हाथ कंगन को आरसी क्या का अर्थ?

“हाथ कंगन को आरसी क्या” (hath kangan ko aarsi kya) यह एक हिन्दी यह एक हिन्दी लोकोक्ति हैं, और इसका अर्थ होता हैं की की “जो सामने हैं, उसे प्रमाण की क्या आवश्यकता हैं।” जो स्पष्ट दिख रहा हैं, उसमे प्रमाण मांगने की कोई आवश्यकता नहीं हैं, इस लोकोक्ति का अर्थ यही निकल कर आता हैं।

यह लोकोक्ति बहुत ही पुरानी हैं, इसमे आरसी शब्द का अर्थ एक खास प्रकार की अंगूठी को कहा जाता हैं, जिसमे काँच लगा होता हैं और महिलाएं, उसमे अपना प्रतिबिंब देखा करती थी। जिस तरीके से आज मोबाइल का फ्रंट कैमरे की मदद से महिलाएं अपना चेहरा देखती हैं, ठीक उसी तरह से पुराने जमाने मे एक विशेष अंगूठी होती थी, जिसमे दर्पण लगा होता था, उस दर्पण का इस्तेमाल करके महिलाएं अपना प्रतिबिंब देखा करती थी। अंगूठी मे लगे हुये उस दर्पण को ही आरसी कहते हैं।

हाथ कंगन को आरसी क्या का शब्दो मे प्रयोग

हाथ कंगन को आरसी क्या का इस्तेमाल हम वहाँ करते हैं, जहां पर विषय हमारे सामने मौजूद हो, और हम अपने कहे का प्रमाण देना चाहते हैं।

पहला उदाहरण के लिए – संगीता बहुत ही सुरीला गाती हैं, एक सभा मे वो बैठी हुई हैं, तभी उस सभा मे कोई बोलता हैं की संगीता बहुत ही सुरीला गाती हैं। लेकिन सभा मे बहुत से लोगो को यकीन नहीं हो रहा हैं, तब वही व्यक्ति “हाथ कंगन को आरसी क्या” लोकोक्ति का इस्तेमाल करके फिर से सभा को विश्वास दिलाते हुये बोलेगा।

संगीता जी बहुत ही सुरीला गाना गाती हैं, सामने बैठी हुई हैं, आपको विश्वास नहीं हैं तो उनसे गाना गाने का निवेदन करिए। हाथ कंगन को आरसी क्या, अभी सिद्ध हो जाएगा।

दूसरा उदाहरण – राजू एक बस मे यात्रा कर रहा था, तभी उसके ऊपर चोरी का आरोप लगा, तो उसने भी हाथ कंगन को आरसी क्या लोकोक्ति का इस्तेमाल करके अपने बातचीत को आगे बढ़ाया।

राजू ने कहा – मैंने चोरी नहीं की हैं, मैं यही खड़ा हुआ हूँ तो “हाथ कंगन को आरसी क्या?”। आप लोग मेरी जांच पड़ताल कर लीजिये। अभी सब कुछ साफ हो जाएगा।

हाथ कंगन तो आरसी क्या? के पीछे की कहानी

कसी जमाने मे काँच बहुत ही महंगा हुआ करता हैं, इसलिए अनूठी मे काँच लगवाना, सबके बस की बात नहीं होती थी। लेकिन जिस व्यक्ति के हाथ मे काँच से जड़ा हुआ कंगन हो तो उसके लिए अंगूठी का कोई मूल्य नहीं हैं, जब उसकी इच्छा होगी तब वह अंगूठी बनवा सकता हैं। अगर इस बात लोकोक्ति का आधुनिकरण किया जाए तो नया लोकोक्ति “घर मोटरसाइकिल तो साइकिल क्या” बनेगा। यानि की जिसके पास मोटर साइकिल हैं उसे साइकिल की क्या आवश्यकता हैं। और जब उसकी इच्छा होगी वह साइकिल ले सकता हैं।

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उस जमाने मे अगर किसी को अंगूठी चपरी का इल्जाम लगेगा तो वह यही कहेगा, देखो मैंने हाथ मे कंगन पहना हुआ हैं तो अंगूठी मेरे लिए मूल्यवान नहीं हैं। तब इस प्रकार का लोकोक्ति का जन्म हुआ, और जब भी किसी व्यक्ति पर कोई इल्जाम लगता और अगर वह प्रत्यक्ष रूप से इल्जाम का खंडन करता तो यही लोकोक्ति बोलता की हाथ कंगन को आरसी क्या।

अब इसे आधुनिक रूप से समझिए की अगर किसी व्यक्ति के पास कार हैं और उसके ऊपर साइकल की चोरी का इल्जाम लगे तो वह यही कहेगा की घर में मेरे कार हैं तो साइकिल मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं हैं। “घर कार तो साइकिल क्या”, जब मई 7 लाख खर्च करके एक कार खरीद सकता हूँ तो क्या मैं 3 हजार के साइकिल नहीं खरीद सकता।

आशा हैं की आप सभी पाठक गण को इस लोकोक्ति का मतलब समझ आ गया होगा। आपने भाव और सुझाव प्लीज नीचे कमेन्ट करके हमे एनने विचारो से अवगत जरूर कराये।

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