कहानी – (Vikramaditya aur apsara)

प्रजापालक विक्रमादित्य  को सदैव अपनी प्रजा के सुख-दुःख का ध्यान रहता था। कौन क्या कर रहा है और किसे क्या दुःख है, इन बातों का पता लगाने के लिये वे यदा-कदा भेष बदलकर निकल जाते। ऐसे ही वे एक रात बाजार की गलियों में घूम रहे थे। आधी रात का समय था। चारों ओर अंधकार और गहरा सन्नाटा था। गलियों का चक्कर लगाते-लगाते वे एक मकान के सामने आए। लैम्प का टिमटिमाता प्रकाश बरामदे से बाहर आ रहा था। बरामदे में एक बुढ़िया बैठी थी। वह कभी चरखा चलाती तो कभी हुक्का पीती। कभी हंसती, कभी रोती तो कभी नाचने लगती। विक्रमादित्य  को उसकी ये अजीब हरकतें देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। आखिर वह उसके पास जाकर इस स्थिति का कारण पूछ ही बैठे। बुढ़िया बोली- ‘मुसाफिर तुम अपने रास्ते से चले जाओ। मुझे पूछकर क्या लोगे?’

विक्रमादित्य  कहने लगे- ‘नहीं मां तुम निधड़क होकर मुझे बताओ। मैं तुम्हारे दुःख को अवश्य दूर करूंगा।’ बुढ़िया बोली- मुसाफिर, अगर मेरे दुःख को कोई दूर कर सकता है तो वह सिर्फ राजा विक्रमादित्य  ही है। इसके अतिरिक्त और किसी के अन्दर इतनी सामर्थ्य नहीं ।” विक्रमादित्य  बोले- ‘मैं ही राजा विक्रमादित्य  हूं, तुम बताओ तो सही।’

बुढ़िया बोली- ‘तुम्हें एक शर्त माननी होगी। अगर छः मास के अन्दर तुमने मेरे कार्य को पूर्ण नहीं किया तो छः मास समाप्त होते ही तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।”

“इसमें कोई सन्देह नहीं ” – विक्रमादित्य  ने सहर्ष शर्त स्वीकार कर ली।

बुढ़िया बोली- ‘मेरा नौजवान बेटा और बहू अन्दर के कमरे में सोए थे। एक दिन जब मैं प्रातः उनको उठाने गई तो देखा कि दोनों ही गायब हैं। उनके बिस्तरों पर सिर्फ बड़े-बड़े पत्थर लेटे थे। यह रहस्य आज तक मेरी समझ में नहीं आया और तब से मेरा दिमाग सही काम नहीं कर रहा है। मेरी हालत पागलों जैसी है। अतः तुम छः मास के अन्दर मेरी बहू और पुत्र को अपनी प्रतिज्ञा अनुसार वापस ले आओ। अन्यथा छः महीने होते ही तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।’

राजा ने बुढ़िया से विदाई ली और उसी रात राजधानी का परित्याग कर बुढ़िया के बहू-बेटे की खोज में निकल पड़ा। घूमते-घूमते कई दिन व्यतीत हो गए। भूखे-प्यासे भ्रमण करते-करते उन्होंने दुनिया का कोना-कोना छान डाला लेकिन कहीं भी उनका पता न चला।

एक रात वे एक नदी के किनारे पहुंचे। थकावट के कारण सारा शरीर चूर-चूर हो रहा था। अतः नदी के तट पर लेट गए। नदी के किनारे की शीतल वायु के लगते ही उनको नींद ने आ घेरा। लेकिन चिंता के कारण नींद भी कितनी देर रहती। रात के बारह – एक बजे के करीब उनकी नींद टूट गई। सोचने लगे ‘पांच महीने तो समाप्त हो गए लेकिन मैं अभी तक अपना वचन पूरा नहीं कर सका। छठा महीना समाप्त होते ही मेरी मृत्यु निश्चित है। अतः इससे तो अच्छा है मैं स्वयं ही नदी में छलांग लगाकर अपनी जान दे दूं।” ऐसा विचार आते ही विक्रमादित्य  नदी की ओर चल पड़े। ज्यों ही वे छलांग लगाने लगे त्यों ही उन्हें अंधेरे में कपड़े धोने की आवाज़ सुनाई दी। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ कि इतनी रात बीते कौन कपड़े धो रहा है। चलकर वहीं पहुंच गए। धोबी से पूछा- ‘अरे भाई! तुम्हें आधी रात के वक्त कपड़े धोने की क्या आवश्यकता पड़ गई ?’ धोबी बोला- ‘महाराज क्या करूं? हमारे यहां अनारकली नाम की लड़की है जिसने आज तक सूर्य का मुख नहीं देखा, दूसरों को तो देखना ही कहां। उसके जितने भी काम होते हैं वे रात को ही किये जाते हैं। यहां तक कि उसके कपड़े भी रात को ही धोकर सुखाने पड़ते हैं।”

