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नेपोलियन तृतीय की विदेश नीति और पतन का कारण | napoleon tritiya ki videsh niti

napoleon tritiya ki videsh niti : लुई नेपोलियन, नेपोलियन महान् का भतीजा और लुई बोनापार्ट का पुत्र था। उसका जन्‍म 1808 ई. हुआ था। उसका युवाकाल स्विट्जरलैण्‍ड, इटली तथा इंग्लैण्‍ड में व्‍यतीत हुआ। 1831 ई. में वह इटली गया और वहाँ की क्रांतिकारी संस्‍था कार्बोनरी का सदस्‍य बन गया। 1839 ई. में उसने ‘Napoleonic Ideas’ नामक पुस्‍तक लिखी। इसके द्वारा उसने अपने चाचा नेपोलियन की महान्‍ नीतियों का प्रतिपादन किया। उसने नेपोलियन के नाम का लाभ उठाते हुए 1848 ई. को राष्‍ट्रपति पर की शपथ ग्रहण की। शीघ्र ही उसने देश की समस्त सत्‍ता का अपने हाथों में केन्द्रित करना शुरू कर दिया। 14 जनवरी 1852 को नये संविधान के अनुसार राष्‍ट्रपति का कार्यकाल 4 वर्ष के स्‍थान पर 10 वर्ष कर दिया गया। परन्‍तु वह इससे भी सन्‍त्‍ुाष्‍ट नही हुआ।

उसकी वास्‍तविक इच्‍छा सम्राट बनाने की थी। अत: वह धीरे-धीरे अपनी आकांक्षा की पूर्ति के लिये तैयारी करता रहा। 21 नवम्‍बर 1852 को फ्रांस की जनता ने साम्राज्‍य स्‍थ‍ापित  करने और लुई नेपोलियन का सम्राट घोषित करने के प्रश्‍न पर औप‍चारिक मतदान किया। 78 लाख मत सम्राट बनने के पक्ष में और केवल 2.5 लाख मत विपक्ष में दिये। इस प्रकार 2 सितम्‍बर 1852 को लुई नेपोलियन को विधिवत् सम्राट नेपोलियन तृतीय घोषित किया गया। उसने 22 वर्ष ( 1848 से 1870) तक शासन किया और इस काल में वह यूरोपीय राजनीति का एक प्रमुख नायक रहा।

नेपोलियन तृतीय की गृहनीति

गृहनीति निर्धारित करने के लिये उसने अपने पूर्वज नेपोलियन बोनापार्ट का अनुसरण किया। उसकी घरेलू नीति के आधारभूत सिद्धान्‍त थे- शांति, व्‍यवस्‍था, सरकार का भय लोकहित के कार्य राजप्रबंध की कुशलता आर्थिक खुशहाली तथा रोमन के कैथोलिक्‍स का स्‍नेह प्राप्‍त करना। इन उद्देश्‍यों की पूर्ति के लिये उसने कार्य किया।

उसकी घरेलू नीति को हम दो भागों मे बाँट सकते है-

1 निरंकुशता का काल (1852-60)

प्रथम काल, 1852-60 इस काल मे उसने अपनी शक्ति बढ़ाने कानून व्‍यवस्‍था एवं शांति बनाए रखने के लिये कई प्रतिक्रियावादी कदम उठाये जैसे-

  1. लेखन पत्र एवं प्रैस पर कडे प्रतिबंध लगाना। कोई समाचारपत्र उसके विरूद्ध नही लिख सकता था।
  2. पुलिस प्रबंध को मतबूत बनाना।
  3. यूनिवर्सिटियों पर कड़ा कण्‍ट्रोल रखना। इतिहास तथा दर्शन शास्‍त्र को प्रोफैसाशिप हटा दी गई।
  4. जनता के स्‍वतंत्रता सम्बंधी अधिकार कम कर दिये गये।
  5. 1858ई. के द्वारा सरकार किसी भी सन्‍देहयुक्‍त व्‍यक्ति को बिना मुकदमा चलाये कैद कर सकती थी या उसे देश निकाल दे सकती थी।
  6. उसके समय में संसद शक्तिहीन बना दी गई। वह अपने आप में कोई कानून पास नहीं कर सकती थी जब तक कि उसके लिये Council of State तरफ से सुझाव न आए। इसके अतिरिक्‍त संसद के चुनावों में सरकारी खर्चे पर चुनाव लडते थे। 1858 के एक कानून के अनुसार संसद के सदस्‍यों का सम्राट के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पडती थी।
  7. प्रान्‍तों के गवर्नर तथा उपगवर्नर तथा अन्‍य उच्‍चाधिकारियों की नियुक्तियों सम्राट स्‍वयं करता था।

