बहुत पुरानी बात है, एक नगर था बादलपुर। उसमें एक मजदूर रहता था, जिसका नाम था किशन। उस नगर के चारों तरफ पहाड़ और जंगल फैले हुए थे।

जंगलों में रहने वाले डाकू अक्सर रात के वक्त नगर पर हमला बोल देते थे। नगरवासियों के पास जो कुछ भी होता था, डाकू वह सब कुछ छीनकर ले जाते थे। पूरा बादलपुर उन डाकुओं की वजह से बड़ा परेशान था।

एक बार की बात है, एक बड़ा अमीर सेठ उस नगर में आया। उस समय रात काफी हो चुकी थी इसलिए उसने आगे जाना मुनासिब नहीं समझा। तभी उसकी नजर एक घर के दरवाजे पर पड़ी तो उसने उसे खटखटाया।

दरवाजा मजदूर किशन ने खोला तो सेठ ने कहा- “भाई, मुझे इससे आगे वाले नगर में जाना है लेकिन इस समय रात बहुत ज्यादा हो चुकी है। क्या तुम मुझे अपने घर में एक रात के लिए रुकने की जगह दे सकते हो?”

किशन बड़ा दयालु और सज्जन व्यक्ति था। उसने अपने घर आए मेहमान का स्वागत किया और कहने लगा- “क्यों नहीं। अन्दर आ जाइये। अब आप इसे अपना ही घर समझिये। आप यहां आराम से रात गुजार सकते हैं।”

घर में रूखा-सूखा जैसा भी खाना बना हुआ था, किशन ने ले जाकर उनके सामने रख दिया। और इसके बाद उसने उसका सोने का भी इन्तजाम कर दिया।

आधी रात के वक्त अचानक शोरगुल की आवाज सुनकर सेठजी की आंखें खुल गई। उसने देखा कि वह किशन अपने हाथ में एक पोटली दबाए इस कोने से उस कोने तक बेचैनी के साथ चक्कर लगा रहा था।

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उसे इस तरह चक्कर काटते देख सेठ की समझ में कुछ भी नहीं आया और बड़ी उत्सुकतावश उस किशन से पूछा- “क्यों भाई, क्या बात हो गई?”

“सेठ जी! गांव पर डाकुओं ने हमला बोल दिया है। मैंने बड़ी मेहनत से कुछ रुपये बचाकर रखे थे कि कन्या की शादी के वक्त काम आयेंगे। लेकिन अब मुझे डर लग रहा है कि कहीं ये रुपये मुझसे डाकू छीनकर न ले जाएं। अब आप ही कोई उपाय बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए।” किशन ने सेठजी से कहा।

सेठजी पहले तो कुछ सोचने लगे, फिर वह बोले- “अरे, इसमें इतना परेशान होने वाली कौन-सी बात है? जल्दी से सामने एक गड्ढा खोदकर अपने धन की पोटली उसमें छिपा दो।”

किशन ने सेठजी का सुझाव मानकर तुरन्त एक गड्ढा खोदकर उसमें धन की पोटली छिपा दी।

कुछ देर पश्चात् ही सात-आठ डाकुओं का दल मजदूर के घर में घुस आया। उनका सरदार दहाड़ते हुए बोला- “अपनी जान की सलामती चाहते हो तो सारा धन मेरे हवाले कर दो, वरना सब अपनी-अपनी जान से हाथ धो बैठोगे।”

किशन अपने घर की पूरी हालत गिड़गिड़ाते हुए बताने लगा तो सरदार ने तुरन्त अपने आदमियों को आदेश दिया कि वे लोग मजदूर के घर की पूरी तलाशी लें।

इससे पहले कि डाकू किशन के घर में तलाशी लेते, सेठ फौरन बोल पड़ा- “आप लोग तलाशी क्यों ले रहे हो, मैं आप को बताता हं कि धन इसने कहां पर छिपाकर रखा है।”

इतना कहकर सेठ ने सामने की तरफ उंगली से इशारा करते हुए बताने लगा- “आप लोग यहां से इस जमीन को खोदकर देखें।” डाकुओं ने वह जगह खोद डाली। कुछ देर पश्चात् डाकुओं के हाथ वह पोटली लग गई जिसमें धन था।

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उन्होंने वह पोटली बाहर निकाल ली जिसमें धन था, उसके बाद उन्होंने मजदूर को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया और सारे डाकू बाहर निकल गए।

इधर मजदूर को सेठ के ऊपर सन्देह होने लगा- वह सोच रहा था कि हो न हो यह सेठ जरूर डाकुओं का ही आदमी है। तभी तो उसने मुझे खुद ही पहले धन जमीन में दबाने के लिए कहा और फिर इसने डाकुओं को इसका पता भी बता दिया। यह मेरे घर में किसी साजिश के तहत ही घुसकर आया था।

मजदूर ने जब यह देखा कि वह सेठ डाकुओं के साथ नहीं गया है तो उसे हैरानी हुई।

डाकुओं के चले जाने के पश्चात् मजदूर ने अपने घर का दरवाजा बन्द कर दिया और सेठजी के पास बैठकर बड़े गुस्से में काफी देर तक भला-बुरा कहता रहा। सेठ उसकी बातें सुनकर मुस्कराता रहा। जब किशन काफी भला-बुरा कह चुका तो अपने आप ही खामोश होकर बैठ गया।

अब सेठ ने नम्रतापूर्वक किशन से कहा- “भाई, अब तुम मेरी बात शान्तिपूर्वक सुन लो- दरअसल मैंने डाकुओं को तुम्हारे धन का पता बताकर तुम्हारे साथ अपने आप को भी भारी नुकसान से बचाया है। तुम नहीं जानते कि अगर डाकू तुम्हारे घर की तलाशी लेते तो उनके हाथ तम्हारे साथ-साथ मेरे धन की पोटली भी लग जाती जिसमें मेरा बहुत-सा धन और जेवर थे। जिन्हें बेचने के लिए और रुपये कमाने के लिए मैं दूसरे शहर में जा रहा हूं। मैंने डाकुओं को तुम्हारी पोटली का पता बताकर उनका ध्यान उस तरफ लगा दिया और उन लोगों को तुम्हारे घर की तलाशी लेने से रोक दिया।”

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इतना कहकर सेठ ने अपनी पोटली निकाली और उसमें से काफी सारा धन किशन को दिया और फिर कहने लगी- “यह सारा धन तुम्हारा है जो डाकू ले गये। साथ ही ये कुछ गहने हैं जो तुम्हारी बेटी के लिए मेरी तरफ से शादी में चढ़ा देना। अब तुम उसकी शादी बड़ी धूमधाम से करना।”

यह सब देखकर किशन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वो सोच रहा था कि सेठ ने कितनी बुद्धिमानी का कार्य किया था।

प्यारे बच्चों! हमें इस कहानी से ये शिक्षा मिलती है कि हमें किसी भी संकट के समय घबराना नहीं चाहिए, बल्कि बुद्धिमानी से कार्य करना चाहिए। बुद्धिमानी से सारे संकट एक पल में टल जाते हैं।

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