रमेश पढ़ाई में होशियार होते हुए भी बहुत आलसी था। वह आज के काम को कल और कल के काम को परसों के लिए छोड़ दिया करता था। इस कारण उसका वह काम समय बीत जाने के बाद भी कभी पूरा नहीं हो पाता था। रमेश की माँ का स्वर्गवास हो चुका था, केवल पिता ही उसके साथ थे।

उसके पिता शहर के एक उद्यान में पौधों की देखभाल का काम करते थे। वहाँ उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी, फिर भी उन्होंने रमेश को कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी। वे हमेशा रमेश का ख्याल रखते थे और उसकी हर जरूरत पूरी करते थे, पर रमेश इन सुविधाओं का नाजायज फायदा उठाता था। वह इसलिए आलसी और लापरवाह हो गया था।

इस तरह समय व्यतीत होने लगा। रमेश की अर्धवार्षिक परीक्षा समाप्त हो चुकी थी। जब परीक्षा का परिणाम निकला तो वह सभी विषयों में फेल हो गया। इसी कारण छुट्टी के पश्चात वह चुपचाप घर में आकर खाट पर लेट गया। उसका मन बहुत अशांत था। वह सोच में पड़ गया कि बापू पूछेंगे तो वह क्या जवाब देगा?

शाम हो चुकी थी। रमेश के पिता काम करके घर लौट रहे थे। कुछ लड़के उनके आगे-आगे बातें करते हुए चल रहे थे।
उनमें से एक लड़का कह रहा था, “अरे, रमेश तो इस वर्ष अर्धवार्षिक परीक्षा में फेल हो गया है।”
इस पर दूसरे ने कहा, “वह पढ़ने में आलसी और कामचोर है, तब फेल नहीं होगा तो क्या पास होगा?”

यह सुनकर रमेश के पिता की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

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उन्हें रमेश से न जाने क्या-क्या आशाएं थीं। वे सोचते कि जब रमेश पढ़-लिखकर कोई अच्छी सी नौकरी करेगा तो वह स्वयं यह नौकरी छोड़ देंगे और आराम से रहेंगे। परंतु रमेश के फेल होने की बात सुनते ही उन्हें लगा कि उनके सारे सपने टूटने लगे हैं। वे गुस्से में तेजी से घर पहुँचे। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि आज इसे इतना मारूंगा कि जिंदगी भर याद रखेगा। उसे क्या मालूम कि मैं दिन-रात मेहनत करके कमाता हूं और वह…।

रमेश के पिता ने घर में प्रवेश करते हुए गुस्से में दरवाजे को पैर से जोरदार धक्का दिया। घर के भीतर पहुँचते ही रमेश को तकिए के भीतर मुँह छुपाकर लेटा हुआ पाया तो उनका सारा गुस्सा मोम की तरह पिघल गया।

उन्होंने रमेश से बड़े प्यार से कहा, “क्यों बेटे रमेश, क्या बात है? आज तुम इतने उदास क्यों दिखाई दे रहे हो?”
इस पर रमेश ने कहा, “नहीं बापू, कहाँ उदास हूं? आज मैं कुछ ज्यादा ही थक गया हूं।

उसकी बात सुनकर रमेश के पिता ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने हाथ पैर धोए और भोजन बनाने में जुट गए। भोजन बन जाने के बाद उन्होंने रमेश से खाना खाने को कहा।

भोजन परोसते हुए वे बोले, “क्यों बेटे, तुम्हारी अर्धवार्षिक परीक्षा का परिणाम कैसा रहा? तुम पास हो गए या फेल?”
सुनते ही रमेश का जी धक् से हो गया। फिर भी वह अपने को काबू में रखते हुए बोला, “बापू मैं सभी विषयों में पास हो गया हूं।

बेटे की बात सुनकर पिता के दिल को ठेस लगी। उन्होंने कहा, “बेटा, तुम झूठ बोल रहे हो या वे लड़के, जो अभी लौटते समय मेरे आगे चल रहे थे, यह तो मैं नहीं जानता, पर वे लड़के कह रहे थे कि रमेश अर्धवार्षिक परीक्षा में फेल हो गया है। बेटे मैं चाहता हूं कि तुम पढ़-लिखकर कोई अच्छी-सी नौकरी करो और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी हालत मेरी तरह हो… ।” कहते हुए रमेश के पिता का गला रूंध गया और वह आगे कुछ न कह सके।

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इतना सुनना था कि रमेश फूट-फूटकर रोने लगा। वह माफी मांगते हुए बोला, “बापू, एक बार मुझे माफ कर दो, कमा अब मैं आपसे झूठ नहीं कहूँगा। वास्तव में मैं फेल हो गया हूं। अब मैं मेहनत और लगन से पढ़कर अच्छे नंबरों से पास होउँगा।”

इस घटना के बाद रमेश एकदम बदल गया था। अब वह मन लगाकर पढ़ाई करता। घर का सारा काम भी करता, फिर खाना पकाता तथा अपने पिता के कामों में सहायता किया करता। जब उसके पिता काम से लौटते तो रमेश उनका इंतजार करते हुए मिलता। पिता को रमेश के इस परिवर्तन से आश्चर्य हो रहा था।

जब रमेश की वार्षिक परीक्षा का परिणाम निकला, तो वह अपनी कक्षा में प्रथम आया था। रमेश के पिता ने सुना तो खुशी के मारे उनकी आँखों मे आंसू आ गए। उन्हें लग रहा था कि अब उनके सारे सपने पूरे होने लगे हैं। अब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि रमेश पढ़-लिखकर जरूर एक दिन अच्छी-सी नौकरी करेगा।

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