इन सख्‍त कदमों के साथ-साथ आ‍र्थिक खुशहाली और लोकहित के लिये नेपोलियन ने कई ठोस कार्यक्रम अपनाये जैसे-

  1. रेलवे और सड़कों का जाल बिछाया जाना। बन्‍दरगाहों का विकास करना तार व्‍यवस्था को लागू करना।
  2. बैंकों का विकास करना तथा लोगों को उदारता से ऋण प्रदान करना।
  3. औद्योगिकरण और खेतीबाड़ी के विकास की ओर विशेष ध्‍यान देना।
  4. उद्योग धन्‍धों तथा व्‍यापार एवं उपनिवेशों को बढावा देना।
  5. वस्‍तुओ के भावों को कंट्रोल करना तथा बेरोजगारी को समाप्‍त करने के लिये प्रयत्‍नशील होना।
  6. अस्‍पतालों तथा अनाथालयों की स्‍थापना करना तथा गरीबों के लिये मुफ्त दवाइयों की व्‍यवस्‍था करना।
  7. नये भवनों तथा अन्‍य निर्माण कार्यो के द्वारा पेरिस की सुन्‍दरता को बढाना।
  8. 1855 ई. मे उसने शानदार प्रदर्शनी लगाई जो कि देश के औद्योगिक विकास की एक झलक प्रस्तुत करती थी।
  9. उसने कैथोलिक्स को शिक्षा पर पुन: कंट्रोल करने दिया और उनकी मदद की। जहाँ उसने अपनी इन नीतियों से जनता के अधिकारों पर कुठाराघात किया वहाँ उसने समूची जनता का मन मोह लिया कैथोलिक्‍स को अपने पक्ष में कर लिया तथा राजतंत्रवादी भी उसके नजदीक आ गये। जनता पर उसकी पकड़ मजबूत होने लगी।
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2. उदारता का काल (1860-70)

दूसरा काल 1860-70- उदारवादी लोगों की सहानुभूति प्राप्‍त करने के लिये इस काल में उसने कई उदारवादी पग उठाये जैसे-

  1. संसद तथा सीनेट के अधिकार बढ़ा दिये गये। अब मंत्रियों के कामों की संसद मे आलोचना की जा सकती थी।
  2. भाषण की स्‍वतंत्रता प्रदान की गई।
  3. संसद में होने वाली कार्यवाही के प्रकाशन की आज्ञा दे दी गई ताकि लोगों को पता चल सके कि उनकी संसद में उनके प्रतिनिधि क्‍या करतें हैं।
  4. दण्डित गणतंत्रवादियों को माफ कर दिया गया। कई राजनीतिज्ञ विदेशी से स्वदेश लौट आये।

परन्‍तु इन सभी उदारवादी कार्यवाहियों के बावजूद नेपोलियन का विरोध बढ़ रहा था। इसका मुख्‍य कारण विदेश नीति में उसकी असफलता थी। हाँ इतना अवश्‍य है कि उसके काल मे देश ने आर्थिक तौर पर काफी उन्‍नति की लोगों को शांति और व्‍यवस्‍था प्राप्‍त हुई। यदि वह अपनी विदेश नीति मे असफल न हुआ होता तो शायद फ्रांस के महान्‍ शासकों में गिना जाता।

