एक बार की बात है, जाड़ों के दिन थे। मौसम काफी सुहावना था। आकाश के ऊपर कहीं-कहीं काले, मटमैले तथा भूरे बादल तैर रहे थे।

दादाजी ने उस दिन की छुट्टी कर ली थी और घर पर सभी बच्चों की भी छुट्टी थी। सभी बच्चे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि दादा जी कहानी-वहानी तो सुनाते नहीं है। मगर उस दिन उनका मूड कुछ ज्यादा ही अच्छा था। इसलिए उन्होंने कहा- “दादाजी! आज तो आप हमें एक मजेदार-सी कहानी सुना दीजिए। बड़ा मजा आएगा।”

यह बात सुनकर पहले तो दादाजी चुप हो गए। फिर बोले- “भई, कहानी तो बच्चों रात में ही सुनाई जाती है। इस समय दिन है, रात में कहानी सुनना।”

तुरंत राहुल ने कहा- “दादाजी, इसे न दिन कह सकते हैं न रात। आप चाहें कुछ भी कह लीजिए मगर आज तो आपको कहानी सुनानी ही पड़ेगी।” सभी बच्चे जिद्द पर अड़ गये।

दादाजी चाय की घूंट भरते हुए बोले- “ठीक है।”

उनके ऐसा कहने से लगा कि वह कहानी सुनाने के लिए राजी हो गए हैं।

लेकिन जैसे ही उनके मुंह से निकला ‘यत भावयसि तत भवसि’, तब सारे बच्चों ने अपना माथा पीट लिया। ये कहानी क्या सुनायेंगे, यह तो दर्शन का पाठ अथवा श्लोक रटवायेंगे।

सभी बच्चों के चेहरों पर उदासी छा गई थी।

दादाजी ने जब बच्चों की ऐसी हालत देखी तो वह ठहाका मारकर हँसने लगे और कहना आरम्भ किया- “मेरे प्यारे बच्चों। आज एक बात मैं तुम्हें बता दूं कि अगर इंसान के पास हिम्मत हो तो वह जो चाहे पा सकता है। इसी प्रकार मैं तुम्हें अपने दोस्त की कहानी सुनाता हूं। यह कहानी उन दिनों की है जब मैं पुलिस लाइन में था। अगर तुम्हें इस बात पर यकीन आ जाये तो तुम जीवन में कभी भी आजमा लेना, वरना आगे खुद तुम्हारी मर्जी है।

सभी बच्चों ने उनकी तरफ ध्यान लगाया।

बात उन दिनों की है जब दादाजी थाने में हैड थे। वहीं धीरसिंह नाम का एक सिपाही भी काम करता था। धीरसिह बड़ा बहादुर, ईमानदार और उत्साही व्यक्ति था। इसके साथ-साथ वह कठोर परिश्रम भी करना जानता था।

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वे अपनी नौकरी के अन्दर बड़ी मेहनत से काम करता था और कितने कामों में अपने बहादुरी के कारनामे भी दिखा चुका था। सभी लोग उसकी बहादुरी के कायल थे।

एक बार तो उसने अपनी जान जोखिम में डालकर डाकुओं के सरदार को पकड़ लिया था जो हर वक्त अपने पास चाकू, छुरा तथा पिस्तौल रखता था। उसने खेतों के पार एक जंगल में अपना डेरा जमा रखा था और अंधेरा होते ही आते-जाते लोगों को लूट लेता था।

एक दिन की बात है, धीरसिंह पास ही के गांव से लौट रहा था। अचानक उसके कानों में किसी लड़की के चीखने की आवाज सुनाई पड़ी। वह उधर लपका तो क्या देखा कि बहुत लम्बा, बड़ी-बड़ी मूंछों वाला स्याह डरावना आदमी एक लड़की को दबोचे हुए खड़ा है।

यह देखकर धीरसिंह समझ गया कि यह गुण्डा हरखू ही हो सकता है। वह एक पल गंवाये बिना ही उसकी ओर लपका। उसके ऐसा करते ही एक गोली चली और उसके कान के पास से गुजर गई।

लेकिन धीरसिंह ने हरखू को दबोच लिया और दोनों में गुत्थमगुत्था होने लगी। जैसे ही हरखू ने अपना छुरा धीरसिंह के सीने में घोंपना चाहा, उसने फुर्ती से अपना बचाव किया। तभी उस गांव की लड़की ने हरखू की टांग पीछे से खींची कि वह चारों खाने चित्त जाकर पड़ा। तभी धीरसिंह ने उसे दबोच लिया और उसी का छुरा उसकी गर्दन पर घोंप दिया।

गर्दन से खून की फौहार छूटी तो हरखू घबरा गया और चीखते हुए गिरता पड़ता वहां से भाग निकला। ऐसा महसूस हो रहा था कि आगे जाकर वह गिर पड़ेगा लेकिन अन्धेरे की वजह से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

उस लड़की को लेकर धीरसिंह आ पहुंचा। वहां आकर पता हुआ कि वह प्रधान की लड़की थी और प्रधान से हरखू की कोई पुराना दुश्मनी चली आ रही थी।

