भारत के महान सम्राट और उनकी कहानियाँ | Hindi Kahani of Great Emperors of India

भारत के महान सम्राट और उनकी कहानियाँ | Hindi Kahani of Great Emperors of India

हिन्दी कहानी – सम्राट अशोक

चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र विंदुसार थे और विंदुसार के पुत्र सम्राट अशोक थे। विंदुसार के मृत्यु के बाद अशोक मगध का नरेश बने। अशोक बचपन से ही बड़े तेजस्वी थे और उग्र प्रकृति के थे। वह ब्राम्हण माँ की संतान थे। और वह अपनी माँ से बहुत प्रेम करते थे। सिंहासन पर बैठते ही अशोक ने राज्य का विस्तार करना प्रारम्भ कर दिया था। कम्बोज से दक्षिण भारत के कर्नाटक तक और बंगाल से पूरे अफगानिस्तान तक  उन्होने अपने राज्य का विस्तार किया था। कुछ ही समय मे उन्होने पूरे अखंड भारत पर विस्तार कर लिया था। किन्तु कलिंग जो की उड़ीसा मे था, वह राज्य उनके अधीन नहीं आया था। इसलिए अशोक ने कलिंग पर आक्रमण कर दिया। कलिंग के सैनिक बहुत वीर थे। वे सभी बहुत ही वीरता से लड़े। लेकिन अशोक के चाह और शक्ति के सामने कलिंग के सैनिक नहीं तिक पाये और अंत मे अशोक की विजय हुई। लेकिन इस युद्ध मे इतने सैनिक मारे गए की उनकी लाशों का ढेर देख कर अशोक बहुत दुखी हुआ, क्योंकि हिन्दू होने के नाते उसके मन मे मानवता, दया का भाव जन्म से ही था। उसी वक्त अशोक ने प्राण लिया की की अब वह कभी भी कोई युद्ध नहीं लड़ेगा। और ब्राम्हण पद्धति के से मिलती जुलती एक नए धर्म को स्वीकार्य कर लिया। यह धर्म बौद्ध धर्म था, और एक भिक्षु का जीवन जीने लगा।

बौद्ध धर्म को स्वीकार्य करने के बाद अशोक ने अपनी सारी शक्ति धर्म प्रचार मे लगा दी। स्थान-स्थान पर पत्थर के खंबे लगवाए, जिन पर बौद्ध धर्म की शिक्षाएं लिखी गई थी।

बड़ी बड़ी चट्टानों पर  साधारण सादर से संबन्धित नियम लिखवाये गए थे। बौध्य धर्म का प्रचार करवाने के लिए अशोक ने कर्मचारियों की नियुक्ति की थी। अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्र को भिक्षु बना कर श्री-लंका मे बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा था। यहाँ तक की दूर देश चीन मे भी अशोक ने धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा।

जिस प्रकार आज कई धर्म लगातार हिन्दू धर्म को खत्म करने के लिए षड्यंत्र रच रहे हैं, उसके उलट अशोक को हिन्दू धर्म से बहुत प्रेम था, जैसा की वह एक हिन्दू था और उसकी माँ एक ब्रांहण थी, इस लिए वह इस धर्म की रक्षा करता था। और हिन्दू धर्म से संबन्धित रीतिरिवाजों को मानता था।

दान आदि करने मे वह कभी भी भेदभाव नहीं करता था। अपने प्रजा की लाभ के लिए वह लगातार काम करता रहता था। किसानो, व्यापारियो, ब्रांहण शिक्षको के लिए उसने विशेष कार्य किए थे। पशुओ को प्राचीन भारत मे धन का दर्जा प्राप्त था। इसलिए जगह जगह उसने जानवरो के लिए चिकित्सालय बनवाए थे। सड़कों के किनारे अशोक ने छायादार पेड लगवाए थे। उसने नागरिकों के लिए कुए और सरोवर का निर्माण कराया, दीपावली के दिन वह व्रत करता था, और धूमधामसे लक्ष्मी पूजन कर के नगर के लोगो को दान दिया करता था।

अशोक ने आज्ञा दी हुई थी की अगर किसी नागरिक को राजा से रात्री मे भी मिलना हो तो वह मिल सकता हैं, नागरिक को अशोक से मिलने से नहीं रोका जाएगा। रात को अगर कोई नागरिक अशोक से मिलना चाहता था, तो उसे रोका नहीं जाता था। अशोक ध्यान से उसकी समस्या को सुनता और उसकी समस्या का निराकरण करता था।

