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1830 और 1848 की फ्रेंच क्रांति के कारण और परिणाम | 1830 france ki kranti kab hui

1830 france ki kranti kab hui : यूरोप के आधुनिक इतिहास में फ्रांस क्रांतियों में अग्रणी रहा है। 1789 ई. की क्रांति के बाद लुई 18वें और चार्ल्स दशम के शासन में ऐसी परिस्थितियाँ उत्‍पन्‍न हो गई जिनके फलस्‍वरूप फ्रांस 1830 ई. में पुन: क्रांति का विस्‍फोट हो गया। 1830 की क्रांति फ्रांस के इतिहास में बढ़ी महत्‍वपूर्ण मानी जाती है क्‍योंकि इस क्रांति के परिणामस्‍वरूप यूरोप के विभिन्‍न देशो में क्रांतियाँ हुई और फ्रांस मे लुई फिलिप का मध्‍यमवर्गीय शासन स्‍थापित हुआ।

Table of Contents

राज्‍य क्रांति के कारण

  1. वियेना कांग्रेस ने फ्रांस मे बेर्वो वंश की पुनर्स्‍थापना कर दी थी और लुई 18वें को फ्रांस की राजगद्दी पर आसीन किया गया था। लकिन फ्रांस की जनता बूर्वो शासकों के शासन से संतुष्‍ट नहीं थी। ऐसी स्थिति में क्रांति का होना आवश्‍यक हो गया था।
  2. लुई 18वें के शासनकाल में फ्रांस मे पाँच प्रमुख राजनीतिक दल थे जिनके दो गुट बने हुए थे। एक गुट कट्टर राजसत्‍तावादियों और वैध राजसत्‍तावादियों का था। दूसरे गुट में उदारवादी, गणतंत्रवादी और बोनापार्टस्‍ट शामिल थे। इन राजनीतिक दलों के मध्‍य संघर्ष जुलाई की क्रांति को लाने में बड़ा सहायक सिद्ध हुआ।
  3. चार्ल्‍स दशम एक प्रतिक्रियावादी शासक था। उसने फ्रांस में अपना निरंकुश शासन स्‍थापित करके क्रांति के समर्थकों का दमन करना प्रारम्‍भ कर दिया। उसकी दमनकारी नीति ने फ्रांस की जनता को अत्‍यधिक रूष्‍ट कर दिया और फलस्‍वरूप क्रांति का विस्‍फोट होना निश्चित हो गया।
  4. जुलाई 1830 में चार्ल्‍स दशम ने एक घोषणा करके अपनी मूर्खता का परिचय दिया और क्रांति को अनिवार्य बना दिया था। इस घोषणा के साथ ही 25 जुलाई 1830 को चार्ल्‍स दशम ने चार दमनकारी कानून पारित कर दिये। इन अध्‍यादेशों से फ्रांस की जनता अत्यधिक रूष्‍ट हो गई और वह अपने राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिये क्रांति करने को तत्‍पर हो गई। इस प्रकार फ्रांस में क्रांति का श्रीगणेश हो गया।

क्रांति की प्रमुख घटनाएँ

उर्पयुक्‍त कारणों के परिणामस्‍वरूप 27 जुलाई 1830 ई. को लफायेत के नेतृत्‍व में क्रांतिकारी ने पेरिस में विद्रोह कर दिया। चार्ल्‍स दशम की सेना विद्रोहियों को रोकने में असफल रही और क्रांतिकारियों ने 27 जुलाई को पेरिस पर अधिकार कर लिया। 27 से 29 जुलाई तक पेरिस की सड़कों पर राजा और जनता में खूनी संघर्ष चलता रहा। देश की अधिकांश जनता ने क्रांतिकारियों का साथ दिया और राजा की सेना की भीषण पराजय हुई। लफायेत की अध्‍यक्षता में होटल डी विले मे एक अस्‍थायी सरकार की स्‍थापना की गई। 7 अगस्‍त का चार्ल्‍स दशम गद्दी छोडकर इंग्‍लैण्‍ड भाग गया। थीयर्स के कहने पर क्रांतिकारियों ने बेर्वो वंश की दूसरी शाखा के राजकुमार ड्यूक ऑफ आर्लियन्‍स लुई फिलिप को फ्रांस का शासक स्‍वीकार कर लिया।

लुई फिलिप ने संविधान की शपथ लेकर घोषणा की वह देश में वैधानिक राजसत्‍ता की स्‍थापना करेगा। उसने फ्रांसीसियों को राजा की उपाधि ग्रहण की और देश में उदारवादी संविधान लागू किया। इस प्रकार फ्रांस की 1830 ई. की क्रांति सफल हुई और फ्रांस में चार्ल्स दशम कें निरंकुश और स्‍वच्‍छाचारी शासन का अन्‍त हो गया।

क्रांति के परिणाम

फ्रांस के संदर्भ में जुलाई राज्‍यक्रांति के परिणाम ये थे-

  1. इस क्रांति के परिणामस्‍वरूप स्‍पेन, पुर्तगाल, पोलैण्‍ड, बेल्जियम, स्विटजरलैण्‍ड, जर्मनी तथा इटली के राज्‍यों में क्रांतियों का सूत्रपात हुआ।
  2. इस क्रांति ने उदादवाद और राष्‍ट्रीयता के सिद्धान्‍त पर विशेष बल दिया।
  3. इस क्रांति ने फ्रांस में बूर्वो वंश की राजसत्‍ता हमेशा के लिये समाप्‍त कर दी।
  4. लुई फिलिप फ्रांस का राजा बना और उसने फ्रांस में उदारवादी संविधान तथा लोकप्रिय शासन की स्‍थापना की।
  5. फ्रांस की जनता को स्‍वतंत्रता तथा समानता के अधिकार पुन: प्राप्‍त हो गए।
  6. लुई फिलिप ने जनता के अधिकारों की रक्षा करने की शपथ ग्रहण की।
  7. फ्रांस में निरंकुश तथा स्‍वेच्‍छाचारी शासन का अन्‍त हो गया।
  8. इस क्रांति ने कट्टर राजसत्‍तावादियों के प्रभुत्‍व एवं आतंकवादी कार्यक्रमों का भी अन्‍त कर दिया। लिपसन के अनुसार ‘सन्‍ 1830 ई. की क्रांति ने 1789 ई. की राज्‍य क्रांति के अधूरे कार्य को पूरा कर दिया। अब भविष्‍य के लिये क्रांतिकारी भावना के मूल तत्‍वों अथवा समानता, धर्म निरपेक्षता तथा वैधानिक स्‍वतंत्रता की नींव सुदृढ़ हो गयी’।

