बसा हुआ है। नॉर्नकोर्बाख के अर्मेनियाई लोगों ने लंबे समय से अर्मेनिया के साथ एकीकरण की मांग की है, और इस मांग का अज़रबैजानी सरकार ने विरोध किया है।
  • भूमीय-राजनीतिक कारक। नॉर्नकोर्बाख संघर्ष को अर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच एक छद्म युद्ध के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें दोनों देशों को शक्तिशाली सहयोगियों का समर्थन प्राप्त है। अर्मेनिया को रूस का समर्थन प्राप्त है, जबकि अज़रबैजान को तुर्की का समर्थन प्राप्त है।
  • सोवियत संघ का पतन। 1991 में सोवियत संघ के पतन से क्षेत्र में सीमाओं का पुनर्निर्धारण हुआ, और इसने अर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच नए तनाव पैदा किए।
  • राष्ट्रीयता का उदय। अर्मेनिया और अज़रबैजान दोनों में राष्ट्रवाद का उदय भी इस संघर्ष में योगदान दिया है। दोनों देशों के राष्ट्रवादी नेताओं ने सत्ता हासिल करने के लिए दोनों समूहों के बीच जातीय और धार्मिक मतभेदों का फायदा उठाने की कोशिश की है।

ये अर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष के कुछ मुख्य कारण हैं। संघर्ष जटिल है और इसका कोई एक कारण नहीं है जो इसे समझा सके। यह संभावना है कि एक संयोजन कारकों ने संघर्ष में योगदान दिया है, और यह भी संभावना है कि संघर्ष क्षेत्र में आने वाले कई वर्षों तक तनाव का स्रोत बना रहेगा।

अर्मेनिया-अज़रबैजान के विवाद का समय विवरण

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष एक लंबे समय से चली आ रही संघर्ष है जो विवादित क्षेत्र नॉर्नकोर्बाख के कब्जे को लेकर है। यहां कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं का समयरेखा दिया गया है जो इस संघर्ष में हुई हैं:

  • 1923: नॉर्नकोर्बाख स्वायत्त ओब्लास्ट को अज़रबैजान सोवियत समाजवादी गणराज्य के भीतर स्थापित किया गया था।
  • 1988: नॉर्नकोर्बाख के अर्मेनियाई लोगों ने अर्मेनिया के साथ एकीकरण की मांग की।
  • 1991: पहला नॉर्नकोर्बाख युद्ध छिड़ गया।
  • 1994: एक युद्धविराम पर बातचीत की गई।
  • 2008: मार्दाकेर्ट में झड़पें हुईं।
  • 2010: नॉर्नकोर्बाख में झड़पें हुईं।
  • 2020: दूसरा नॉर्नकोर्बाख युद्ध छिड़ गया।
  • 2021: एक युद्धविराम पर बातचीत की गई।
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पहला नॉर्नकोर्बाख युद्ध छह साल तक चला, जिसमें अनुमानित 30,000 लोगों की मौत हो गई। युद्ध एक युद्धविराम के साथ समाप्त हुआ, जिसने नॉर्नकोर्बाख को अर्मेनियाई बलों के नियंत्रण में छोड़ दिया, लेकिन सात आसपास के जिले अज़रबैजानी नियंत्रण में रहे।

दूसरा नॉर्नकोर्बाख युद्ध 44 दिनों तक चला, जिसमें अज़रबैजान की जीत हुई। अर्मेनिया ने नॉर्नकोर्बाख के अधिकांश हिस्से और आसपास के सात जिलों पर नियंत्रण खो दिया। युद्ध में अनुमानित 6,000 लोगों की भी मौत हो गई।

इस संघर्ष ने दोनों देशों पर विनाशकारी प्रभाव डाला है। हजारों लोग मारे गए या घायल हुए हैं, और सैकड़ों हजारों लोग अपने घरों से विस्थापित हो गए हैं। इस संघर्ष ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचाया है और उनकी विकास को बाधित किया है।

क्षेत्र में स्थिति अभी भी तनावपूर्ण है। युद्ध की समाप्ति के बाद से कई बार युद्धविराम का उल्लंघन किया गया है, और फिर से लड़ाई छिड़ने का खतरा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक शांति समझौते में मध्यस्थता करने के लिए काम कर रहा है, लेकिन अब तक कोई समझौता नहीं हुआ है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का अज़रबाइजान और आर्मेनिया के विवाद मे भूमिका