राजा को यह सुनकर और भी हैरानी हुई। वापस आकर अपने स्थान पर लेट गए और बड़ी देर तक सोचते रहे लेकिन यह गुत्थी सुलझी नहीं। वे सोचने लगे- “एक तो मैं ऐसे ही दुःखी हूं फिर इस झंझट में पड़ने से क्या लाभ? अतः अब तो मुझे डूब कर ही छुटकारा ले लेना चाहिये।” वह फिर चल पड़े। जैसे ही डूबने के लिए तैयार हुए, उनके नाक में धूप की बड़ी मीठी-मीठी सुगन्ध आई और साथ ही निकट से शंख ध्वनि भी सुनाई दी। विक्रमादित्य  सोचने लगे- “दो दफा रुकावट पड़ गई । इसका मतलब यह हुआ कि अभी मेरी मृत्यु ही नहीं। प्रातः हो रही है शायद कोई साधु महात्मा भगवान की पूजा कर रहा है। चलो उन्हीं के दर्शन करूं।”

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चलकर महात्मा जी की कुटिया में पहुंच गए। महात्मा जी के चरणों में प्रणाम किया और एक तरफ बैठ गए। महात्मा जी उन्हें देखकर बोले- “पथिक! लगता है तुम इस समय बहुत दुःखी हो लेकिन तुम्हारे मुखमण्डल के तेज से ऐसा आभास हो रहा है कि तुम किसी उच्च वंश से सम्बन्ध रखते हो।”

विक्रमादित्य  बोले- ‘महात्मन्! मैं राजा विक्रमादित्य  हूं। संकट में होने के कारण नदी में डूबकर मरना चाहता था। इतने में शंख ध्वनि सुनाई दी। अतः मरने से पहले आपके दर्शनों के लिये आ गया। महात्मा बोले- ‘धन्य हो राजा विक्रमादित्य  आज तक तो आपका नाम ही सुना था लेकिन आज तो आप यहां स्वयं पधारे हैं। कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूं।’

विक्रमादित्य  ने बुढ़िया के बहू-बेटे और साथ ही धोबी की लड़की के कपड़े रात को धोने की बात कह दी। महात्मा जी थोड़ी देर सोचने के बाद बोले- ‘तुम पहला काम यह करो कि किसी तरह से धोबी की लड़की के साथ शादी कर लो। फिर दो-चार दिन वहां ठहरकर और हाल-चाल देख मेरे पास आ जाना। तब मैं तुम्हें सारी बातें बताऊंगा।’

दूसरे दिन विक्रमादित्य  सज-धजकर धोबी के घर गए और उसकी लड़की से शादी करने की इच्छा प्रकट की। धोबी उस सुन्दर व्यक्ति को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसी दिन विक्रमादित्य  से अपनी लड़की की शादी कर दी। विक्रमादित्य  अब वहीं रहने लगे। लेकिन धोबी की लड़की ने न तो उन्हें अपना मुंह ही दिखाया और न ही कोई बात की। जो भी बात होती वह नौकरानी के माध्यम से ही होती। उसके कार्य रात को ही होते और दिन को सोई रहती।

कुछ दिन वहां रहने के पश्चात् विक्रमादित्य  फिर महात्मा जी के पास गए। महात्मा जी से सारा वृत्तान्त कहा। महात्मा जी बोले, ‘अब अपना काम बना ही समझिये। वास्तव में धोबी की लड़की अनारकली इन्द्र राजा की परी है। वह रात को जाकर इन्द्र की सभा में नृत्य करती है। बुढ़िया की बहू और बेटा भी वहीं रसोइए का काम करते हैं। मैं तुम्हें तीन दिन के लिये तीन गोलियां दूंगा। एक-एक गोली प्रतिदिन रात को मुंह में डाल लेना। उनके प्रभाव से रात को तुम्हें कोई भी नहीं देख सकेगा। बस फिर रात को उसी के पीछे-पीछे चले जाया करना। वहां अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त करना तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है। इतना कहकर महात्मा जी ने तीन गोलियां विक्रमादित्य  को दे दी।

