बहुत पहले की बात हैं। किसी नगर में एक सेठ रहता था। उसके पास खूब पैसा था, तथा कई हवेलियाँ और नौकर-चाकर थे। उसका जीवन बहुत ही आलीशान था, वह जो भी चाहता था पैसे के बल से वह उसे खरीद लेता था। लेकिन इतना सब होने के बाद भी उसे शांति नहीं , उसका मन बेचैन रहता था।
एक दिन सेठ के नौकर ने सेठ को एक महात्मा के बारे मे बताया, जो की उसी नगर मे ठहरे हुये थे। महात्मा बहुत ही सिद्ध एवं योगी पुरुष थे। नौकर ने सेठ को महात्मा की तारीफ करते हुये बताया की महात्मा जी सबकी मनोकामना पूरी करते हैं। कोई भी उनके दर से खाली हाथ वापस नहीं आया।
सेठ भी अगले दिन उस तपस्वी साधु के पास गया, साधू को प्रणाम कर के सेठ ने अपनी समस्या बताई, सेठ ने बोला- “महाराज मेरे पास बहुत संपत्ति हैं, दुनिया की ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसका मैं भोग न कर सकु। लेकिन मेरा मन बहुत अशांत रहता हैं, मन व्याकुल रहता हैं। मुझ पर कृपा करे और कोई मंत्र दे दीजिये जिससे मेरा व्याकुल मन शांत हो सके।”
सेठ ने सोचा कि अब साधु महाराज उसकी तकलीफ को दूर करने के लिए कोई मंत्र या ताबीज जरूर देंगे जिससे उसके अशांत मन को राहत मिलेगी लेकिन तपस्वी साधु ने सेठ को अपने प्रवास स्थल में 7 दिनों के लिए रुकने को कहा, सेठ सहमत हो गया
 
अगले दिन साधु बाबा ने सेठ को आंगन में बैठने के लिए कहा और खुद साधु महाराज आंगन के बगल में बने अपनी कुटिया के अंदर आकर छांव में बैठ गए सेठ पूरा दिन आंगन की धूप मैं बैठा रहा मन ही मन हुआ है बहुत ही गुस्से में था पर वह गुस्सा पीकर रह गया
दूसरे दिन साधु महाराज ने सेठ को आज्ञा दी आज तुम्हें अन्य का एक दाना नहीं मिलेगा और तुम्हें पूरा दिन व्रत रहना पड़ेगा, सेठ पूरे दिन बिना खाना के रह गया भूख से उसका बहुत बुरा हाल था उसने देखा साधु महाराज मजे से खाना खा रहे हैं, सेठ को भूख लगी थी इसलिए साधु महाराज को देखकर उसे बहुत गुस्सा भी आ रहा था.

सेठ को यूं ही जाते देख तपस्वी बाबा ने सेठ को टोका और पूछा की सेठ क्या हुआ बहुत जल्दी मन बना लिया यहां से जाने का, क्या अब तुम्हें शांति की तलाश नहीं है? तब सेठ ने कहा महाराज मैं बहुत ही आशा के साथ यहां आया था मुझे लगा आप मेरी समस्या का निराकरण करेंगे, परंतु मुझे अब एहसास होने लगा है कि आप मेरी कोई मदद नहीं कर रहे हैं बल्कि मुझे परेशान कर रहे हैं. मुझे लगने लगा है कि आप चाहते हैं कि मैं यहां से चला जाऊं और इसीलिए आप रोज मेरे लिए कोई ना कोई समस्या से भरा कार्य मुझे दे देते हैं.

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साधु महाराज सेठ की बात सुनकर हंस पड़े और बोले- सेठ मैंने तो तुम्हें बहुत कुछ दीया, पर तुमने ही कुछ नहीं लिया है. सेठ साधु की बात सुनकर आश्चर्य में रह गया और साधु की ओर देखकर बोला की महाराज मैं तो मुझे कुछ भी नहीं दिया है

साधु ने सेठ से कहा कि पहले दिन जब मैंने तुम्हें धूप में बैठाया और मैं स्वयं छांव में बैठ गया तो इसके जरिए मैंने तुम्हें समझाने की कोशिश कि मेरी छांव तुम्हारे काम नहीं आएगी, जब तुम मेरी बात को नहीं समझ पाए. तो मैंने दूसरा प्रयास किया. दूसरे दिन मैंने तुम्हें भूखा रखा और खुद खूब अच्छे-अच्छे पकवान खाएं, तो उस समय मैंने तुम्हें समझाने की कोशिश की मेरे खा लेने से तुम्हारा नहीं भरेगा.

सेठ मेरी एक बात हमेशा याद रखना की मेरी साधना से मिली सिद्धि से तुम्हें कोई सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती है. अध्यात्म और चिंतन एक ऐसा रास्ता है जहां मंजिल तक जाने के लिए यात्रा करनी पड़ती है. मैं बस भटके हुए लोगों को रास्ता बता सकता हूं, उनके रास्ते में आए हुए बाधा से कैसे मुक्ति पाएं उसका उपाय बता सकता हूं, लेकिन उस मंजिल तक तुम्हें स्वयं ही जाना होगा. अगर तुम्हें शांति पानी है तो तुम्हें अपनी व्यर्थ की और विलासिता पर नियंत्रण करना होगा तुम्हारा मन स्वयं ही शांति को प्राप्त कर लेगा.

सेठ को साधु महाराज की बात समझ में आ गई उसे अपनी मंजिल तक जाने का रास्ता मिल चुका था उसने साधु महाराज को फिर से प्रणाम किया और शांति प्राप्त करने की पथ पर वह निकल पड़ा

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