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष क्षेत्र में कई वर्षों से तनाव का स्रोत रहा है, और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इसे हल करने की कोशिश में शामिल रहा है। यहां इस संघर्ष में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भागीदारी के कुछ प्रमुख खिलाड़ी हैं:

  • संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र अर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष में 1990 के दशक की शुरुआत से शामिल है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने युद्धविराम और संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान करते हुए कई प्रस्ताव पारित किए हैं। हालांकि, ये प्रस्ताव लड़ाई को रोकने में प्रभावी नहीं रहे हैं।
  • सुरक्षा और सहयोग में यूरोपीय संगठन (OSCE): OSCE एक क्षेत्रीय सुरक्षा संगठन है जो 1990 के दशक की शुरुआत से अर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष में शामिल है। OSCE ने कई युद्धविराम समझौतों में मध्यस्थता करने में मदद की है, और यह वर्तमान में शांति के लिए एक रोडमैप पर काम कर रहा है।
  • यूरोपीय संघ: EU अर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष में 2000 के दशक की शुरुआत से शामिल है। EU ने दोनों देशों को वित्तीय सहायता प्रदान की है, और यह दोनों पक्षों के बीच बातचीत को बढ़ावा देने के लिए भी काम कर रहा है।
  • रूस: रूस अर्मेनिया का एक करीबी सहयोगी है, और यह पूरे संघर्ष में अर्मेनिया को सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है। रूस भी युद्धविराम समझौतों में मध्यस्थता में शामिल रहा है।
  • तुर्की: तुर्की अज़रबैजान का एक करीबी सहयोगी है, और यह पूरे संघर्ष में अज़रबैजान को सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है। तुर्की ने भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की संघर्ष में भागीदारी की आलोचना की है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष को हल करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन यह एक कठिन कार्य रहा है। संघर्ष जटिल है और कोई आसान समाधान नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय क्षेत्र में शांति लाने का रास्ता खोजने के लिए काम कर रहा है, लेकिन यह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया होने की संभावना है।

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अज़रबाइजान और आर्मेनिया के विवाद की वर्तमान स्थिति

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष की वर्तमान स्थिति तनावपूर्ण है। 2021 में दूसरे नॉर्नकोर्बाख युद्ध की समाप्ति के बाद से कई बार युद्धविराम का उल्लंघन हुआ है, और फिर से लड़ाई छिड़ने का खतरा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक शांति समझौते में मध्यस्थता करने के लिए काम कर रहा है, लेकिन अब तक कोई समझौता नहीं हुआ है।

सितंबर 2022 में, अर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच अर्मेनिया-अज़रबैजान सीमा पर दो दिन का संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में कई लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों अन्य लोग विस्थापित हो गए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने हिंसा की निंदा की और युद्धविराम पर वापसी का आह्वान किया।

क्षेत्र की स्थिति अभी भी अस्थिर है। फिर से लड़ाई छिड़ने का खतरा है, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे रोकने के लिए काम कर रहा है। हालांकि, यह संभावना है कि संघर्ष कई वर्षों तक क्षेत्र में तनाव का स्रोत बना रहेगा।

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष में शांति के लिए कुछ चुनौतियां हैं:

  • नॉर्नकोर्बाख पर क्षेत्रीय विवाद: दोनों देशों के पास नॉर्नकोर्बाख की स्थिति पर अलग-अलग विचार हैं। अर्मेनिया नॉर्नकोर्बाख को एक स्वतंत्र राज्य मानता है, जबकि अज़रबैजान इसे अपनी क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
  • विदेशी सैनिकों की उपस्थिति: रूस का अर्मेनिया में सैन्य उपस्थिति है, और तुर्की का अज़रबैजान में सैन्य उपस्थिति है। इन विदेशी सैनिकों की उपस्थिति शांति समझौते पर पहुंचना मुश्किल बनाती है।
  • दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी: दोनों पक्षों के बीच एक लंबा अविश्वास का इतिहास है, और यह शांति समझौते पर बातचीत करना मुश्किल बनाता है।
  • मजबूत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ की कमी: ऐसा कोई मजबूत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ नहीं है जो दोनों पक्षों को एक साथ ला सके और उन्हें शांति समझौते तक पहुंचने में मदद कर सके।

आर्मेनिया-अज़रबैजान संघर्ष एक जटिल और कठिन संघर्ष है जिसका समाधान करना है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए प्रतिबद्ध है।

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