विक्रमादित्य  गोलियां लेकर धोबी के घर वापस आ गया। रात को विक्रमादित्य … बहाना बनाकर शीघ्र ही सो गया। थोड़ी देर बाद गोली को मुंह में रखा और दरवाज़ा बन्द करके बाहर निकल गए। उधर अनारकली भी इन्द्र राजा की सभा में जाने के लिये तैयारी हो रही थी। राजा विक्रमादित्य  ने चुपके से उसके नहाने के पानी में ठण्डा पानी मिला दिया और वैसे ही उसके शृंगार के कमरे में भी सामान इधर-उधर कर दिया । अनारकली को बड़ी हैरानी हुई, वह नौकरानी पर बिगड़ रही थी। लेकिन यह तो राजा की करतूत थी जिसे गोली के प्रभाव से कोई नहीं देख सकता था। किसी तरह वह जलती भुनती तैयार हुई और इन्द्र सभा के लिये चल पड़ी।

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विक्रमादित्य  भी पीछे-पीछे चल पड़े। आगे चलकर एक वृक्ष के साथ मालती के सफेद फूल खिले हुए थे। अनारकली ने खड़े होकर आवाज़ लगाई। बहिन मालती जल्दी चलो। आज देर हो रही है। बहिन की आवाज़ सुनकर मालती भी सज-धजकर बाहर आ गई। आगे चलकर एक पीपल का वृक्ष आया जिसकी दो बड़ी शाखाएं आकाश को छू रही थीं। दोनों वृक्ष पर चढ़कर एक-एक टहनी पर बैठ गईं। विक्रमादित्य  भी उनके साथ टहनियों के बीच में बैठ गए। इतने में परियां बोली–‘चल रे पीपल के पेड़, हमें शीघ्र ही इन्द्र राजा की सभा में पहुंचा। इतना कहना ही था कि पीपल का पेड़ उड़ने लगा और शीघ्र ही इन्द्र की सभा में पहुंच गया। दोनों परियों का इन्तज़ार हो रहा था। उतर कर नृत्य मण्डप में जा खड़ी हुईं।’

विक्रमादित्य  भी ढोलक बजाने वाले के पास जाकर बैठ गए। उस समय उन्होंने गोली मुंह से निकालकर जेब में डाल ली। सभा भवन में लगे हीरे-मोतियों की चमक आंखों में चकाचौंध उत्पन्न कर रही थी। चारों ओर सुवासित पुष्पों की सुगन्ध से वातावरण महक रहा था। चन्द्रमा की शीतल चन्द्रिका अपनी ज्योति से सभा भवन की सुन्दरता को निखार रही थी। इन्द्र पत्नी सहित सिंहासन पर आरूढ़ हुए। देवताओं ने जय-जयकार की ।

बाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनि और ढोलक पर पड़ी थाप के साथ नृत्य आरम्भ हुआ। लेकिन ढोलक वाला कुछ सुस्त था, नृत्य में गति नहीं आ रही थी। विक्रमादित्य  अपने को रोक न सके। उन्होंने उससे ढोलक मांगी। ढोलक वाला भी रोज़ ढोलक बजा-बजाकर तंग आ चुका था। अतः उसने खुशी-खुशी ढोलक थमा दी। बस फिर क्या था ।

विक्रमादित्य  के ढोलक पर हाथ पड़ते ही नृत्य सभा में मादकता आ गई। सभी मस्ती से झूमने लगे। परियों ने उस दिन ऐसा नृत्य किया जैसा कभी नहीं हुआ था। चारों ओर वाह वाह हो रही थी। नृत्य समाप्त हुआ। इन्द्र ने प्रसन्नता से गले का नौलखा हार उतारकर परियों को दिया। परियों ने वही हार ढोलक वाले को दे दिया। क्योंकि वह भी कई बार ऐसे पुरस्कार ले चुका था, अतः उसने भी वह हार विक्रमादित्य  को दे दिया। विक्रमादित्य  ने हार लेकर चुपके से जेब में डाल लिया। इन्द्र की सभा विसर्जित हुई। परियां वापस चलीं। विक्रमादित्य  ने भी गोली मुंह में रखी और अदृश्य होकर पीछे हो लिया ।