लंका, वर्मा, पुवी  समूह, सीरिया और मिस्र   तक अशोक ने अपने दूत भेजे और इन देशो मे बौद्ध धर्मका प्रचार करवाया। अशोक का शासन बहुत ही व्यवस्थित और उदार था। प्रजा खूब सुखी थी। प्रजा मे सत्य, सदाचार, सनातन धर्म की वृद्धि हो यह अशोक का लक्ष्य था।

(अशोक की कहानी यहाँ से समाप्त होती हैं)


 

हिन्दी कहानी – विष्णुभक्त सम्राट समुद्रगुप्त

जब चंद्रगुप्त सन 319 में साकेत की गद्दी पर बैठे, तब उस समय साकेत एक बहुत छोटा सा राज्य था. लेकिन चंद्रगुप्त ने ताकत, इच्छा शक्ति और साहस के दम पर अपने राज्य को प्रयागराज तक बढ़ा लिया. प्रयागराज इलाहाबाद का प्राचीन नाम है, विदेशी लुटेरों और डकैतों ने प्रयागराज का नाम बदलकर इलाहाबाद कर दिया था. जिसे हिंदू नेता योगी आदित्यनाथ ने नाम बदलकर, पुनः प्रयागराज कर दिया. चंद्रगुप्त अपने राज्य की सीमाओं को लगातार बढ़ाता जा रहा था. उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिंहासन पर बैठा. उसके पुत्र का नाम समुद्र गुप्ता. समुद्रगुप्त ने 335 ईशा में गद्दी संभाली थी. समुद्रगुप्त एक हिंदू प्रतापी राजा था. वाह बहुत ही प्रतापी एवं प्रगतिशील राजा बना, ऐसा राजा बहुत मुश्किलों से ही किसी देश को मिलता है. उसके शासनकाल को भारत का अब तक का सबसे अच्छा शासन काल कहा गया है, और उसके शासनकाल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है.

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विश्व का जो भी प्रतापी राजा रहा हो, चाहे सिकंदर, या फिर नेपोलियन बोनापार्ट, सब के सब समुद्रगुप्त के शक्ति और राज्य चलाने के तरीकों के हिसाब से, समुद्रगुप्त के सामने बौने(छोटे ) साबित होते हैं। समुद्रगुप्त ने अपने शासनकाल में आज के छत्तीसगढ़, बस्तर, आंध्र प्रदेश और कलिंग जैसे छोटे-मोटे प्रदेशों को अपनी शक्ति के दम पर जीत लिया था। पड़ोसी राज्य के राजा समुद्रगुप्त की शक्ति को देखकर उसके सामने नतमस्तक हो गए थे, और उन्होंने समुद्रगुप्त को सम्राट स्वीकार कर लिया था। त्रिपुरा, कामरूप, कुमायूं जैसे अनेक राज्यों ने उन्हें अपना महाराजाधिराज मान लिया था।

परंतु भारतीय चक्रवर्ती सम्राट केवल विजेता नहीं होते हैं, हिंदू राजा किसी राज्य को पराजित करके वहां के लोगों को गुलाम बनाकर उनके ऊपर क्रूरता नहीं करते हैं। हिंदू राजा धर्म को मानने वाले, सत्य को मानने वाले और दयालु होते हैं। समुद्रगुप्त भी एक महान हिंदू राजा था, और जब वह किसी राज्य को जीत लेता था, तो वह उस राज्य के लोगों को भी, अपनी प्रजा मानकर, उनके दुख और कष्टों का निराकरण करता था। इसलिए जनता उसे भगवान की तरह माना करती थी। समुद्रगुप्त पराजित राज्यों, के लिए उपयुक्त राजा चुनता था, और उन्हें उस राज्य की राजगद्दी दे देता था। समुद्रगुप्त की उदारता, कीर्ति और प्रताप के कारण काबुल, सिंघल, मिस्र, सीरिया सब समुद्रगुप्त की इज्जत करते थे, और यह सभी राज्य समुद्रगुप्त को टैक्स दिया करते थे। समुद्रगुप्त ने वर्तमान में भारत को फिर से जुड़ा था, आज के पश्चिम में बहुत दूर तक अपने शासन को फैलाया था। यवन राज्य के लोग भी समुद्रगुप्त को अपना राजा और सम्राट मानते थे।