1830 की क्रांति का देशों पर प्रभाव | 1830 france ki kranti kab hui

फ्रांस की 1830 की क्रांति बड़ी महत्‍वपूर्ण थी। इसका न केवल फ्रांस के इतिहास में वरन्‍ यूरोप के इतिहास में भी भारी महत्‍व है। इस क्रांति का सम्‍पूर्ण यूरोप पर व्‍यापक प्रभाव पड़ा। संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका तथा इंग्‍लैण्‍ड भी इस क्रांति से अछूते न रह सके। इस क्रांति ने वियेना कांग्रेस के निर्णयों की जड़े हिला दी और यूरोपीय जनता को स्‍वतंत्रता, समानता और राष्‍ट्रीयता की भावनाओं से परिपूर्ण कर दिया। इस क्रांति का यूरोप के विभिन्‍न देशों पर निम्‍नलिखित प्रभाव पड़ा।

स्‍पेन मे क्या प्रभाव पड़ा?

नेपोलियन बोलापार्ट के पतन के बाद वियेना कांग्रेस ने स्‍पेन में बोनापार्ट वंश की सत्‍ता का अन्‍त करके वहाँ पर पुन: फर्डिनेन्‍ड सप्‍तम की निरंकुश सत्‍ता स्थापित कर दी थी। फर्डिनेन्‍ड ने प्रतिक्रियावादी नीति अपनाकर स्‍पेन के उदारवादी संविधान को भंग कर दिया और जनता के समस्‍त अधिकारों का अपहरण कर लिया। उसने देश में भाषण लेखन तथा प्रेस की स्‍वतंत्रता पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया। देश के क्रांतिकारियों तथा राष्‍ट्रवादियों को निष्‍कासित कर दिया और उन पर नाना प्रकार के भीषण अत्‍याचार करवाये। फर्डिनेन्‍ड ने अपने राज्‍य मे पुन: कुलीनों तथा उच्‍च पादरियों को विशेष सुविधाएँ प्रदान कर दी। उसकी इस नीति से स्‍पेन की जनता ने असन्‍तुष्‍ट होकर 1830 मे उसके शासन के विरूद्ध एक भंयकर विद्रोह कर दिया। फर्डीनेन्‍ड अपनी जान बचाकर स्‍पेन से भाग गया परन्‍त्‍ुा चतुर्मुखी मित्रमण्‍डल ने फ्रांस को स्‍पेन के विद्रोह का दमन करने का अधिकार प्रदान कर दिया। लुई 18वें ने 95 हजार सैनिकों की एक विशाल सेना भेजकर स्‍पेन के विद्रोह का कठोरता पूर्वक दमन कर दिया और फर्डिनेन्‍ड कोपुन: स्‍पेन का राजा बना दिया।

1830 की क्रांति की सफलता और चार्ल्‍स दशम का पतन की सूचना ने स्‍पेन के राष्‍ट्रवादियों में एक नवीन उत्‍साह का संचार कर दिया और उन्‍होनें स्‍थान-स्‍थान पर विद्रोह खड़े कर दिये। किन्‍तु उन्‍हें अपने प्रयासों में सफलता न मिल सकी, क्‍योंकि मेटरनिख के भय और फर्डिनेन्‍ड की दमनकारी नीति ने विद्रोहियों का क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया। हजारों देशभक्‍त मौत के घाट उतार दिये गये। और हजारों को जेल में डालकर उन पर भीषण अत्‍याचार किये गये। स्‍पेन की जनता इन भीषण अत्‍याचारों से भयभीत होकर चुप बैठ गयी।

इतना होने पर भी स्‍पेन में विद्रोह की आग धीरे-धीरे सुलगती रही और गुप्‍त समितियों के माध्‍यम से स्‍पेन के देशभक्तों ने देश में राष्‍ट्रीय भावनाओं का प्रचार करना जारी रखा। इस प्रकार स्‍पेन मे 1830 की क्रांति असफल रही।

पुर्तगाल पर क्या प्रभाव पड़ा?

1812 में ब्रिटिश सेनापति ड्यूक ऑफ बेलिंगटन ने पुर्तगाल मे फ्रांसीसी सेनाओं को भगाकर उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। 1820 तक पुर्तगाल में सैनिक शासन स्‍थापित रहा। अत: इन आठ वर्षो में ब्रिटिश शासन से परेशान होकर पुर्तगालियों ने विद्रोह कर दिया। विवश होकर अंग्रेजों को पुर्तगाल खाली करना पड़ा। और पुर्तगाल के देशभक्तों ने वहाँ पर एक उदारवादी संविधान लागू कर दिया। इस संविधान के अनुसार पुर्तगाल में कुलीनों तथा सामन्‍तों के विशेषाधिकार समाप्‍त कर दिये गये और जनता को स्‍वतंत्रता तथा समानता प्रदान की गई। लेकिन इस समय यूरोप में मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी नीति का बोलबाला था और वह यूरोप की संयुक्‍त व्‍यवस्‍था का सर्वेसर्वा बना हुआ था। वह पुर्तगाल के वैधानिक शासन को सहन न कर सका। उसने पुर्तगाल के भूतपूर्व शासक जॉन षष्‍टम को ब्राजील से वापिस बुला लिया जॉन ने 1821 मे पुर्तगाल में नवीन शासन विधान को मान्‍यता देने की घोषणा की और जनता ने उसकी घोषणा में विश्‍वास कर उसे पुर्तगाल का राजा स्‍वीकार कर लिया। लेकिन राजा बनते ही जॉन ने उदानवादी संविधान के विरूद्ध कार्य करना आरम्‍भ कर दिया जिसके फलस्‍वरूप पुर्तगाल में पुन: विद्रोह की आग भड़कने लगी, जिससे भयभीत होकर जॉन पुन: पुर्तगाल छोड़कर भाग गया परन्‍तु मित्र-राष्‍ट्रों की सहायता से शीघ्र ही उसने पुर्तगाल में पुन: आकर अपना निरंकुश शासन स्‍थापित कर लिया। 1826 ई. में जॉन की मृत्‍यु के बाद पुर्तगाल की गद्दी के लिये देश में गृह-युद्ध छिड़ गया। पुर्तगाल के देशभक्‍तों ने 1830 ई. की क्रांति से प्रभावित होकर इंग्‍लैण्‍ड फ्रांस तथा स्‍पेन के उदारवादियों से सहायता प्राप्‍त की और उन्‍होंनें डोना मेरिया को पुर्तगाल की शासिका बना दिया। जिसने जनता को एक उदारवादी संविधान प्रदान किया।