नेपोलियन तृतीय की विदेश नीति | napoleon tritiya ki videsh niti

नेपोलियन तृतीय एक ओर शांति की नीति का समर्थक था और कहा करना था कि साम्राज्‍य का अर्थ है शांति तो दूसरी ओर वह गौरवपूर्ण एवं सशक्‍त नीति भी अपनाया चाहता था। उसने ब्रिटिश राजदूत के समक्ष कहा था। मै अच्‍छी तरह जानता हूँ कि फ्रांस की आन्‍तरिक प्रवृत्तियाँ सैनिक एवं प्राधान्‍य प्रिय है और मैं उनको  सन्‍तुष्‍ट करने का निश्‍चय कर चुका हूँ। उसकी विदेश नीति के अग्र उद्देश्‍य थे-

  1. फ्रांस के गौरव में वृद्धि करना।
  2. यूरोप की राजनीति मे फ्रांस को प्रतिष्ठित स्‍थान दिलाना।
  3. राष्‍ट्रवाद का समर्थन।
  4. कैथोलिक्स को सन्‍तुष्‍ठ करना।
  5. उपनिवेशों को बढावा देना तथा फ्रांस की राज्‍य सीमाओं का विस्‍तार।
  6. वह 1815 की वीएना की अपमानजनक संधि को तोडना चाहता था।
  7. इंगलैण्‍ड से मित्रता तथा रूस से शत्रुता रखना।
  8. नेपोलियन तथा क्रीमिया का युद्ध- वह तुर्क साम्राज्‍य की ईसाई प्रज के संरक्षण के मामले पर रूस से उलझ गया। वह उन पर अपना अधिकार जताता था जबकि रूस का संरक्षक होने के नाते वहाँ की ईसाई प्रजा पर अपना अधिकार समझता था। नेपोलियन ने यह मामला अपनी कैथोलिक्‍स जनता को खुश करने के लिये उठाया था। वह रूस के जार से इस लिये भी लड़ता था कि उसने उसे सम्राट स्‍वीकार करने में आनाकानी की थी। युद्ध में विजय प्राप्‍त करके वह अपने व्‍यक्तिगत गौरव को भी बढाना चाहता था। उधर इग्लैण्‍ड भी तुर्क साम्राज्‍य में रूस के बढ़ते हुए प्रभाव के विरूद्ध था। अत: फ्रांस तथा इंग्‍लैण्‍ड ने मिलकर रूस के‍ खिलाफ क्रीमिया का युद्ध छेड दिया जिसमें उनकों विजय प्राप्‍त हुई। हालांकि यह विजय बड़ी महंगी पड़ी। अपार धन-जन की हानि हुई परन्‍त्‍ुा फिर भी विजय ने नेपोलियन की कीर्ति को बढा दिया। पेरिस मे होने वाले शांति सम्‍मेलन से उसकी व्‍यक्तिगत प्रसिद्धि हुई। यहाँ उसने इटली के राष्‍ट्रवाद पर सहानुभूति प्रदर्शित की।
  9. 1858 ई. में नेपोलियन के समर्थन के कारण ही Moldavia तथा Wallachia का रूमानिया के रूप में एकीकरण हुआ।