दिग्विजय करके समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, यह यज्ञ दयालु हिंदू राजा का सपना होता है। समुद्रगुप्त के पहले यह यज्ञ, परीक्षित का लड़का जन्मेजय ने कराया था। कलयुग में इस यज्ञ को करना अत्यंत कठिन माना गया है, इस यज्ञ के दौरान सभी पड़ोसी राज्यों को, यज्ञ कराने वाले राजा को अपना सम्राट मानना होता है। अन्यथा उन्हें युद्ध की चुनौती स्वीकार करनी पड़ती है। अश्वमेध यज्ञ का आयोजन बताता है, की समुद्रगुप्त का प्रताप कितना ज्यादा था। समुद्रगुप्त कभी भी कोई युद्ध नहीं आ रहा था, और वह एक आदर्श राजा था, वह बहुत दयालु था, वाह बहुत दानी था। और जैसा एक हिंदू राजा होता है, सभी लोगों की रक्षा करता है। वैसे ही समुद्रगुप्त भी सब की रक्षा करने के लिए तैयार रहता था। समुद्रगुप्त सम्राट के साथ-साथ स्वयं एक विद्वान व्यक्ति था, वह कविताएं और संगीत लिखने में बहुत ही निपुण था। इसके साथ वाह भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। वह हिंदू धर्म को मानने वाला, राजा था फिर भी वह अपने राज्य में, दूसरे धर्म का सम्मान करता था, श्रीलंका के बौद्ध राजा, बुद्ध गया में एक बिहार बनवाना चाहते थे, तो समुद्रगुप्त ने बड़ी खुशी के साथ उसे अनुमति दे दी। और जरूरत पड़ने पर श्रमिकों और धन तक की पूर्ति कर दिया करते थे। समुद्रगुप्त ने 380 ईशा तक शासन किया था।

(कहानी समाप्त)


हिन्दी कहानी – इंदौर की रानी अहिल्याबाई

जिस समय मल्हार राव होल्कर गुजरात के विद्रोह का दमन करके पूना जा रहे थे, उसी समय उन्होने पाथरड़ी मे सिंधिया की पुत्री अहिल्याबाई को देखा। यह सुशील कन्या अपने गुणो के कारण बचपन मे ही सबकी लाड़ली थी तथा सभी लोग अहिल्या बाई का आदर किया करते थे। मल्हार राव जी उस लड़की को इंदौर ले आए और अपने बड़े लड़के खांडेराव के साथ अहिल्या का विवाह करा दिया। एक गरीव की लड़की इस प्रकार वह होल्कर राज्य की  राजवधू बन गई।

अहिल्याबाई मे राजवधू बनने के बाद भी वही सरलता थी, जो सरलता उनकी शादी के पहले थी। उन्हे राजवधू होने का कोई घमंड नहीं था। वो सास-ससुर की सेवा किया करती थी। जब से उन्हे सोचने समझने की शक्ति मिली थी तब से ही वो भगवन की बहुत पूजा पाठ किया करती थी। पूजा-पाठ के साथ वो राज्य के प्रबंधन मे अपने पति और ससुर की सहायता भी किया करती थी। अहिल्याबाई ने संतान के रूप मे एक लड़के और एक लड़की को जन्म दिया था। अहिल्या बाई के विवाह के 9 वर्ष बाद उनके पति का देहांत हो गया था। ससुर मल्हार राव ने शासन का पूरा भार अहिल्या बाई को सौंप दिया। मल्हार राव के देहांत के बाद अहिल्याबाई का लड़का राजा बना। लेकिन वह क्रोधी और उतावला था। कुछ दिनो बाद उसकी मृत्यु हो गई। शासन का पूरा भार अहिल्या बाई को संभालना पड़ा। अहिल्याबाई ने राज्य को सुचारु रूप से चलाया।

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माधवराव पेशवा के चाचा रघुनाथ राव ने इंदौर पर अधिकार करने की योजना बनाई थी। रानी अहिल्याबाई ने यह समाचार पाकर युद्ध की तैयारी की और पेशवा माधवराव को पत्र लिखा। उनके पत्र के उत्तर मे माधवराव ने उनके शासन करने के तरीके की प्रशंसा की, रघुनाथ राव सेना लेकर अहिल्याबाई के राज्य मे हमला करने के लिए आंगे तो बढ़ा था, किन्तु अहिल्या बाई की वीरता और युद्ध की तैयारी देखकर उसका साहस छूट गया। वह कुछ दिन इंदौर मे अहिल्याबाई का मेहमान बनकर रहा और कुछ दिन बाद वापस लौट गया।