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बेल्जियम पर प्रभाव

सन 1815 ई. में वियेना कांग्रेस ने बेल्जियम हॉलैण्‍ड के राजा को दे दिया था। इससे बेल्जियम की जनता बहुत असन्‍तुष्‍ट थी क्‍योंकि उनकी भाषा, धर्म तथा संस्‍कृति आदि हॉलैण्‍डवासियों से पूर्णतया: भिन्‍न थी। फ्रांस की 1830 ई. की क्रांति ने बेल्जियम की जनता में एक नवीन साहस एवं चेतना का संचार कर दिया और वह ‘करो या मरो’ की भावना से परिपूर्ण हो गयी। बेल्जियम की राजधानी ब्रूजेल्‍स में जनता ने सशस्‍त्र विद्रोह कर दिया, जिससे वहाँ पर स्थित पोलैण्‍ड की सेना भयभीत होकर भाग गयी। हॉलैण्‍ड ने विद्रोहियों का दमन करने के लिये एक सेना भेजी परन्‍त्‍ुा इस सेना को भी विद्रोहियों ने बुरी तरह पराजित करके देश से निकाल दिया। विद्रोहियों ने 1830 ई. में बेल्जियम में एक उदार संविधान बनाकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। बेल्जियम की स्‍वतंत्रता को देखकर सभी यूरोपीय राज्‍य आश्‍चर्यचकित हो गये।

पोलैण्‍ड पर प्रभाव

वियेना के निर्णयों के अनुसार रूस ने पोलैण्‍ड पर अपना प्रभुत्‍व स्‍थापित करके वहाँ पर एक उदारवादी संविधान लागू कर दिया था। फिर भी पोलैण्‍ड की जनता जार के शासन से सन्‍तुष्‍ट ने भी क्‍योंकि वह अपनी सभ्‍यता एवं संस्‍कृति के प्राचीन गौरव को भूल न सकी। वह रूस के संविधान को घृणा की दृष्टि से देखती थी और रूसियों से स्‍वयं को श्रेष्‍ठ समझती थी। अत: वह अपनी स्‍वतंत्रता के लिये प्रयत्‍नशील हो गयी। 1825 ई. में जार सिकन्‍दर प्रथम की मृत्‍यु के बाद नये जार निकोलस द्वितीय पोलैण्‍ड की जनता के प्रति बड़ी कठोर नीति अपनाई। इसी समय 1830 ई. की क्रांति सेप्रभावित होकर पोलैण्‍ड की जनता ने 12 नवम्‍बर 1830 ई. को वारसा में विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह से भयभीत होकर रूसी प्रतिनिधि कान्‍सेण्‍टाइन वारसा छोड़कर भाग गया। पोलैण्‍ड के देशभक्‍तों ने रूसी सेना को वारसा खाली करने के लिये विवश कर दिया और अनेक रूसी अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। पोलैण्‍ड के देशभक्‍तों ने एक अस्‍थायी सरकार की स्‍थापना करके 50 हजार सैनिकों की एक शक्तिशाली सेना का भी संगठन कर लिया। लगभग एक वर्ष तक पोलेण्‍डवासी रूसी सेनाओं से टक्‍कर लेते रहे किन्‍त्‍ुा अन्‍त में उन्‍हें पराजित होना पड़ा और रूस का पोलैण्‍ड पर पुन: प्रभुत्‍व स्‍थ‍ापित हो गया।

जर्मनी पर प्रभाव

सन 1830 ई. की फ्रांसीसी क्रांति ने जर्मनी के छोटे-छोटे राज्‍यों को भी प्रभावित किया। इस क्रांति की सफलता का समाचार पाकर सैक्‍सनी हैनोवर हेस ब्रान्जिवक आदि जर्मनी राज्‍यों के देशभक्तों ने विद्रोह कर दिया। क्रांतिकारियों के आतंकवादी कार्यो से भयभीत होकर इन राज्यों के शासकों ने अपने यहाँ उदारवादी संविधान लागू कर दिया। दक्षिणी जर्मनी में बवेरिया तथा बरटमबर्ग नामक राज्‍यों में भी उदारवादी संविधान की स्‍थापना हो गयी। लेकिन आस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने प्रशा से मिलकर जर्मनी राज्‍यों के विद्रोह को कठोरता पूर्वक दबा दिया।