अगले ही रोज पता चला कि हरखू मर गया। यह खबर आसपास के अफसरों और लोगों के पास पहुंची। कोतवाल साहब ने भी उसकी बड़ी प्रशंसा की। उसकी नौकरी की किताब में अच्छी-अच्छी बातें लिख दी, जिससे उसकी आगे चलकर तरक्की हो सके।

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लेकिन उसी थाने के अन्दर एक चुगलखोर व कामचोर सिपाही भी मौजद था। वह धीरसिंह से जलता था। उसने अफसरों के कान भरने शुरू कर दिये थे।

वह कहता कि धीरसिंह डाकुओं से मिला हुआ है जी….। न जाने वह रात को अपने कमरे में क्या ठोका-पीटी करता रहता है? न जाने कौन-कौन लोग उससे मिलने आते रहते हैं, जिनके साथ वह जाता है… लेकिन कोई भी उसकी बातों का यकीन नहीं करता था।

एक बार डी०आई०जी० दौरे के लिए आए हुए थे। वह चुगलखोर सिपाही भी वहीं था। उनके स्वागत की जिम्मेदारी उसे सौंपी गई। उसने डी०आई०जी० साहब की बड़ी देखभाल की, और बातों-बातों में धीरसिंह के बारे में उल्टा-सीधा बातें करने लगा।

डी०आई०जी० साहब ने जब कोतवाल से पूछा, कोतवाल ने उस चुगलखोर सिपाही को डांटा तो उसने यही कहा- ” हुजूर, मैं आपको खुद दिखा सकता हूं, अगर मेरी बात गलत निकले तो मुझे गोली से उड़वा देना लेकिन आपको रात के एक बजे उठना होगा।” डी०आई०जी० और कोतवाल दोनों राजी हो गए।

रात के साढ़े बारह बजे धीरसिंह के कमरे में फिर वहीं ठोका-पीटी की आवाजें आने लगीं। चुगलखोर सिपाही भागा-भागा डी०आई०जी० और कोतवाल के पास आया और अदब से उन्हें चलने को कहा। डी०आई०जी० साहब कोतवाल से कुछ जरूरी बातें कर रहे थे। अगले दिन उन्हें सुबह ही बंगले पर जाकर बड़े अफसर से मिलना था।

दोनों अफसर चुगलखोर सिपाही के साथ चल दिये। जाकर धीरसिंह के कमरे के पास जाकर कान लगाकर सुना। वहां खट-खट की आवाज आ रही थी। कमरे के अन्दर हल्की-सी रोशनी थी। दरवाजा खटखटाया गया तो धीरसिंह घबरा गया।

दरवाजे को खोलते ही उसे पसीना आ गया क्योंकि दो अफसरों के साथ वह चुगलखोर सिपाही भी था। हल्की रोशनी में सभी ने देखा कि आदमकद शीशा टंगा हुआ है और सिपाही धीरसिंह इंस्पेक्टर की वर्दी पहने खड़ा है।

यह सब देखकर डी०आई०जी० साहब को बहुत गुस्सा आया। वह गुस्से में बोले- “डाकू कहीं का!”

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धीरसिंह के मुंह से सिर्फ इतना ही निकला- “यत भावयसि तत भवसि।” कोतवाल ने चुगलखोर को हुक्म किया- “इस बदमाश को पकड़कर हमारे पास लाओ।”

वहां पहुंचकर बड़े धीरज के साथ उसने बताया- “हजूर, जिस समय मैं अपनी पढ़ाई पूरी करके निकला था तो मेरे गुरु ने मुझे यह मन्त्र दिया था ‘यत भावयसि तत भवसि’ और कहा था कि हमेशा तुम अपने जीवन में ईमानदार बने रहना। मेहनत से जी मत चुराना। ऐसा करने से तुम जो बनना चाहोगे वह बन जाओगे।”

“साहब, मैं तो इंस्पेक्टर बनना चाहता हूं। इसलिए मैं अपनी वर्दी पहनकर अकेले में अभ्यास करता रहता हूं। हर कमांड पर अपने अफसर को सलाम करता हूं। यह खट-खट की आवाज उसी की थी।”

“अगर आप चाहें तो मेरा पिछला रिकॉर्ड भी देख सकते हैं। अगर मैंने कोई गलत काम किया हो तो आप मुझे सजा दे सकते हैं।”

डी०आई०जी० साहब ने पूरी छानबीन की, उसक पिछला रिकार्ड देखा। और उन्हीं की सिफारिश पर एक महीने के अन्दर ही यह आदेश हो गया कि डी०आई०जी० साहब ने धीरसिंह सिपाही की उन्नति करके उसे हैडक्वार्टर पर तैनाती का आदेश भेजा है।

प्यारे बच्चों! इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति अपना काम मेहनत और ईमानदारी के साथ करता है, वह एक दिन जरूर कामयाब होता है। इसलिए तुम सब भी ईमानदारी और मेहनत से कार्य करना सीखो।

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