नेपोलियन तथा इटली

नेपोलियन के पूर्वज इटली के रहने वाले थे। वह स्‍वयं Corbonari  का सदस्‍य रह चुका था। अत: इटली की एकता के प्रति वह शुरू से ही सहानुभूति रखता था। पेरिस के शांति सम्‍मेलन 1856 के कावूर ने इटली के प्रश्‍न पर फ्रांस तथा इंग्‍लैण्‍ड की सहानुभूति प्राप्‍त कर ली थी। इटली के मदद करने से नेपोलियन को Territorial Gain भी हो सकता था। अत: 1858 ई. में उसने पीडमांट के प्रधानमंत्री कावूर से Plombiers  के स्‍थान पर एक गुप्‍त संधि कर ली जिसके अनुसार फ्रांस ने आस्ट्रिया इटली युद्ध में 2,00,000 सैनिकों से पीडमांट की आस्ट्रिया के विरूद्ध मदद करनी थी। पोप के अधीन इटली का संघ बनना था और पाडमांट का लम्‍बार्डी, वीनीशिया, पारमा, मोडेना तथा पोप के राज्‍यों का कुछ भाग मिलना था और फ्रांस को नीस तथा सेवाय प्राप्‍त होने थे। इस समझौते के अन्‍तर्गत Austro Sardinian War 1859 में हुई। आस्ट्रिया लम्‍बार्डी से पीछे हट गया। उसकी हार होने लगी परन्‍त्‍ुा युद्ध के बीच मे ही अपने मित्र को विश्‍व में लिये बिना नेपोलियन ने Villafranca  के स्‍थान पर आस्ट्रिया के शासक के शांति कर ली। शायद वह सार्डीनिया की शक्ति के बढ जाने से आशांकित हो गया था। बाद में सार्डीनिया के शासक Victor Emmanuel II को भी Treaty of Zurich के द्वारा इस शांति संधि को मानना पडा। उसे  Lombardy प्राप्‍त हो गया। बाद मे नेपोलियन को भी सार्डीनिया ने Nice and Savoy  दे दिये। इस उपलब्धि से भी नेपोलियन की गौरव में वृद्धि हुई परन्‍तु साथ ही इटैलियनज से Austro-Sardinian War में विश्‍व‍ासघात करने के कारण क्रांतिकारी उसके विरूद्ध हो गये।

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सीरिया का प्रश्‍न

1860 ई. में एक अभियान भेजकर नेपोलियन से सीरिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहा। लेबनान में एक Christian Governor नियुक्‍त किया गया।

मैक्सिकों अभियान

रोमन कैथोलिक्‍स लोगों को खुश करने नवीन संसार में अपने उपनिवेशों का विस्‍तार करने गौरवपूर्ण विदेश नीति के द्वारा आंतरिक मामलों से लोगों का ध्‍यान हटानें के लिये नेपोलियन ने मैक्सिकों को अभियान भेजा। वहाँ का राष्‍ट्रपति कैथोलिक्‍स पर अत्‍याचार कर रहा था। वहाँ की सरकार ने इंग्‍लैण्‍ड स्‍पेन तथा फ्रांस के लिये गये ऋणों की अदायगी बंद कर दी थी। वहाँ की सरकार लोगों के साथ दुर्व्‍यवहार किया जाता था। 1861 ई. की लन्‍दन की संधि के द्वारा स्‍पेन इंग्‍लैण्‍ड तथा फ्रांस ने मिलकर मैक्सिकों पर हमला करने की योजना बनाई परन्‍तु नेपोलियन जोरेज की गणतंत्रवादी सरकार से बात न करना चाहता था। स्‍पेन तथा इंग्लैण्‍ड तो जोरेज की बातचीत से सन्‍तुष्‍ट हो गये पर फ्रांस असन्‍तुष्‍ट रहा। उसने अकेले ही मई 1862 ई. में सेना भेजने का निर्णय कर लिया। वह जोरेज के विरूद्ध Maxmilian (brother of Emperoro Francis Joseph of Austria) के राजा बनाने का पक्षपाती था। 1864 में उसे फ्रांसीसी सेना की मदद से राजा घोषित कर दिया गया परन्‍तु वहाँ की जनता तथा गोरिलाओं ने इसका विरोध किया। उधर अमेरिका का गृहयुद्ध भी समाप्‍त हो चुका था। अत: उसने Munoroe Doctrine के अन्‍तर्गत अमेरिका का महाद्वीप में यूरोपियन का दखलअंदाजी का कडा विरोध किया। अन्‍त में निराश होकर नेपोलियन को फ्रांसीसी सेना वापिस बुलानी पडी। Maxmilian का वध कर दिया गया तथा पुन: जोरेज मैक्सिकों का राष्‍ट्रपति बना। इस अभियान में असफलता के कारण नेपोलियन की प्रसिद्धि को बडा धक्‍का लगा। इससे फ्रांस का काफी आर्थिक नुकसान हुआ।