अहिल्याबाई एक आदर्श हिन्दू विधवा नारी का जीवन व्यतीत कर रही थी। वे सादे वस्त्र पहनती थी, ब्रांहणों से वेद-पुराण का पाठ सुना करती थी। समाज के हर वर्ण के लिए वो काम कर रही थी। उन्होने कमजोर वर्ग को आरक्षण दिया था। तीर्थस्थानों मे उन्होने धर्मशालाए बनवाई, मंदिर बनवाए। राहगीरो के लिए रास्तो मे कुएम बाबाड़ी का निर्माण कराया। सड़क किनारे छांवदार और फलयुक्त पेड़ लगवाए। उनका सारा समय पुजा-पाठ, परोपकार अथवा प्रजा के कष्टो को दूर करने मे ही लगता था।

एक बार रघुनाथ राव ने युद्ध के लिए उनसे धन मांगा था। रानी ने उत्तर दिया- मेरा सारा धन दान के लिए हैं। आप ब्रांहण हैं, संकल्प पढ़कर दान लेना चाहे तो मैं प्रस्तुत हूँ। रघुनाथ राव उनके उत्तर से चिढ़ गए, और उन्हे सबक सीखने के लिए सेना लेकर उनपर हमला कर दिया। रानी ने पाँच सौ स्त्रियो की सेना साथ मे ली और किले से बाहर जाकर रघुनाथ को चुनौती दी और कहा- आप राजा हैं, पर क्या स्त्री का धन लूटना आपको सोभा देता हैं? हम सब को मारकर ही आप यहाँ की संपत्ति ले जा पाएंगे।

यह सब सुनकर रघुनाथ राव लज्जित हो गए। तो उन्होने अपनी सेना को वापस बुला लिया। अहिल्या बाई इतना दान-पुण्य किया करती थी। लेकिन उन्हे कभी भी इसका घमंड नहीं हुआ, एक बार एक ब्रांहण उनकी प्रशंसा मे एक पुस्तक लिख कर उनके पास ले गया, रानी ने पुस्तक को सुन कर और उसे नदी मे प्रवाहित कर दिया, मंत्री के पुछे जाने मे उन्होने कहा- इस किताब मे मेरी बहुत ही अधिक प्रशंसा की गई हैं, मेरे अंदर इनमे से कोई गुण नहीं हैं।

अहिल्याबाई ने अपने पूरे जीवन धुखी लोगो की दुख  निवारण, परोपकार का काम किया। प्रजा के लाभ और हित के लिए उन्होने खूब दान किया। उनकी उदारता के कारण उनकी सीमा से लगे राज्य के राजा भी उनका सम्मान करते थे। विदेश से आए डकैत जो दिल्ली मे बैठे थे, वो भी अहिल्याबाई के राज्य मे चढ़ाई करने से पहले कई बार सोचते थे। जब उनका परलोक वास हुआ, तो उनकी प्रजा बहुत दुखी हुई, प्रजा अहिल्याबाई को सगी माँ की तरह ही मानती थी। उनके राज्य के अलावा देश के सभी राज्यो मे उनके मृत्यु का शोक मनाया गया था। आज उनके नाम पे इंदौर मे एक विश्वविद्यालय भी हैं, जो मध्य प्रदेश का सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालय हैं।

(कहानी समाप्त)


हिन्दी कहानी – झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को हुआ था। लक्ष्मी बाई का बचपन नाना साहब के साथ बीता था। जबकि बाजीराव पेशवा ने इनके शिक्षा की व्यवस्था की थी। पढ़ाई-लिखाई के अलावा इन्हे घुडसारी और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी गई थी। लक्ष्मी बाई को उनके बाल्यकाल मे मनुबाई के नाम से पुकारा जाता था। लक्ष्मी बाई के पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी बाई था। लक्ष्मी बाई के माता और पिता दोनों ही धार्मिक व्यक्ति थे, दोनों ही शिव और विष्णु के उपासक थे। और ब्रांहणों को दान दिया करते थे। झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ लक्ष्मी बाई का विवाह हुआ था। और लक्ष्मीबाई झाँसी की रानी बन गई थी। लेकिन विवाह के कुछ दिन बाद  रानी लक्ष्मी बाई के पति गंगाधर का निधन हो गया, और लक्ष्मी बाई विधवा हो गई।

