गीतांजली की कहानी – सबक

गीतांजली की कहानी – सबक

संतु नाम का एक लड़का था। वह 12 वी का छात्र था। वह पढ़ने मे बहुत तेज़ था। पाठशाला मे वह हमेशा अव्वल रहता था। पर उसमे कुछ कमीया थी की वह दूसरे के द्वारा किए गए कार्यो का श्रेय खुद ले लिया करता था।

एक बार संतु और उसके दोस्त बीरु को पवन चक्की मे प्रोजेक्ट बनाने को मिला, जिसमे पवन चक्की के कार्य विधि को दर्शना और उसके फायदे के बारे मे सभी को समझाना था। बस उस दिन से बीरु उस प्रोजेक्ट मे मन लगा के काम करने लगा तथा संतु को भी कहता की जब मैं इस प्रोजेक्ट मे काम करता हूँ तो तुम भी मेरे घर आ जाओ या मैं तुम्हारे घर आ जाया करू, पर संतु उसकी बातों को सुन के भी अनसुनी कर देता था।

बीरु दिन रात उस प्रोजेक्ट मे काम कर रहा था और संतु कक्षा मे होने वाले आम टेस्ट की दुहाई दे के वह प्रोजेक्ट मे सहयोग से बच जाता था। उसे प्रोजेक्ट की कोई खास चिंता नहीं थी क्योकी वह उसके बारे मे किताब से पढ़ कर पूरी तैयारी कर लेगा और परीक्षक को भी इसके बारे मे नहीं पता चल पाएगा की उसने इस प्रोजेक्ट को नहीं बनाया हैं।

आखिर प्रोजेक्ट दिखाने का दिन आ गया और कक्षा मे सभी विद्यार्थियो ने अपने अपने प्रोजेक्ट को प्रोजेक्ट विश्लेषक को दिखाया, अंत मे संतु और बीरु के प्रोजेक्ट की बारी थी। संतु वाक-चपल बालक था, तथा उसने बीरु के बोलने से पहले ही प्रोजेक्ट का विश्लेषण करने लगा, प्रोजेक्ट को बनाने की पूरी विधि जो उसने कल रात को किसी किताब से रटी थी। उसने एक एक कर के परीक्षक के सामने एक बार मे ही प्रोजेक्ट का पूरा विवरण दे दिया।

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जिससे बीरु को कुछ बोलने का मौका ही नहीं मिला तथा परीक्षक ने भी सोचा की प्रोजेक्ट का मुख्य भाग संतु ने किया है और बीरु सिर्फ नाम के लिए जुडा है और उसने कोई काम नहीं किया। इस प्रकार प्रोजेक्ट का सारा श्रेय संतु को चला गया। शिक्षक और परीक्षक ने संतु की बहुत तारीफ की तथा प्रधान अध्यापक ने तुरंत ही संतु को पुरूस्कार रूप मे 20 रूपय दिये।

बीरु को यह देख के बहुत बुरा लगा की प्रोजेक्ट मे सारी मेहनत उसने की थी और संतु ने एक रति की भी मेहनत नहीं की थी, फिर भी सारा श्रेय उसकी जगह संतु को मिला। यह देख के कक्षा के अन्य छात्र भी बीरु की तरफ आ गए, क्यूंकी उनको पता था की प्रोजेक्ट मे सारी मेहनत बीरु ने की थी और इनाम का हकदार बीरु था न की संतु इसलिए कक्षा के अन्य छात्रों ने संतु को सबक सीखाने का पक्का इरादा किया।

26 जनवरी को 10 दिन बचे थे सभी लड़के मिलकर पाठशाला मे होने वाले समारोह की तैयारियां कर रहे थे। कुछ नृत्य तो कुछ नाटक की तैयारी कर रहे थे, संतु पाठशाला को सजाने का काम कर रहा था, पाठशाला के प्रांगण मे लगे हुये फूलो की काँटछांट कर रहा था। पाठशाला की रंगाई पुताई की देखभाल भी उसने अपने जिम्मे ले रखी थी। और पाठशाला के सभी कक्षाओ को सजाने का काम भी उसी ने उठाया हुया था, क्यूंकी इस बार इस गणतन्त्र दिवस मे शहर के विधायक पप्पू लाल शर्मा जी आ रहे थे। इसलिए उसने इतने सारे काम अपने सर ले रखे थे, पाठशाला के अन्य छात्र भी उसका सहयोग बड़े आनंद से दे रहे थे, पर छात्रो के उससे बदला लेने की प्रतिबध्यता का संतु को कोई भान न था।

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आखिर 26 जनवरी का दिन आ गाया था, क्षेत्र के विधायक पप्पू लाल शर्मा जी इस समारोह मे मुख्य अतिथि थे। 26 जनवरी के आयोजन के समाप्त होने के बाद प्रधान अध्यापक ने पुरस्कार वितरण किया और जैसे ही पाठशाला के साजसज्जा के लिए पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो संतु के पैरो से जमीन सरक गयी पाठशाला को सजाने के लिए यह पुरस्कार बीरु को दिया जा रहा था। संतु को बहुत बुरा लग रहा था की जो काम उसने इतने मेहनत और लग्नता के साथ किया है, उसका फल कोई और कैसे भोग सकता है पर संतु उस समय कुछ न बोल सका, तभी उसके एक चमचे मित्र ने उसे बताया की कक्षा के सभी छात्रो का यह परपंच था।

उन्होने ही तुम्हें सबक सीखाने के लिए ये चाल चली और सबने प्रधान अध्यापक के पूछने पर की किसने पाठशाला को सजाया है एक स्वर मे बीरु का नाम लिया था और इसलिए बीरु को यह पुरस्कार मिल रहा है। अब संतु को अपनी गलती का एहसास होने लगा जो कृत्य वह दूसरों के साथ करता था, आज वह उसी के साथ हो गया था। उसने वही पर बैठे बैठे ही मन मे यह निश्चय किया की अब से वह किसी के साथ भी एसा नहीं करेगा। अब से वह किसी का श्रेय नहीं मारेगा तथा दूसरों को भी किसी दूसरे का हक नहीं मारने देगा। इसके बाद उसने बीरु के प्रति उठे अपने सभी विचारो को त्याग दिया और पाठशाला के बाहर जा कर बीरु और कक्षा के सभी छात्रो से अब तक किए सभी अपराधो की क्षमा मागी। कक्षा के सभी छात्रो ने उसे माफ कर दिया और बीरु और संतु फिर से अच्छे दोस्त बन गए।