2022 की बेस्ट hindi story पढ़िये, कहानी की लिस्ट नीचे दी गई हैं।

Hindi Story : सच्चा धर्मात्मा

एक नगर में एक राजा रहता था उसके चार बेटे थे 1 दिन राजा ने उन सभी को बुलाकर कहां की जाओ किसी धर्मात्मा को खोज कर लाओ। जो सबसे बड़े धर्मात्मा को खोज कर मेरे पास लाएगा मैं उसे इस राज्य का राजा बना दूंगा।

कुछ दिन बाद राजा का बड़ा लड़का एक सेठ को लेकर राजा के सामने आया और राजा को बताया गियर सेट खूब दान पुण्य का काम करता है

राजा ने सेठ का स्वागत सत्कार किया। इसके बाद सेठ वहां से चला गया.

इसके कुछ दिन बाद राजा का दूसरा लड़का पेट दुबले पतले पंडित को लेकर आ गया। पंडित ने चारों धाम की पैदल यात्रा की थी। राजा ने पंडित जी को भी दक्षिणा देकर विदा कर दिया। पहले बेटे की तरह दूसरे बेटे को भी राजगद्दी नहीं थी। तीसरा लड़का एक साधु को लेकर राजा के पास आया। और आते ही साधु ने आसन लगाया और ध्यान करने में मन हो गया। वे बहुत बड़े तपस्वी थे। सप्ताह में एक बार ही खाते थे। राजा ने उनका भी यथोचित स्वागत सत्कार किया और उन्हें हिमालय की और वापस भेज दिया।

राजा ने तीसरे लड़के को भी राजगद्दी नहीं सौंपी

कुछ दिनों बाद चौथा लड़का अपने साथ एक देहाती लड़की को लेकर आया। उसने राजा से कहा- यह व्यक्ति कुत्ते का घाव धो रहे थे, इसलिए मैं इन्हें आपके पास लेकर आया हूं। आप स्वयं पूछ लीजिए की यह धर्मात्मा है या नहीं?

राजा ने देहाती लड़के से पूछा – तुम धर्म-कर्म करते हो?

देहाती ने कहा – “महाराज मैं तो अनपढ़ हूं धर्म कर्म क्या होता है? मैं नहीं जानता। कोई व्यक्ति अगर बीमार होता है तो मैं उसकी सेवा कर देता हूं। कोई मांगता है तो मैं उसे अनाज देता हूं।

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राजा ने उसकी बात सुनकर अपने चेहरे में प्रसन्नता के भाव लाते हुए अपने चौथे बेटी की तरह देखते हुए कहता है यह सच्चा धर्मात्मा है और सबसे बड़ा धर्म असहाय की मदद करना।”

राजा ने अपने चौथे बेटे को राज्य का राज पाठ सौंप दिया और उस व्यक्ति को लेकर असहाय लोगों की मदद करने के लिए राजभर में घूमने लगे।

Hindi Story – भगवान का भक्त

काशी से थोड़ी दूर एक नगर था, इस नगर का नाम भजनपुर था। यहां पर एक साधु निवास करते थे। उस साधु को विश्वास था कि वह जो कुछ भी करेगा प्रभु उसे अपना भक्त समझ कर माफ कर देंगे। एक दिन प्रातः काल वह गंगा स्नान करके एक धोबी के कपड़े धोने वाले पत्थर पर बैठ कर पूजा करने लगा। थोड़ी देर में धोबी कपड़े धोने के लिए आ गया। साधु को पूजा करते देख वह उसके उठने की प्रतीक्षा करने लगा। लेकिन जब काफी देर हो गई तो वह धोबी साधु के पास जाकर बोला – “महाराज आप हमारे पत्थर से उठ कर दूसरे जगह पूजा कर लीजिए ताकि हम कपड़े धो सके। मुझे देर हो रही है।” साधु ने धोबी की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। धोबी ने फिर अनुरोध किया, लेकिन साधू उठने की बजाय गुस्से में बोला -“मैं नहीं उठता, तू कहीं और जाकर कपड़े धोले।”

धोबी ने कहा -“मैं कहां जाऊंगा, आप कहे तो मैं पूजा के लिए आसन बिछा देता हूं।”