इटली पर प्रभाव

वियेना कांग्रेस ने नेपोलियन प्रथम के इटली संघ को भंग करके उसे पुन: छोटे-छोटे स्‍वतंत्र और निरंकुश राज्‍यों मे विभक्‍त कर दिया था किन्‍तु इटली की जनता राष्‍ट्रीय भावनाओं से परिपूर्ण हो चुकी थी और अपनी स्‍वाधीनता को प्राप्‍त करने के लिये तत्‍पर थी। 1830 ई. की क्रांति से उत्‍साहित होकर इटली के पारमा और मोडेना राज्‍यों के देशभक्तों ने अपने राजाओं के निरंकुश शासन के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। मोडेना का ड्यूक और पारमा की रानो शेरी लुईजे क्रांतिकारियों से भयभीत होकर आस्ट्रिया भाग गई। पोप राज्‍यों में भी भंयकर विद्रोह हो गया। सम्‍पूर्ण इटली में क्रांति की आग भडक उठी, परन्‍तु मेटरनिख ने क्रांतिकारियों का दमन करने के लिये एक विशाल सेना भेज दी। एकता और संगठन के अभाव से इटली के क्रांतिकारी आस्ट्रियन सेना का सामना करने में असफल रहे और मेटरनिख ने उनका कठोरता पूर्वक दमन कर दिया। इटली के राज्‍यों में पुन: निरंकुश शासन स्‍थापित हो गया।

स्विट्जरलैण्‍ड पर प्रभाव

1830 में फ्रांसीसी क्रांति से स्विट्जरलैण्‍ड भी अंछूता न रह सका। इस क्रांति से प्रेरित होकर स्विस देशभक्तों ने अपने यहाँ शासन सम्‍बंधी अनेक सुधार करके उदारवादी शासन की स्‍थापना की। फिर भी स्विस देशभक्‍त वहाँ पर पूर्ण गणतंत्र की स्‍थापना करने में सफल न हो सके।

इंग्‍लैण्‍ड पर प्रभाव

फ्रांस की 1830 की क्रांति के समय इंग्‍लैण्‍ड में कट्टर टोरयों का मंत्रिमण्‍डल कार्य कर रहा था। ड्यूक ऑफ वेलिंगटन इंग्‍लैण्‍ड का प्रधानमंत्री था जो कि मेटरनिख का घनिष्‍ठ मित्र और उसी के समान प्रतिक्रियावादी था। उस समय इंग्‍लैण्‍ड में बडी दोषपूर्ण मताधिकार प्रणाली प्रचलित थी। अत: इस क्रांति की सूचना पाकर इंग्‍लैण्‍ड के उदारवादियों ने मताधिकार में विस्‍तार तथा सुधार करने के लिये आन्‍दोलन प्रारम्‍भ कर दिया। जॉन रसल ने कामन्‍स सभा से प्रथम सुधार बिल रखा किन्‍त्‍ुा लार्ड सभा ने उसे अस्‍वीकृत कर दिया। इस पर सम्राट के संसद भंग कर दी। नये चुनावों में ह्गि दल को बहुमत प्राप्‍त हो गया। रसल ने पुन: सुधार बिल संसद में रखा किन्‍त्‍ुा इस बार भी लार्ड सभा ने उसे अस्‍वीकार कर दिया। इससे ब्रिटिश जनता में क्षोभ उत्‍पन्‍न हो गया और इंग्‍लैण्‍ड में स्‍थान-स्‍थान पर विद्रोह तथा दंगे-फसाद होने लगे। अन्‍त में 1832 ई. में लार्ड सभा को सुधार बिल पारित करने के लिये विवश होना पड़ा।

अमेरिका पर प्रभाव

1830 की क्रांति से उत्‍साहित होकर अमेरिका के सुधारवादियों ने शासन में सुधार करने और देश में दास प्रथा का उन्‍मूलन करने के लिये आन्‍दोलन करना प्रारम्‍भ कर दिया। उन्‍होनें देश के विभिन्‍न स्‍थानों पर सभाएँ करके निर्धनों मजदूरों श्रमिकों तथा दासों की दशा सुधार करने के लिये सरकार पर दबाव डाला। अन्‍त मे सरकार को विवश होकर सुधारवादियों की माँगे स्‍वीकार करनी पड़ी। सरकार ने कारखानों में काम करने वाले मजदूरों व श्रमिकों को अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्रदान कर दी ऋण चुकाने की कठोर प्रथा का अन्‍त कर दिया और दास प्रथा अवैधानिक घोषित कर दी।

1830 की क्रांति का महत्‍व

 1830 की क्रांति यूरोप के इतिहास की एक महत्‍वपूर्ण घटना थी। इस क्रांति का महत्‍व इस प्रकार रहा-

  1. इस क्रांति ने सम्‍पूर्ण विश्‍व में राष्‍ट्रीयता एवं उदारवाद की भावनाओं को प्रसारित कर दिया और फ्रांस तथा बेल्जियम पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा।
  2. इंग्‍लैण्‍ड तथा फ्रांस यूरोप के प्रमुख उदारवादी राष्‍ट्र माने जाने लगे।
  3. इस क्रांति ने यूरोप की संयुक्‍त व्‍यवस्‍था की प्रतिक्रियावादी नीति को असफल कर दिया और मेटरनिख की योजनाएँ पतन की ओर बढ़ने लगी।
  4. यद्यपि इटली, जर्मनी और पोलैण्‍ड में क्रांति सफल न हो सकी फिर भी यह निश्चित हो गया कि अधिक समय तक निरंकुशता का युग चल न सकेगा और उदारवादी शासन की स्‍थापना होकर रहेगी।
  5. बेल्जियम की स्‍वतंत्रता ने वियेना कांग्रेस के निर्णयों को रद्द कर दिया।
  6. इस क्रांति ने यूरोप की जनता को निरंकुशता एवं स्‍वेच्‍छाचारिता के विरूद्ध संगठित होने की प्रेरणा प्रदान की।
  7. इस क्रांति ने 1789 ई. की क्रांति के अधूरे कार्य को पूरा कर दिया।
  8. यह क्रांति 1848 ई. की क्रांति को लाने में सहायक सिद्ध हुई।

1848 की क्रांति के कारण

1848 की क्रांति ने यूरोप के इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात किया और यूरोप में प्रतिक्रियावादी युग का अन्‍त कर दिया। इस क्रांति के प्रमुख कारण निम्‍नलिखित थे-

