प्राचीन काल में बच्चे गुरुकुल में पढ़ने जाते थे। वहाँ पर गुरु अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। एक गांव के एक आश्रम में वरदराज नाम का बालक पढता था। वह पढ़ने में बहुत कमजोर था सब उसका मजाक उड़ाते थे।
गुरूजी जो पढ़ाते थे उसे वह समझने में कठिनाई होता और याद नहीं रख पाता था इसलिए उसका मन पढाई में नहीं लगता था। उसके सभी सहपाठी उच्च कक्षा में चले जाते थे और वो एक ही कक्षा में रह जाता था। गुरूजी ने उसे पढ़ाने में बहुत मेहनत की लेकिन उसपर असर नहीं हुआ अंत में हारकर गुरूजी ने उसे आश्रम से निकाल दिया।
वह भारी मन से दुखी होकर वहां से जाने लगा, रास्ते में वो सोचने लगा की घर जा कर पिताजी के सामने क्या मुँह दिखाऊंगा कैसे कहूंगा की गुरूजी ने मुझे निकाल दिया है। जाते-जाते रास्ते में उसे प्यास लग गयी उसने एक कुआँ देखा उसके नजदीक गया और वहाँ रखे बाल्टी से पानी निकाल कर पिया। पानी पिने के बाद उसने देखा की कुँए की जगत(सील) पर रस्सी से बार बार घिसने से गड्ढे और निसान पड़ गए है।
उसने सोचा की यदि बार-बार एक नरम रस्सी घिस घिस कर कठोर पत्थर पर निसान कर सकता है तो मैं क्यों बार बार याद करके और कठिन परिश्रम करके विद्या प्राप्त नहीं कर सकता। और वो वहां से घर नहीं गया वो वापस आश्रम आया। उसे वापस आते देख गुरूजी ने पूछा क्या बात है , वरदराज घर क्यों नहीं गए ? वरदराज ने कहा गुरूजी मुझे और एक अवसर दीजिये इसबार में बहुत मेहनत करूँगा इसबार आपको निराश नहीं करूँगा। गुरजी उसके आत्मविश्वास को देखकर बहुत खुश हुए और उसे फिर से पढ़ाना शुरू किये।
वरदराज इसबार पुरे मन लगाकर पढ़ने लगा वो गुरूजी के बातों को ध्यान से सुनता और गुरूजी द्वारा दिए गए सवाल को पहले हल करके दिखा देता। वो अब अपने कक्षा में सबसे तेज शिष्य बन गया था। गुरूजी उसका अब प्रसंशा करने लगे थे।और यही वरदराज बड़े होकर संस्कृत के महान विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हुए और इन्होंने बहुत सारे रचनाएँ लिखीं। जिसमें लघुसिद्धान्तकौमुदि प्रमुख हैं। इनका जीवन पर एक आधारित दोहा है,
करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरि आवत जात ते , सील पर परत निशान।
शिक्षा : अगर हम जीवन में कुछ भी ठान ले की हमें यह करना हे तो हम लगातार कठिन परिश्रम से उसे प्राप्त कर सकते है।