लेकिन साधु ने धोबी की बात को अनसुना कर दिया। लाचार धोबी ने साधु का हाथ पकड़कर पत्थर से उठा दिया। साधु को गुस्सा आ गया।

साधू ने क्रोध में कहा -“तुम नहीं जानते, मैं भगवान का भक्त हूं और अभी तुम्हें इसका मजा चखाता हूं।”

साधु ने पास पड़े हुए एक पत्थर को उठाया और धोबी को मार दिया। चोट लगने के बाद धोबी को भी गुस्सा आ गया और उसने साधु को पटक दिया। इसके बाद साधु और धोबी एक दूसरे से गुत्थमगुत्था हो गए।

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तभी साधु को भगवान की याद आई और भगवान से साधु ने बोला – “प्रभु मैं इतनी श्रद्धा भक्ति से आपकी आराधना करता हूं फिर भी आप मेरी मदद करने को नहीं आ रहे हैं।”

तभी साधु के कान में आवाज सुनाई पड़ी -“तुम्हारी बात तो ठीक है, हम तो अपने भक्तों की मदद के लिए हमेशा उनके साथ रहते हैं। लेकिन इस समय यह नहीं समझ पा रहे हैं कि तुम दोनों में मेरा भक्त कौन है? क्योंकि मेरा भक्त कभी क्रोध नहीं करता।”

यह सुनते ही साधु का अभिमान चकनाचूर हो गया और वह धोबी से क्षमा याचना करते हुए वहां से चला गया।

Hindi Story – क्रोध पर विजय

पुराने समय की बात है। किसी राज्य के राजा के पास एक सन्यासी आया। राजा ने उसका खूब स्वागत सत्कार किया और कुछ दिन ठहरने को कहा। राजा की बात मानकर सन्यासी रुक गया। अपने राजकाज से समय निकालकर राजा सन्यासी से धर्म संबंधी चर्चा किया करता था। उसने अपनी जिज्ञासा को उस सन्यासी के समक्ष रखें। सन्यासी ने सबका यथोचित उत्तर दिया।

कुछ दिन के बाद जब वह जाने लगा तो राजा बोला -“महाराज जाते-जाते आप कोई ऐसा संदेश देते जाइए, जो मेरे लिए काफी उपयोगी साबित हो।”

सन्यासी ने आशीर्वाद देते हुए कहा -“एक बात का अभ्यास करना कि किसी भी स्थिति में क्रोध ना आए और अगर आ भी जाए तो वह काम मत करना जो उस अवस्था में मन कहे।”

राजा ने सोचा कि यह तो बहुत महत्वपूर्ण संदेश नहीं है यह तो साधारण सी बात है। फिर भी उसने शिक्षा को गंभीरता से लिया। राजा के कोई पुत्र नहीं था। समस्या थी कि राजगद्दी पर राजा के बाद कौन बैठेगा, उस समय आमतौर पर पुत्रियों को सत्ता नहीं दी जाती थी। फिर भी चलन के विरुद्ध जाकर राजा ने अपनी बेटी को राजगद्दी सौपने का निश्चय किया। साथ ही उसने यह भी तय किया कि जब उसका विवाह होगा तो उसका पति ही राजा बन जाएगा। राजकुमारी ने शासन कार्य संभाल लिया और अब वह पुरुष वेश में रहने लगी। एक बार राजा कहीं गया हुआ था। जब वह लौटा तो उसने देखा महारानी एक पुरुष का आलिंगन किए हुए लेती हुई है। देखते ही राजा तिलमिला उठा और उसने तत्काल तलवार निकाल ली लेकिन उसी समय उसे मुनि का उपदेश याद आ गया कि क्रोध में जो मन कहे वह काम मत करना।

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उसकी इच्छा हो रही थी कि वह दोनों का वध कर दे पर उसने मन पर काबू किया और तलवार को म्यान में रख दिया। राजा आगे बढ़ा और पलंग के निकट गया। देखा कि पुरुष वेशधारी कोई और नहीं बल्कि उसकी अपनी ही पुत्री थी, जो कि अपनी मां के साथ सो रही थी।

राजा ग्लानि से भर उठा पर उसे इस बात का संतोष भी हुआ कि उसने क्रोध पर विजय पाने में सफलता पाई और आज एक बहुत बड़े नुकसान से वह बच गया।

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