राजनीतिक दलों में संगठन का अभाव

फ्रांस में विभिन्‍न राजनीतिक दल थे जिनमें एकता का पूर्ण अभाव था। इन विभिन्‍न राजनीतिक दलों की पारस्‍परिक स्वार्थप्रियता एवं मतभेदों के कारण लुई फिलिप सभी दलों को संतुष्‍ट करने में असफल रहा। इतना ही नहीं उसकी हत्‍या के लिये अनेक षड्यंत्र रचे गये। इस स्थिति में फ्रांस की क्रांति का वातावरण तैयार होना एक स्‍वाभाविक बात थी।

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मध्‍यम वर्ग का प्रभाव

1830 की क्रांति के उपरान्‍त फ्रांस के बडे-बडे उद्योगपति पूँजीपति, डॅाक्‍टर, वकील आदि ही प्रतिनिधि सभा के सदस्‍य बन गये। इन लोगों ने केवल अपने हितों को ध्‍यान में रखकर देश मे सुधार पारित किए और जनसाधारण के हितों की ओर कोई ध्‍यान नहीं दिया। लुई फिलिप को भी इस दल का समर्थन करना पड़ा। क्‍योंकि संसद मे इन्‍ही लोगों का बहुमत था। ऐसी स्थिति में जनसाधारण मध्‍यमवर्गीय सरकार से सन्‍तुष्‍ट होकर क्रांति की योजना बनाने लगा। अत: मध्‍यम वर्ग का व्‍यापक प्रभाव 1848 की क्रांति का एक उत्‍तरदायी कारण बन गया।

समाजवाद का उदय और प्रसार

1848 की क्रांति का मुख्‍य कारण यूरोप मे समाजवाद का उदय और प्रसार था। औद्योगिक क्रांति ने यूरोप में मशीनी युग का श्रीगणेश कर दिया था। फ्रांस में भी उद्योगों का मशीनीकरण हो गया था और नगरों की संख्‍या निरन्‍तर बढने लगी थी। पूँजीपतियों के शोषण से फ्रांस मे मजदूरों की दशा बडी शोचनीय हो गई थी। और देश मे भुखमरी, बेरोजगारी और बेकारी का बोलबाला हो गया। जनसाधारण की दयनीय दशा को सुधारने के लिये समाजवादी नेताओं जैसे- लुई ब्‍लाँ और लामार्टिन ने सरकार के  समक्ष अनेक माँगे रखी और देश में समाजवादी सिद्धान्‍तो का प्रचार करना आरम्‍भ कर दिया।

समाजवादी नेताओं के भाषणों तथा लेखों से प्रभावित होकर फ्रांस की जनता सरकार की कटु आलोचना करने लगी। और उसे लुई फिलिप के शासन के दोषों का पूर्ण ज्ञान हो गया। इस प्रकार समाजवादी सिद्धान्‍तों से प्रभावित होकर फ्रांस की जनता ने देश के पूँजीपतियों के साथ संघर्ष करना आरम्‍भ कर दिया। इस संघर्ष में लुई फिलिप ने पूँजीपतियों का पक्ष लिया जिससे श्रमिक वर्ग उससे बहुत असन्‍तुष्‍ट हो गया और वह मताधिकार को विस्‍तृत करने की माँग करने लगा। अन्‍त में श्रमिकों के असंतोष ने ही फ्रांस में क्रांति का विस्‍फोट कर दिय।

लुई फिलिप क दुर्बल और असफल नीति

फ्रांस की 1848 ई. की क्रांति का सबसे महत्‍वपूर्ण कारण लुई फिलिप की दुर्बल और असफल नी‍ति थी। 1830 ई. की क्रांति के बाद फ्रांस को एक योग्‍य तथा प्रतिभाशाली शासक की आवश्‍यकता थी जो अपने कुशल नेतृत्‍व से देश के विभिन्‍न राजनीतिक दलों को संतुष्‍ट करके शांति एवं सुव्‍यवस्‍था की स्‍थापना कर देता परन्‍तु लुई फिलिप एक साधारण प्रतिभा का व्‍यक्ति था। उसमें दूरदर्शिता और योग्यता का अभाव था। उसकी गृह और वैदेशिक नीति पूर्णतया: विफल रही। उसने सुनहरी मध्‍यम नीति अपनाकर फ्रांस की अधिकांश जनता को अपना विरोधी बना लिया। उसकी दुर्बल विदेश नीति के कारण फ्रांस के राष्‍ट्रीय सम्‍मान और वैदेशिक गौरव को गहरा आघात पहुँचा। वह बेल्जियम तथा पूर्वी समस्‍या के मामले में इंग्‍लैण्‍ड के विदेशमंत्री पामर्स्‍टन के विरूद्ध कोई कार्यवाही न कर सका। उसने मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी नीति का समर्थन कर इटली, पोलैण्‍ड तथा स्विट्जरलैण्‍ड के क्रांतिकारियों को कोई सहायता न दी, जिससे फ्रांस के क्रांतिकारी उसके प्रबल विरोधी बन गए।

लुई फिलिप ने जो सुधार किये भी उससे केवल मध्‍यम वर्ग को ही लाभ पहुँचा। जनसाधारण वर्ग उसके सुधारों से कोई लाभ न उठा सका। इन सब बातों के कारण ही लुई फिलिप का पतन होना अनिवार्य हो गया। और उसका पतन लाने में 1848 क्रांति ही सहायता सिद्ध हुई।

1848 के क्रांति की घटनाएँ

लुई फिलिप की दुर्बल नीति के कारण फ्रांस की जनता का असंतोष और विरोध निरन्‍तर बढता ही गया। अन्‍त में प्रधानमंत्री गुइजों की प्रतिक्रियावादी और दमनकारी नीति से क्षुब्‍ध होकर 13 फरवरी 1848 ई. को पेरिस की एक सशस्‍त्र भीड़ ने उसके निवास स्‍थान को घेर लिया। उसकी रक्षा के लिये लुई फिलिप के ओदश पर सेना ने उग्र भीड़ पर गोली चला दी, जिससे कुछ व्‍यक्ति मर गए। उग्र भीड़ ने शहीदों के शवों के साथ पेरिस में विशाल जुलूस निकाला और लुई फिलिप के राजमहल को घेर कर यह नारा लगाना शुरू कर दिया कि ‘लुई फिलिप चार्ल्‍स दशम् के समान हमारा कत्‍ल करता है। अत: उसे भी चार्ल्‍स दशम् का अनुकरण कर दिया जाए’।