पोलैण्‍ड का विद्रोह

रूस के जार के विरूद्ध विद्रोह करने की हालत में नेपोलियन ने पोलिश लोगों को हर सम्‍भव सहायता का वचन दिया था परन्‍त्‍ुा विद्रोह के समय केवल रूस के विरूद्ध एक प्रोटेस्‍टैंट करने के अ‍तिरिक्‍त नेपोलियन ने कुछ न किया। परिणामस्‍वरूप पोलिश विद्रोह बुरी तरह कुचल दिया गया। विद्रोहियों को सख्‍त सजाएँ दी गई। उन पर रूसी भाषा रूसी अफसर तथा रूसी प्रशासन लागू कर दिया गया। नेपोलियन की पोलैण्‍ड के प्रति नीति का भी फ्रांस के क्रांतिकारियों ने कडा विरोध किया। इस मौके पर बिस्‍मार्क ने रूस के प्रति सहानुभूति दिखलाकर उससे मित्रता गांठ ली जो बाद में उसे काफी लाभदायक सिद्ध हुई।

आस्ट्रिया प्रशा युद्ध

शैलिसविग तथा होलस्‍टीन की डचियों के मामले पर प्रशा तथा आस्ट्रिया में विरोध चल रहा था। बिस्‍मार्क जर्मनी की एकता के लिये आस्ट्रिया को उसके मामलों से हटाना जरूरी समझता था अत: यह युद्ध अनिवार्य हो गया था परन्‍तु इससे पूर्व उसने रूस तथा फ्रांस से मित्रता गांठ कर आस्ट्रिया को अकेला तथा नि:सहाय बना दिया था। Biarritz के स्‍थान पर 1865 ई. में नेपोलियन से मुलाकात करके बिस्‍मार्क ने उसे कुछ जर्मन इल केया बेल्जियम देने का झांसा देकर अपनी ओर कर लिया था। नेपोलियन सोचता था कि युद्ध के मध्‍य आस्ट्रिया तथा प्रशा दोनों उसकी ओर हाथ फैलाएँगे और वह Arbiter of Europe बन जायेगा परन्‍तु शीघ्र ही आस्ट्रिया को हराकर बिस्‍मार्क ने नेपोलियन को विस्मित कर दिया वह छटपटा उठा। दियरज ने इस पर लिखा, ‘It Was not Austrial that was defeated at Sadowa but France’ इससे नेपोलियन की लो‍कप्रियता को देश में बहुत धक्‍का लगा।

फ्रांस प्रशा युद्ध

नेपोलियन आस्ट्रिया प्रशा युद्ध में हुई अपनी कूटनीतिक हार का बदला लेना चाहता था। उधर बिस्‍मार्क दक्षिणी जर्मन रियासतों को नेपोलियन के विरूद्ध भड़काना चाहता था। इसके बिना दक्षिण जर्मनी सम्‍भावित जर्मनी में नहीं मिल सकता था। फ्रांस से युद्ध अनिवार्य हो गया था। Biarritz के समझौते का प्रचालित करके यूरोप में बिस्‍मार्क ने नेपोलियन की छवि धूमिल कर दी थी। दोनों देशों के समाचार पत्र परस्‍पर विरोधी प्रचार कर रहे थे। स्‍पेन की गद्दी पर जर्मन शासक के सम्‍बंधी को बैठाये जाने के प्रश्‍न पर आपसी विरोध ने 1870 ई. में युद्ध का रूप धारण कर लिया। इस युद्ध में फ्रांस की बडी बुरी तरह से पराजय हुई और उसके साथ ही नेपोलियन का पतन हो गया। उसने जर्मन सेना के आगे 86,000 सैनिकों सहित समर्पण कर दिया तथा फ्रांस में तृतीय गणतंत्र की स्‍थापना हुई थी।

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नेपोलियन तृतीय के पतन के कारण | Napoleon tritiya ke patan ka karan