कोई संतान न होने के कारण लक्ष्मीबाई ने आनंदराव दामोदर नाम के एक बालक को गोद ले लिया। झाँसी का राज्य हमेशा से अंग्रेज़ो का विश्वासपात्र राज्य था। लेकिन उस समय के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने लक्ष्मीबाइ के द्वारा गोद लिए बच्चे को गलत बताया, और उसे उत्तराधिकारी मानने से माना कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हे कई निवेदन लिखे की किसी भी प्रकार के निर्णय को करने से पहले अच्छी तरह से उत्तराधिकारी की बात को सोच ले। पर डलहौजी ने उनके किसी भी निवेदन को नहीं माना। और झाँसी के राज्य को अँग्रेजी राज्ये मे मिला लिया। और रानी लक्ष्मी बाई के गुजारे भत्ते के लिए एक पेंशन तय कर दिया। अंग्रेज यही पर नहीं रुके। रानी लक्ष्मी बाई ने अपने दत्तक पुत्र के नाम पर 7 लाख रूपय जमा किये थे। जब दत्तक पुत्र का उपनयन-संस्कार हुआ तो अंग्रेज़ो ने केवल 1 लाख रूपय दिये, बाकी के पैसे हड़प लिए। राज्य भी गया और संपत्ति भी गई। इतना सब कुछ होने के बाद भी रानी लक्ष्मी शांत रही। रानी लक्ष्मी बाई एक आदर्श हिन्दू नारी का जीवन व्यतीत कर रही थी। पूजा-पाठ-जप-तप तथा दान-कर्म मे ही ज्यादातर व्यस्त रहती थी। प्रतिदिन वो पूजा करती, पुराण सुनती और दान करती। उनका जीवन वैराग्यपूर्ण बीत रहा था।

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अंग्रेज़ लगातार लक्ष्मीबाई को उकसाने का प्रयास कर रहे थे। लुटेरा नत्थे खान ने अंग्रेज़ो को भड़काया जिसके बाद अँग्रेजी सेना ने रानी लक्ष्मी बाई को गिरफ्तार करने के लिए झाँसी रवाना हो गई। धर्म और सत्य की रक्षा के लिए आखिरकार रानी लक्ष्मी बाई ने हथियार उठा ही लिया, झाँसी की राज-भक्त प्रजा ने अपनी रानी का साथ दिया। अंग्रेज़ो की अपार सेना ने किले को घेर लिया। तोपों के मार से किला धू-धू करके जल रहा था। किन्तु अँग्रेजी सेना के सेनापति को अपनी विजय पर विश्वास ही नहीं था। वीरांगना लक्ष्मीबाई के पराक्रम ने अंग्रेज़ो के हौसले पस्त कर दिये थे। अंग्रेज़ो ने छिपकर वार करना प्रारम्भ कर दिया। लेकिन अंत मे विवश होकर रानी ने किले को छोड़ने का फैसला लेना पड़ा।

अंग्रेज़ो की विपुल वाहिनी ने किले को घेरा हुआ था। किन्तु लक्ष्मी बाई ने उन्हे चकमा देकर बाहर निकल आई। एक अंग्रेज़ सेना उनका पीछा कर रही थी। बार-बार घूमकर लक्ष्मीबाई पीछा करने वाले शत्रुओ का सफाया करती हुई आगे बढ़ रही थी। 102 मील की यात्रा घोड़े की पीठ पर करके वे कालपी पहुंची। लेकिन दुर्भाग्य से कालपी मे अंग्रेज़ो की विजय हुई। वहाँ से भी उन्हे भागना पड़ा।

शत्रुओ ने उन्हे घेर लिया था। अँग्रेजी सेना का संहार करती हुई रानी लक्ष्मी बाई उनके घेरे को तोड़कर वे फिर से उन्हे चकमा से कर निकल गई। लेकिन फिर से दो अंग्रेज़ सैनिक उनके पीछे लग गए। मार्ग मे एक बड़ा नाला मिला जिसकी वजह से लक्ष्मीबाई का घोडा रुक गया। पीछे से शत्रु आ गए और लक्ष्मीबाई पर हमला कर दिया। खून से उनका शरीर लथपथ हो गया था। किन्तु गिरते-गिरते उन्होने उन दोनों शत्रुओ का सिर उनके तन से अलग कर दिया। शत्रुओ को मरने के बाद उनका शरीर ढीला पड़ गया, हाथ से तलवार छूट गई और वो इस लोक को छोड़ कर विष्णु लोक को सिधार गई। पर उनकी इस आजादी की चिंगारी ने देश के लोगो के अंदर आजाद होने का जज्बा ला दिया। और सुभाष चन्द्र जैसे राष्ट्रभक्तों से डर कर अंग्रेज़ो को भारत छोड़ा पड़ा।