इस विषम परिस्थिति मे लुई फिलिप अपने पोते के पक्ष में फ्रांस की राजगद्दी छोड़कर 24 फरवरी 1848 ई. को गुप्‍त रूप से इंग्‍लैण्‍ड भाग गया। गणतंत्रवादियों ने फ्रांस मे राजतंत्र का अन्‍त कर द्वितीय गणतंत्र की स्‍थापना की।

1848 के क्रांति का प्रभाव

सन 1848 की क्रांति फ्रांस के इतिहास की एक महत्‍वपूर्ण घटना थी। इसके निम्‍नलिखित प्रभाव हुए-

  1. इस क्रांति ने फ्रांस मे राजतंत्र का अन्‍त कर दिया।
  2. फ्रांस में द्वितीय गणतंत्र की स्‍थापना हुई और नेपोलियन बोनापार्ट का भतीजा लुई नेपोलियन फ्रांस का राष्‍ट्रपति बना।
  3. इस क्रांति के फलस्‍वरूप फ्रांस मे समाजवाद का प्रसार होने लगा।
  4. इस क्रांति ने सम्‍पूर्ण यूरोप को प्रभावित किया और इसके परिणामस्‍वरूप ही आस्ट्रिया, हंगरी, इटली, जर्मनी तथा प्रशा में क्रांतियों का विस्‍फोट हुआ।

इस क्रांति के महत्‍व को स्‍पष्‍ट करते हुए लिपसन ने लिखा है, ‘1848 ई. की क्रांति ने राजनीतिक लोकतंत्र के इतिहास में एक नये युग का निर्माण किया क्‍योंकि मतदान के अधिकार को विस्‍तृत बना देने के कारण शक्ति मध्‍यम वर्ग के हाथ से निकलकर सम्‍पूर्ण समाज के हाथ में पहुँच गई।

1848 के यूरोप के देशो मे क्रांति

1848 की फ्रांसीसी राज्‍य क्रांति ने सम्‍पूर्ण यूरोप को प्रभावित किया और इसके परिणामस्‍वरूप यूरोप के विभिन्‍न देशों में क्रांतियाँ हुई। इन क्रांतियों का संक्षिप्‍त विवरण इस प्रकार है-

आस्ट्रिया में क्रांति

1848 की फ्रांसीसी क्रांति की सफलता का समाचार पाकर आस्ट्रिया ने देशभक्‍तों ने 13 मार्च 1848 को वियेना में एक जुलूस निकाला। इस जुलूस ने मेटरनिख के राजमहल को घेर लिया और मेटरनिख मुर्दाबाद, मेटरनिख का नाश हो आदि नारे लगाने शुरू कर दिये। क्रांतिकारियों के उग्र रूप को देखकर मेटरनिख भयभीत हो गया और गुप्‍त रूप से वियेना से भाग गया। मेटरनिख के पलायन के उपरान्‍त क्रांतिकारियों ने बडे उत्‍साह के साथ अपनी विजय का उत्‍सव मनाया। आस्ट्रिया कासम्राट फ्रांसिस द्वितीय जनता के उल्‍लास को देखकर भयभीत हो गया और उसने क्रांतिकारियों की सभी माँगों को स्‍वीकार लिया। उसने कुलीनों तथा सामन्‍तों के विशेषाधिकारों का अन्‍त कर दिया। और जनता को कुछ अधिकार देने की घोषणा कर दी, परन्‍तु आस्ट्रिया के देशभक्‍त राष्‍ट्रीय भावनाओं से परिपूर्ण हो चुके थे और उनका उत्‍साह भी चरम सीमा पर पहुँच चुका था। वे तो आस्ट्रिया से सम्राट को पद्च्‍युत करके गणतंत्र की स्‍थापना करना चाहते थे। अत: उन्होनें सम्राट के सभी सुधारों की अस्‍वीकार कर दिया। फलत: सम्राट भी भयभीत होकर वियेना छोड़कर भाग गया। अब क्रांतिकारियों का शासन सत्‍ता पर अधिकार स्‍थापित हो गया। उन्‍होनें राष्‍ट्रीय महासभा का अधिवेशन बुलाने का निश्‍चय किया। 22 जुलाई 1848 को राष्‍ट्रीय महासभा का अधिवेशन हुआ, जिसमें हंगरी को छोड़कर सभी राज्‍यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस अधि‍वेशन में आस्ट्रिया में गणतंत्र की स्‍थापना का प्रस्‍ताव रखा गया, परन्‍तु वैध राजसत्‍ता‍वादियों के विरोध के कारण यह प्रस्‍ताव पारित न हो सका। इस स्थिति में राष्‍ट्रीय महासभा ने फ्रांसिस को वैधानिक शासन की स्‍थापना करने के लिये आवंत्रित किया अगस्‍त 1848 ई. मे सम्राट ने वापिस आकर शासन सत्‍ता अपने हाथ में ले ली। इसी बीच सम्राट की सेना ने क्रांतिकारियों का कठोरतापूर्वक दमन कर दिया और 31 अक्‍टूबर 1848 ई. आस्ट्रिया में पुन: निरंकुश राजसत्ता स्‍थ‍ापित हो गई।

बोहेमिया की क्रांति

बो‍हेमिया का राज्‍य आस्ट्रियन साम्राज्‍य का ही एक अंग था। 1848 को क्रांति की लहर ने बोहेमिया की चेक जनता को भी उत्‍साहित कर दिया। 15 मार्च 1848 को बोहेमिया केचेक देश भक्‍तों ने एक सभा की और अपनी माँगे आस्ट्रिया के समक्ष रखी। सम्राट तो पहले से ही क्रांतिकारियों से आतंकित था। अत: उसने थोडे बहुत टाल-मटोल के बाद उनकी माँगों को स्‍वीकार कर लिया परन्‍तु बोहेमिया की जर्मन जनता ने चेकों की माँगों का विरोध किया क्‍योंकि जर्मनों को यह भय था कि चेक लोग शासन पर अधिकार पाकर उन पर अत्‍याचार करेगें। क्रांतिकारियों के इस मतभेद का लाभ उठाकर आस्ट्रियन सेनाओं ने बलपूर्वक क्रांति का दमन कर दिया।

