एक बस्ती में मोनू था, माला थी, भोलू था, सोना थी और था हसन । सबके सब अलग-अलग उम्र और जाति के । समानता थी तो केवल यह कि पाँचों अच्छे दोस्त थे और पांचवीं कक्षा तक एक ही स्कूल में पढ़ते थे। कुछ इस तरह कि हसन जब पांचवीं कक्षा में था, सोना और माला तब तीसरी कक्षा में थीं ओर मोनू व भोलू चौथी कक्षा में । माला को उसके माँ-बाप ने पांचवीं कक्षा पास करने के बाद स्कूल जाना बन्द करा दिया था और वह दिन भर घर और खेत का काम करने लगी थी। सोना छठी कक्षा से लड़कियों के स्कूल में भर्ती हो गई थी। भोलू भोला-भाला था । पढ़ाई लिखाई में उसका मन बिल्कुल भी नहीं लगता था । पांचवीं पास करते ही उसने – घर पर कह दिया था कि वह घर-बाहर का कुछ भी काम कर लेगा, लेकिन स्कूल नहीं जाएगा । मां-बाप ने तुरन्त उसकी बात मान ली थी, क्योंकि गरीबी के कारण वे उसके स्कूल जाने को घाटे का सौदा समझते थे । भोलू को उसके पिता ने बस्ती में एक परचून वाले की दुकान पर दो सौ रुपए माहवार नौकरी पर लगवा दिया था । मोनू और हसन ने स्कूल जाना जारी रखा था और इन दिनों मोनू सातवीं में और हसन आठवीं कक्षा में पढ़ते थे।

ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ये सभी दोस्त अलग-अलग हो गए थे लेकिन बचपन का मेलजोल इतनी आसानी से खत्म नहीं होता । अलग हो जाने के बावजूद ये सब बचपन की तरह ही हर शाम खेलने के लिए घरों से निकलते और बस्ती के पश्चिम छोर पर बने बगियानुमा खेतिया-थान पर जा पहुंचते । वहां पहुंचकर इधर-उधर की गप्पें हांकने की बजाय वे कुछ काम की बातें किया करते । स्कूल जाने वाले स्कूल की, भोलू बाजार की और माला खेत व घर-बस्ती की बातें बताती । क्योंकि माला आगे भी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी लेकिन घरवालों के कारण स्कूल नहीं जा सकी, इसलिए चीजों को जानने की अभिलाषा उसके मन में हरदम बनी रहती । वह करीब-करीब रोजाना ही एक ऐसा सवाल वहाँ आकर पूछती कि कभी-कभी तो उनमें से किसी को भी उसका जवाब नहीं सूझता था । ऐसी हालत में वे मुख्यतः तीन लोगों से अपनी समस्या का समाधान पूछते थे । ये तीन थे-बस्ती के बुजुर्ग। पत्रकार बलराज बाबा, हसन के विज्ञान-अध्यापक श्यामजी और सोनू की हिन्दी अध्यापिका सुशीला दीदी।

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“हसन भैया एक बात बताऊँ।” बाजार से सौदा लेकर घर की ओर लौटते हुए एक शाम माला को रास्ते में हसन मिल गया तो उसने पूछा।

“बताओ।”

“यह चन्द्रमा है न ।” ऊपर आकाश में चमकते चन्द्रमा की ओर इशारा करके वह जैसे एक रहस्य पर से परदा उठाती हुई बोली, “यह धरती पर जितनी भी गाएँ हैं उन सबका भाई है।”

“अच्छा ” हसन आँखें फैलाकर बोला ।

“हाँ।” माला बोली, “अभी इस समय यह बात मेरे दिमाग में आई है।”

“सो कैसे?” हसन ने पूछा ।

“देखो, हम भारतवासी गाय को माता कहते हैं और चन्दा को मामा । कहते हैं कि नहीं ।”

“हाँ।”

“तो, इस नाते दोनों भाई-बहन हुए कि नही ?” -माला ने कहा।

उसकी इस बात पर हसन ठठाकर हँस पड़ा।

“हँस क्यों रहे हैं ?” माला ने मुँह फुलाकर पूछा।

“तुम्हारे भोलेपन पर ।” हसन ने कहा और हँसता हुआ अपने घर में घुस गया ।

माला की समझ में हसन का यह व्यवहार बिल्कुल भी नहीं आया । क्या उसकी बात हँसी में उड़ा देने वाली थी । मामा तो माँ के भाई को ही कहते हैं, वह सोचने लगी, तब ? ओह, मैं समझ गई, चन्दा तो गाय के साथ-साथ धरती का भी भाई है, इसे भी तो हम ‘माता’ ही कहते हैं । ऐसा नहीं कहा इसीलिए हसन हँसा होगा।

यही सब सोचते-सोचते वह भी अपने घर में घुस गई। अगले दिन जब सभी दोस्त खेतिया-थान पर इकट्ठे हुए तो हसन माला को देखते ही पुनः हँस पड़ा।

“क्या है हसन भैया । आप कल भी मेरी बात पर हँस रहे थे ।” माला बोली, “इस तरह बनाओगे तो मैं घर चली जाऊँगी, हाँ।”

