हिन्दू विवाह क्या धार्मिक संस्कार हैं, हिन्दू विवाह के प्रकार कौन से हैं?

हिन्दू विवाह क्या धार्मिक संस्कार हैं?

हिन्दू विवाह एक स्थायी बंधन न होकर एक पवित्र और स्थायी बन्धन है। इसमें किसी भी प्रकार से अस्थायी विवाह की आज्ञा नहीं है। विवाह के उद्देश्य से स्पष्ट है कि विवाह का सर्वप्रथम और महत्वपूर्ण उद्देश्य धर्म का पालन है। इस कारण ही हिन्दू विवाहों को एक धार्मिक संस्कार कहा गया है। हिन्दुओं में विवाह एक अनिवार्य कृत्य माना जाता है, जो पुरुषार्थों की प्राप्ति एवं ऋणों की मुक्ति का साधन कहा गया है। संस्कार का अर्थ है “उन पवित्र विधि-विधानों अथवा धार्मिक कृत्यों में है, जो व्यक्ति शारीरिक, सामाजिक, मानसिक व आध्यात्मिक शुद्धि के लिए किए जाते हैं।”

निम्नलिखित कारणों से हिन्दू विवाह को धार्मिक संस्कार कहा जाता है-

  1. हिन्दू विवाह का स्थायी आधार-हिन्दू विवाह को धार्मिक संस्कार इसलिये भी माना गया है कि विवाह को स्थायी रूप दिया गया है। विवाह के बंधन में पति-पत्नी का सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तर का माना गया है। इस सम्बन्ध को किसी भी रूप में तोड़ा नहीं जा सकता। पति के लिये पत्नीव्रत धर्म और पत्नी के लिये पतिव्रत धर्म का पालन अनिवार्य कहा गया है। मुसलमानों के समान अस्थायी विवाह की आज्ञा इसमें नहीं है।
  2. विवाह मोक्ष का आधार – हिन्दू जीवन-दर्शन में मोक्ष को जीवन का अन्तिम लक्ष्य कहा गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति केवल गृहस्थाश्रम में ही हो सकती है। इस कारण गृहस्थाश्रम को सब आश्रमों में श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। यही नहीं विवाह के बिना व्यक्ति वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम के उत्तरदायित्व को भी पूरा नहीं कर सकता है। अविवाहित व्यक्ति कितनी भी तपस्या क्यों न करे उसे कभी मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। इस कारण प्रत्येक हिन्दू के लिये विवाह एक अनिवार्य कार्य है।
  3. विवाह में धार्मिक विधि विधानों का समावेश-हिन्दू विवाह तब तक नहीं माना जाता है, जब तक उसमें धार्मिक अनुष्ठानों और रीतियों को सम्मिलित नहीं किया जावे। ये धार्मिक रीतियाँ विवाह, होम, कन्यादान, पाणिग्रहण, अग्निपरिणयन, सप्तपदी आदि हैं। विवाह होम में अग्निदेव को आहुतियाँ दी जाती हैं। पाणिग्रहण के अन्तर्गत कन्या के पिता हाथ में जल लेकर मंत्रों का उच्चारण करते हुये कन्या का दान वर को करते हैं। सप्तपदी के अन्तर्गत वर-वधू दो गाँठ बाँधकर अग्नि के चारों ओर सात कदम चलते हैं। ये सभी क्रियाएँ धार्मिक हैं और इनमें से एक के बिना विवाह पूर्ण नहीं माना जाता है।
  4. हिन्दू विवाह एक पवित्र बन्धन है-हिन्दू विवाह को एक पवित्र बन्धन इस कारण कहा जाता है कि इसमें ईश्वर को साक्षी रखकर धार्मिक कार्य किये जाते हैं। यह बंधन स्थायी और जन्म-जन्मान्तर का माना जाता है। इस बंधन से बाहर किसी भी प्रकार के सम्बन्ध उचित नहीं माने जाते हैं।
  5. विवाह में पतिव्रत की धारणायें-हिन्दू विवाह में पतिव्रत और सतीत्व की धारणायें देखने को मिलती हैं। पतिव्रत का अर्थ है कि पत्नी विवाह के पश्चात् किसी अन्य परुष का विचार न करे। प्रो. कापड़िया ने इस बारे में लिखा है-“जिस प्रकार नदी समुद्र में मिलने के बाद अपनी स्वतंत्र सत्ता को छोड़ देती है, उसी प्रकार हिन्दू पत्नी से आशा की जाती है कि वह अपनी स्वतंत्र सत्ता को पति में विलीन कर दे और उसका (पत्नी) जीवन में केवल यही आदर्श है कि वह देखे कि पति की सब सेवाएँ उचित रूप से सम्पन्न होती हैं। व पति की संतुष्टि ही पत्नी के जीवन का चरम सुख है।”
  6. कन्यादान का आदर्श-हिन्दू समाज में विवाह के समय कन्या का दान भगवान को साक्षी बनाकर किया जाता है। इस प्रकार यह एक धार्मिक कृत्य है और इसी कारण हिन्दू समाज में पुनर्विवाह निषेध है।
  7. विवाह का आधार धर्म-हिन्दू विवाह के उद्देश्यों में सबसे अधिक महत्व धर्म को दिया जाता है। प्रत्येक हिन्दू को जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक धार्मिक संस्कार पूरे करने होते हैं। प्रो. कापड़िया ने भी इस बारे में लिखा है- “हिन्दू विचारकों ने धर्म को विधान का प्रथम और सर्वोच्च लक्ष्य माना है और सन्तानोत्पादन को दूसरा स्थान दिया है तो स्वाभविक है कि विवाह पर धर्म का आधिपत्य हो।” इस प्रकार वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने के लिये व्यक्ति को अनेक धार्मिक कृत्य और अनुष्ठान करने होते हैं। इसलिये हिन्दू विवाह में धर्म को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इन सब कारणों से हिन्दू विवाह को एक पवित्र धार्मिक संस्कार कहा गया है।
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हिन्दू विवाह के प्रकार कौन से हैं?