हंगरी मे क्रांति

हंगरी की कौसुथ तथा डीक ने 1848 की क्रांति से प्रेरित होकर आस्ट्रियन शासन के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। हंगरी की जनता गणतंत्र की स्‍थापना करना चाहती थी। आस्ट्रिया के सम्राट ने हवा के रूख को देखकर हंगरी के लिये उदारवादी संविधान स्‍वीकार कर लिया। लेकिन कुछ समय के पश्‍चात आस्ट्रिया की सरकार ने रूस की संयुक्‍त सहायता से हंगरी पर आक्रमण कर दिया। हंगरी के देशभक्‍त आस्ट्रिया और रूस की संयुक्‍त सेनाओ का सामना करने में असफल रहे। आस्ट्रिया ने हंगरी के देशभक्‍तों को निर्दयतापूर्वक देश से निष्‍कासित कर दिया और वहाँ पर पुन: अपनी निरंकुश राजसत्‍ता स्‍थापित कर दी।

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इटली मे क्रांति

इटली की जनता एक लम्‍बें समय से अपनी स्‍वतंत्रता के लिये प्रयत्‍नशील थी। इटली का महान्‍ देशभक्‍त मैजनी अपने देशवासियों को एकता के सूत्र में संगठित करने मे संलग्‍न था। 1848 की क्रांति की सफलता और मेटरनिख के पतन के समाचार ने सम्‍पूर्ण इटली में हलचल उत्‍पन्‍न कर दी। इटली के देशभक्‍तों मे एक नवीन स्‍फूर्ति और उत्‍साह का संचार हो गया। लम्‍बार्डी, सार्डीनिया, नेपिल्‍स आदि इटली के राज्‍यों के क्रांतियाँ हुई लेकिन जनता के अभाव में आस्ट्रिया इटली के राज्‍यों की क्रांतियों का दमन करके पुन: अपनी निरंकुश सत्‍ता स्‍थापित करने में सफल हो गया।

जर्मनी की क्रांति

जर्मनी में भी 1848 की क्रांति के परिणामस्‍वरूप क्रांति की आग भड़क उठी। सैक्‍सनी, बवेरिया तथा हैनोवर व प्रशा को छोड़कर अन्‍य जर्मन राज्‍यों मे क्रांतिकारियों को सफलता प्राप्‍त हो गयी और वहाँ के शासकों ने जनता की माँगों की स्‍वीकार कर लिया।

1848 की क्रांति के परिणाम

इस क्रांति के निम्‍नलिखित परिणाम हुए-

  1. 1848 की क्रांति केवल प्रशा, सार्डीनिया और पीडमाण्‍ड में ही सफल हो सकी। अन्‍य प्रदेशों में यह क्रांति असफल रही।
  2. इटली, बोहेमिया, आस्ट्रिया, हंगरी तथा अन्‍य राज्‍यों मे प्रतिक्रियावादी शक्तियों को सफलता मिली और उदारवादियों को असफलता का मुँह देखना पड़ा।
  3. आस्ट्रिया के प्रतिक्रियावादी चांसलर मेटरनिख का पूर्ण पतन हो गया।
  4. इस क्रांति ने यूरोप में प्रतिक्रियावादी की जड़े हिला दी और सम्‍पूर्ण यूरोप को उदारवादी भावना से परिपूर्ण कर दिया।
  5. यह क्रांति जर्मनी और इटली के राष्‍ट्रीय एकीकरण को लाने में सहायक सिद्ध हुई।

1848 आश्‍चर्यजनक घटनाओं का वर्ष

1848 में यूरोप में अनेक ऐसी आश्‍चर्यजनक घटनाएँ घटीं जिनके कारण इस वर्ष को यूरोप के इतिहास में आश्‍चर्यजनक घटनाओं का वर्ष कहा जाता है। इन घटनाओं का सक्षिप्‍त विवरण इस प्रकार है-

  1. लुई फिलिप के शासन का एक ही दिन (24 फरवरी 1848) मे अन्‍त हो जाना और उसका इंग्‍लैण्‍ड पलायन करना एक आश्‍चर्यजनक घटना थी।
  2. फ्रांस के प्रधानमंत्री गुइजों के विरोधी द्वारा तैयार मताधिकार विस्‍तृत करने के लिये प्रीतिभोजों का आयोजन करना यूरोप के इतिहास की एक विस्‍मयकारी घटना थी और राजनीतिक अधिकार प्राप्‍त करने का यह अनोखा तरीका था।
  3. लामार्टिन द्वारा 24 फरवरी 1848 ई. के दिन होटल डी वेले में फ्रांस में द्वितीय गणतंत्र की स्‍थापना की घोषणा करना भी एक आश्‍चर्यजनक घटना थी।
  4. फ्रैंकफर्ट की राष्‍ट्रीय महासभा द्वारा दिये हुए संयुक्‍त जर्मनी के राजमुकुट को प्रशा के राजा फ्रैंड्रिक विलियम चतुर्थ द्वारा अस्‍वीकार करना यूरोप के इतिहास की एक आश्‍चर्यजनक घटना थी।
  5. इंग्‍लैण्‍ड हॉलैण्‍ड, स्विट्जरलैण्‍ड में उदार संविधान की स्‍थापना और मताधिकार का विस्‍तार भी एक आश्‍चर्यजनक घटना थी।
  6. मेटरनिख जैसे प्रतिक्रियावादी का पतन और उसका वियेना से पलायन अपने आप में एक आश्‍चर्यजनक घटना थी।
  7. कौसुथ जैसे योग्य नेता की हंगरी में असफलता एक आश्‍चर्यजनक घटना थी।