नेपोलियन तृतीय की असफलता या पतन के प्रमुख कारण निम्‍नलिखित हैं-

  1. व्‍यक्तिगत गुणों का अभाव– यद्यपि लुई नेपोलियन ने अपने चाचा नेपोलियन महान के नाम का पूर्ण लाभ उठाया, उसमें नेपोलियन बोनापार्ट जैसी महत्‍वाकांक्षा भी थी लेकिन उसमे नेपोलियन जैसे गुण नहीं थे। यही कारण था कि वह जनता में अधिक समय लोकप्रिय नही रह सका।
  2. कूटनीतिज्ञता का अभाव– नेपोलियन तृतीय में कैबूर और बिस्‍मार्क जैसी कूटनीतिज्ञता भी नही थी। उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में शासक में कूटनीतिज्ञता का होना आवश्‍यक था।
  3. वैदेशिक क्षेत्र में गौरव व प्रतिष्‍ठा अर्जित न करना– लुई नेपोलियन की अस्थिर विदेश नीति ने भी उसे बदनाम किया। वास्‍तव में वह किसी भी योजना को गहरी सूझबूझ से नहीं बना पाता था। मैक्सिकों और इटली की घटनाएँ नेपोलियन तृतीय की अस्थिरता का स्‍पष्‍ट उदाहरण है। इन घटनाओं के कारण देश और विदेश दोनों में वह बदनाम हुआ।
  4. आन्‍तरिक क्षेत्र में असन्‍तोष- आन्‍तरिक क्षेत्र में भी वह फ्रांस के विभिन्‍न वर्गो को प्रसन्‍न नही कर पाया। फ्रांस में अनेक वर्गो ने नेपोलियन तृतीय की नीतियों का विरोध किया। निरंकुशता स्‍थापित करने के उसके कदम उदारवादियों व गणतंत्रवादियों को पसन्‍द नहीं आयें। समय-समय पर विरोधियों के दबाव के कारण उसे कुछ सुविधाएँ भी प्रदान करनी पडी।

नेपोलियन तृतीय का मूल्‍यांकन

नेपोलियन तृतीय में विभिन्‍न विरोधी तत्‍वों का मिश्रण था। इतिहासकारों ने उसके चरित्र व क्रियाकलापों के विषय में विभिन्‍न धारणाएँ प्रकट की हैं। हेज ने लिखा हैं, ‘वह पक्‍का राष्‍ट्रवादी था। देशभक्ति और अपने नाम के कारण ही वह फ्रांसीसी जनता को अपनी ओर आकृष्‍ट करने में सफल रहा। अपनी लोकप्रियता के कारण ही वह फ्रांस का राष्‍ट्रपति और सम्राट बना’। महारानी विक्‍टोरिया ने नेपोलियन तृतीय के विषय में कहा है, ‘नेपोलियन तृतीय को उसमें निहित दया के गुणों के बिना ठीक प्रकार से नहीं जाना जा सकता। उसमें अद्भूत आत्‍मसंयम एवं अद्भुत सज्‍जनता विद्यमान थी’।

दूसरी ओर, लिप्‍सन ने नेपोलियन तृतीय के दोषों को उल्‍लेख करते हुए कहा है, ‘यद्यपि वह अनेक गुणों का धनी था, परन्‍तु अस्थि‍ता तथा कायरता ने उसे कूटनीति के जाल में फंसा दिया। वह कमीना तथा धोखेबाज लगने लगा। सपने सजाने में वह किसी से कम नहीं था परन्‍तु उन्‍हें कार्यरूप कभी नहीं दे पाता था। वह दूसरों की भावनाएँ उभार तो देता था, परन्‍तु उन्‍हें सन्‍तुष्‍ट करने का उसमें साहस नहीं था। जिस क्षण उसका पतन हुआ तों उस समय यूरोप में कोई भी हाथ उसके पक्ष में नही उठा।

हेजन ने नेपोलियन तृतीय कासही मूल्‍यांकन करते हुए लिखा है, ‘यदि नेपोलियन अपनी सारी शक्ति देश के आन्‍तरिक सुधार व विकास में लगा देता है और अपने कार्य-कलाप को वही तक सीमित रखता तो उसका शासन आगे भी चलता रहता है और सफल तथा लाभदायक सिद्ध होता किन्‍तु उसने दिखावटी तथा जोखिम भरी विदेश नीति का अनुसरण किया जिसके परिणामों को वह पहले सेनही देख पाया था। उसके कारण भी वह भारी उलझनों में फंस गया और फिर उन्‍ही के कारण उसके साम्राज्‍य का दु:खद अन्‍त हुआ।

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