मनु ने हिन्दू विवाह के आठ प्रकार बताये हैं। जिनमें प्रथम चार ब्रह्म, दैव, आर्य और प्रजापत्य श्रेष्ठ और धर्मानुसार माने गये हैं तथा शेष चार असुर, गन्धर्व, राक्षस और पिशाच निकृष्ट कोटि के समझे गये। प्रथम चार प्रकार के विवाहों से उत्पन्न सन्तान यशस्वी, शीलवान, अध्ययनशील, सम्पत्तिवान और धर्म आचरण करने वाली होती है जबकि शेष चार प्रकार के विवाहों से उत्पन्न सन्तान दुराचारी, विरोधी और असामाजिक होती है। मनु द्वारा बताये गये आठ प्रकार के विवाहों में छः को ही हिन्दू समाज ने मान्यता दी है। पिशाच और राक्षस विवाह को सामाजिक स्वीकृति नहीं दी गई क्योंकि इनसे स्त्री के सामाजिक सम्मान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था। हिन्दू विवाह के प्रमुख आठ प्रकार के विवाह का संक्षेप में उल्लेख निम्नानुसार है-

ब्रह्म विवाह (Brahm Marriage ) 

ब्रह्म विवाह वह विधि है जिसके अन्तर्गत पिता कन्या के लिए उचित एवं योग्य वर की खोज करता है और उसे अपने यहाँ धार्मिक रीतियों के अनुसार आमन्त्रित करता है। अनेक धार्मिक संस्कारों के बाद कन्या को वस्त्र, अलंकार आदि से सम्पन्न करके वर को ‘दान’ के रूप में दे दिया जाता है। आज दान में दी गयी वस्तु का दूसरा ही अर्थ लगाया जाता है, लेकिन प्राचीन समय में दान का अर्थ था- “किसी सुपात्र को कोई वस्तु • प्रदान करना।” आज के अधिकांश हिन्दू-विवाह इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

दैव विवाह (Daiva Marriage)

इस प्रकार के विवाह में कन्या के पिता एक यज्ञ की व्यवस्था करते हैं और वस्त्र तथा अलंकारों से सुसज्जित कन्या का दान उस व्यक्ति को किया जाता है जो उस यज्ञ को उचित ढंग से पूरा करता है। प्राचीनकाल में यज्ञ का अधिक महत्त्व होने के कारण पुरोहित से कन्या का विवाह करना अच्छा माना जाता था। मनु ने तो यहाँ तक कहा कि ऐसे विवाह से उत्पन्न संतान सात पीढ़ी ऊपर और सात पीढ़ी नीचे के व्यक्तियों का उद्धार करती है। लेकिन ऐसे विवाह में वर और वधू की आयु में काफी भिन्नता हो जाने की सम्भावना रहती है। आजकल ऐसे विवाह प्रचलन में नहीं है।