1848 की क्रांति की असफलता के कारण

   सन्‍ 1848 ई. की क्रांति यूरोप के इतिहास की एक महत्‍वपूर्ण घटना थी। कुछ समय तक इस क्रांति ने सम्‍पूर्ण यूरोप को प्रभावित कर रखा परन्‍तु बाद में यह क्रांति विफल हो गयी और यूरोप के अधिकांश देशों में पुन: निरंकुशता एवं स्‍वेच्‍छाचारी शासन का बोलबाला हो गया। इस क्रांति की असफलता के कारण निम्‍नलिखित थे-

क्रांतिकारियों में एकता का अभाव

इस क्रांति की विफलता का प्रमुख कारण यूरोप के क्रांतिकारियों मे आपसी फूट और मतभेद का होना था। क्रांतिकारियों के उद्देश्‍यों में भिन्‍नता थी जिसके कारण वे एकता के सूत्र में बँध कर प्रतिक्रियावादी शक्तियों का सामना न कर सके। यूरोप के क्रांतिका‍री अनेक गुटों में विभक्‍त थे, जिनके उद्देश्‍यों का कोई पता न था। यह निश्चित नही था। कि यह क्रांति सामाजिक थी अथवा राजनीतिक। कुछ क्रांतिकारी गणतंत्र की स्‍थापना के इच्‍छुक थे और कुछ वैधानिक राजसत्‍ता की स्‍थापना के समर्थक थे। फ्रांस के समाजवादियों और गणतंत्रवादियों में घोर विरोध था। इस विरोध के कारण फ्रांस के लगभग दस हजार श्रमिकों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा था, फ्रांस की क्रांति का उद्देश्‍य देश में गणतंत्र की स्‍थापना करना था किन्‍तु केवल 4 वर्षो के बाद ही नेपोलियन तृतीय ने फ्रांस में अपना निरंकुश शासन स्‍थापित कर लिया।

इसी प्रकार आस्ट्रिया, इटली और जर्मनी के क्रांतिकारियों में भी एकता का पूर्ण अभाव था। इसी कारण उन्‍हें अनेक स्‍थानों पर सरकारी सेनाओं से पराजित होना पड़ा। आस्ट्रिया के सम्राट ने ‘फूट डालों और शासन करो’ की नीति अपनाकर एक-एक करके सभी राज्‍यों की क्रांतियों का कठोरतापूर्वक दमन कर दिया और पुन: अपनी निरंकुश राजसत्‍ता स्‍थापित कर ली।

योग्‍य नेतृत्‍व का अभाव

यद्यपि 1848 ई. की क्रांति ने अनेक देशों को प्रभावित किया और वहाँ क्रांतियाँ भी हुई किन्‍तु क्रांतिकारियों में कोई ऐसा योग्‍य नेता न था जो उन्‍हें एकता के सूत्र में संगठित करके निरंकुश शक्तियों का विरोध करने योग्य नेता बनाता। क्रांतिकारियों के पास उत्‍तम हथियारों तथा साधनों का भी अभाव था और उनकी युद्ध प्रणाली भी अव्‍यवस्थित थी। वे एक भीड़ के समान शाही सेनाओं पर हमला करते थे। और शीघ्र ही पराजित हो जाते थे। क्रांतिकारियों ने अपने संविधानों मे राजाओं को अधिकारों वंचित करके एक बड़ी भूल की क्‍योंकि इससे राजा लोग भी क्रांतिकारियों से रूष्‍ट हो गए और उन्‍होंने अपनी शक्तिशाली सेनाओं के बल से क्रांतियों का कठोरतापूर्वक दमन कर दिया।

निरंकुश शासकों मे सहयोग की भावना

जहाँ पर क्रांतिकारियों में आपसी फूट और मतभेद था, वहाँ निरंकुश शासकों में पारस्‍परिक सहयोग की भावना विद्यमान थी। आस्ट्रिया के सम्राट ने यूरोप के निरंकुश राजाओं को क्रांतियों का दमन करने के लिये पर्याप्‍त सहायता दी। उत्‍तरी इटली की क्रांति उसी के सहयोग के कारण असफल रही। लुई नेपोलयन ने भी सेना भेजकर रोम के गणतंत्र को मिटाकर पोप की निरंकुश सत्‍ता स्‍थापित कर दी। प्रशा के सम्राट ने भी जर्मनी के शासक को क्रांति दबाने में भरपूर सहायता दी। आस्ट्रिया रूस की सहायता से हंगरी की क्रांति का दमन करने में सफल रहा। इस प्रकार निरंकुश शासकों के पारस्‍परिक सहयोग ने 1848 ई. की क्रांतियों को असफल बना दिया।

यूरोप की विभिन्‍न जातियों में आपसी वैमनस्‍य

आस्ट्रिया के विशाल साम्राज्‍य में विभिन्‍न जातियाँ निवास करती थीं जिनमें पारस्‍परिक स्‍पर्धा ईर्ष्‍या और वैमनस्‍य का बोलबालाल था। सभी जातियाँ एक-दूसरे को सन्‍देह की दृष्टि से देखती थीं। बोहेमिया की क्रांति जर्मनों और स्‍लावों के आपसी मतभेद के कारण विफल हो गई। हंगरी, इटली तथा जर्मनी से क्रीट मगयार, रूमानियम, चेक, हेगेरीयमन आदि जातियों के पारस्‍परिक वैमन‍स्‍य के कारण क्रांतियाँ असफल हो गयी। विभिन्‍न जातियों की फूट का लाभ उठाकर प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने क्रांतियों के दबाने में पूर्ण सफलता प्राप्‍त कर ली।

जनता का असहयोग

क्रांतिकारियों को अपनी जनता का पूर्ण सहयोग भी न मिल सका। जनता क्रांतिकारी नेताओं के कार्यक्रमों और उद्देश्‍यों से अनभिज्ञ थी और इसीलिये वह उनका समर्थन न कर सकी। जनता के असहयोग के कारण क्रांति का असफल होना निश्चित ही था।

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