“मैं तुम्हें बना नहीं रहा हूँ बल्कि हैरान हूँ तुम्हारी अक्ल पर ।” हसन बोला, “यह हरदम कुछ न कुछ सोचती ही रहती है।”

“तो? यह कोई बुरी बात है क्या ?” माला बोली ।

“बिल्कुल भी नहीं… बल्कि बहुत अच्छी बात है। श्यामजी कहते है कि जो आदमी अपने आसपास की चीजों के बारे में जानने और समझने की कोशिश करता है, सच्चे अर्थों में वही वैज्ञानिक है ।” हसन ने कहा ।

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“बात क्या है ?” सोना ने पूछा ।

“बड़ी मजेदार बात है।” हसन ने कहा, “बताओ, चन्दा को हम ‘मामा’ क्यों कहते हैं ? सबसे पहले भोलू बताएगा।”

अपना नाम सबसे पहले सुनते ही भोलू एकदम से सकपका गया-बोला, “मैं…मैं क्या बताऊं…सब कहते हैं तो मैं भी कहना सीख गया, और क्या ।”

“तुम बताओ ।” हसन ने सोना से पूछा ।

“हमारे यह धरती और चन्द्रमा दोनों सूर्य से ऊर्जा और प्रकाश पाते हैं । चन्द्रमा में तो जीवन है नहीं सिर्फ धरती पर जीवन है…।” कुछ देर सोचने के बाद सोना ने फिर बोलना शुरू किया, “हमारी पृथ्वी पर जीवन का स्त्रोत सूर्य से प्राप्त ऊर्जा है, इसलिए सूर्य, धरती और चन्द्रमा दोनों के लिए जीवन देने वाले पिता के समान है । इस तरह पृथ्वी और चन्द्रमा बहन-भाई हुए । अब पृथ्वी को हम चूंकि ‘माता’ कहते हैं इसलिए चन्द्रमा हमारा ‘मामा’ हुआ ।”

“बिल्कुल ठीक।” मोनू ने ताली बजाई।

“एक बात बताऊँ हसन भैया।” बीच में ही माला उत्साहपूर्वक बोली, “कल शाम जब आप अपने घर चले गए थे तब यही बात मेरे भी दिमाग में आई थी कि पृथ्वी और चन्द्रमा भाई-बहन हैं।”

“अरे, तुम तो हमारी सबसे बुद्धिमान गुड़िया हो ।” हसन ने उसकी पीठ थपथपाई।

“तब आप मुझ पर हँस क्यों रहे थे ?”

“खुशी के कारण । अपने बीच से कोई अगर बुद्धिमानी की बातें सोचता और पूछता है तो सच्चे दोस्त होने के नाते हमें खुशी होगी ही।”

उसकी इस बात पर माला शर्म से मुस्करा दी।

“अब तुम इस रिश्ते के बारे में एक कहानी सुनो।” हसन आगे बोला, “पुराने समय में देवताओं और राक्षसों ने मिलकर सागर का मंथन किया था।”

“मंथन क्या ?” भोलू ने पूछा।

“मंथन यानी मथना, बिलोना ।” हसन ने बताया, “जिस तरह हांडी में जमे दही में मथानी डालकर उसे बिलोते हैं और मक्खन निकालते हैं, उसी तरह इन दोनों ने अमृत पीने के लिए समुद्र को मंथा । जानते हो समुद्र को मथने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया और शेषनाग को रस्सी की तरह इस्तेमाल किया गया था । मथने पर समुद्र से चौदह रत्न निकले जिनमें कामधेनु और चन्द्रमा भी थे । इस तरह कामधेनु अर्थात् गऊमाता और चन्द्रमा एक ही पिता समुद्र से उत्पन्न होने के कारण भाई-बहन हुए । यही कारण है कि चन्द्रमा को भामा कहा जाने लगा ।”

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“यही सब तो शाम को मैंने भी बताया था।” माला रूठे हुए स्वर में बोली।

“हाँ, बताया था लेकिन अनुमान से ।” हसन बोला, “एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि बद्धिमान बही व्यक्ति होता है जो समस्याओं के समाधान अनुमान से नहीं प्रमाण से प्रस्तुत करता है।”

माला और अन्य सभी ने हसन की इस बात पर सहमतिपूर्वक अपनी-अपनी गरदन हिलाई।

“माला से हमें आसपास की चीजों के बारे में जानने की प्रेरणा मिलती है ।” मोनू बोला, “उसने स्कूल छोड़ दिया लेकिन पढ़ना नहीं छोड़ा और एक ये हमारे भोलू भाई हैं जिन्होंने पढ़ना और स्कूल जाना दोनों ही छोड़ दिए हैं । क्यों भोलू ?”

अपना नाम सुनकर भोलू एक बार फिर चौंक पड़ा।

“अरे भाई, स्कूल छोड़ देने का मतलब अक्ल का ताक पर रख देना नहीं होता ।” हसन ने कहा।

“नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है।” भोलू घबराए अन्दाज में बोला, “कल मैं आप लोगों से सवाल पूछंगा कि सब के सब चक्कर काटते रह जाओगे, हां।”

“अब रात हो आई है, घर चलते हैं ।” उसने कहा और उठ खड़ा हुआ।

“चलो ।” सब एक साथ बोले और वहां से उठकर अपने-अपने घरों को चल दिए ।

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