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प्रजापत्य विवाह (Prajapatya Marriage)

वर और वधू को वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में उपदेश देकर ‘तुम’ दोनों मिलकर गृहस्थ धर्म का पालन करना और तुम दोनों का जीवन सुखी एवं समृद्धशाली हो। विधिवत् वर की पूजा करके कन्या का दान ही प्रजापत्य विवाह है। ब्रह्म-विवाह और प्रजापत्य विवाह में कोई विशेष अन्तर नहीं, लेकिन प्रजापत्य विवाह में उक्त कथन को स्पष्ट रूप से कह देना आवश्यक है। कुछ विद्वानों का मत है कि प्रारंभ में प्रजापत्य विवाह था ही नहीं। लेकिन विवाह के प्रकार को ठीक बनाने के लिये इसका प्रचलन बाद में हुआ।

आर्ष विवाह (Arsha Marriage )

आर्ष विवाह का अर्थ ऋषि शब्द से सम्बन्धित है। कन्या का पिता जब विवाह करने के इच्छुक ऋषि से एक जोड़ा बैल अथवा गाय लेकर उसके साथ अपनी कन्या का विवाह कर देता है, तब ऐसा विवाह आर्ष विवाह कहलाता है। इसे कन्या का मूल्य नहीं समझना चाहिये, क्योंकि ऋषि लोग विवाह के सम्बन्ध में उदासीन हुआ करते हैं। इसलिये विवाह करने के इच्छुक ऋषि को अपनी भावी ससुर को एक गाय अथवा बैल देने पड़ते थे, ताकि यह प्रमाणित हो जाए कि ऋषि ने अब विवाह बंधन को स्वीकार कर लिया है।

असुर विवाह (Asur Marriage)

असुर विवाह में विवाह के लिये इच्छुक व्यक्ति को कन्या के पिता या अभिभावक को कन्या का मूल्य चुकाना पड़ता है। इसके अनुसार कन्या का कुछ मूल्य पहले ही निश्चित हो जाता है और उसे चुकाये बिना विवाह नहीं हो सकता। यह मूल्य कन्या के गुण और परिवार पर आधारित होता है। कुछ विद्वान इस राशि को कन्या की पूरक राशि मानते हैं, जो उसके माता-पिता को मिलना वांछित है। लेकिन उच्च जातियों में ऐसा विवाह करना एक अपराध की दृष्टि से देखा जाता है।

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गान्धर्व विवाह (Gandharve Marriage )

जब विवाह कन्या और वर के परस्पर प्रेम के फलस्वरूप उनकी इच्छा के अनुसार होता है। ऐसे विवाहों में माता-पिता की इच्छा का कोई महत्व नहीं होता है। इस प्रकार के विवाह में शरीर सम्भोग विधिवत् विवाह होने के पूर्व भी हो सकता है।

राक्षस विवाह (Rakshasa Marriage ) 

जब लड़ाई करके छोन-झपटकर या युद्ध में स्त्री का हरण करके उसके साथ विवाह किया जाये, तब ऐसे विवाह को राक्षस विवाह कहते हैं। महाभारत काल में इस प्रकार के विवाह का सबसे अधिक प्रचलन था। इस प्रकार स्त्रियों को युद्ध का पुरस्कार माना जाता था और उसको प्राप्त करने के लिये कन्या पक्ष के लोगों पर आक्रमण किया जाता था और शक्ति के द्वारा कन्या को जबरदस्ती उठा ले जाकर विवाह किया जाता था। युद्ध से प्रत्यक्ष सम्बन्ध क्षत्रियों का था, इसलिये इसे क्षात्र विवाह भी कहते हैं।

पिशाच विवाह (Pishach Marriage)

मनु के अनुसार, “सोई हुई, शराब आदि पी हुई या अन्य प्रकार से उन्मत्त स्त्री के साथ किसी न किसी प्रकार से बलपूर्वक या धोखा देकर यौन सम्बन्ध स्थापित कर लिया जाता है और इसके बाद विवाह किया जाता है तो उसे पिशाच विवाह कहते हैं।” विवाह संस्कार पूरा कर लेने के बाद इस प्रकार के स्त्री- पुरुष को समाज वर-वधू के रूप में स्वीकार कर लेता है, जिससे कि पुरुष की काम-वासना का शिकार होने के फलस्वरूप उस लड़की का जीवन नष्ट न हो जाये।

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