उसी पीपल के वृक्ष पर बैठकर उसी स्थान पर आ गए जहां से चले थे। अब विक्रमादित्य  परियों से आगे आकर अपने कमरे में सो गए। प्रातः हो गई लेकिन आज वह नित्य की भांति नहीं उठे। अब तक विक्रमादित्य  जाग तो चुके थे लेकिन सोच-विचार कर रहे थे। नौकरानी ने आवाज़ लगाई लेकिन वे उठे नहीं। उसने फिर झकझोरते हुए कहा- “महाराज! उठिये, सुबह हो गई है।” विक्रमादित्य  आंखें मलते हुए कहने लगे- ‘ओह! तुमने तो बहुत अनर्थ कर दिया। मैं आज एक बहुत ही सुन्दर सपना देख रहा था। पास खड़ी अनारकली ने नौकरानी को इशारे से स्वप्न के बारे में पूछने के लिये कहा।

नौकरानी बोली- ‘महाराज कैसा स्वप्न था ?’ विक्रमादित्य  बोले- ‘ऐसा लगता है जैसे मैं आज इन्द्र राजा की नृत्य सभा में गया था। वहां मैंने बहुत सुन्दर ढोलक बाजाई । इन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और इनाम में मुझे नौलखा हार मिला। मैंने उसे लाकर अभी-अभी सामने वाली अलमारी में रखा है। जरा तुम जाकर देखो तो सही। नौकरानी को आज्ञा माननी पड़ी। उसने अलमारी खोली। सचमुच ही वहां हार चमक रहा था। अनारकली के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

दिन व्यतीत हुआ, शाम आई। आज रात को फिर विक्रमादित्य  ने इन्द्र की सभा में प्रवेश कर पिछले दिन से भी अधिक सुन्दर ढोलक बजाई। इन्द्र ने परियों को सोने की थाली में बत्तीस व्यंजन, जो छत्तीस प्रकार से बने थे, पुरस्कार के रूप में दिये । परियों ने यह सोचते हुए कि सारा कमाल तो ढोलक वाले का है उसी को थाली दे दी। उसने भी वह थाली विक्रमादित्य  को सम्भाल दी।

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विक्रमादित्य  पिछले दिन की तरह शीघ्र ही आकर अपने बिस्तर में सो गए। प्रातः भी काफी देर तक सोए रहे। आज फिर जब नौकरानी ने उन्हें उठाया तो वह बोले- अरी मूर्ख! आज तो तूने मेरा सारा कार्य ही बिगाड़ कर रख दिया। आज तो मुझे कल से भी अधिक सुन्दर स्वप्न दिखाई दे रहा था। आज मैंने इन्द्र की सभा में कल से भी अधिक सुन्दर ढोलक बजाई। इस पर उन्होंने प्रसन्न होकर सोने की थाली में बत्तीस व्यंजन जो छत्तीस प्रकार से बने थे, भेंट में दिये। मैं उस थाली को लाकर अलमारी में रख ही रहा था कि तूने मुझे जगा दिया। जाओ देखो, वहां है या नहीं ।

सचमुच वहां थाली व्यंजनों से भरी पड़ी थी। पास ही अनारकली खड़ी थी। उसे काटो तो खून नहीं। उसकी समझ में यह रहस्य नहीं आ रहा था। सारा दिन उधेड़बुन में बीत गया। अन्त में हारकर शाम के समय उसे राजा से बोलना ही पड़ गया- “महाराज! मेरी समझ में यह रहस्य ही नहीं आ रहा है। सच सच बताइए! आपने यह सब कैसे किया ।”

विक्रमादित्य  ने अपना सारा भेद बताकर बुढ़िया के बहू बेटे की कहानी भी सुनाई । अनारकली यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई कि यही राजा विक्रमादित्य  है। उसने कहा – “आज आप फिर चलिये और ढोलक बजाने की सारी कला को सभा में उड़ेल दीजिये। जब इन्द्र बहुत ही प्रसन्न हो जाएं और कुछ मांगने को कहें तो दो वचन मांग लेना। एक में मुझे और दूसरे में बुढ़िया के बहू-बेटे को जो वहां रसोइए का काम कर रहे हैं।”

रात होने पर विक्रमादित्य  फिर उसी सभा में पहुंच गए। आज उन्होंने जो ढोलक बजाई तो कहना ही क्या? परियों ने ऐसा सुन्दर नाच किया कि चारों तरफ वाह वाह हो उठी । इन्द्र मस्ती में सुध खो बैठे। नृत्य समाप्त हुआ। इन्द्र ने परियों से कुछ मांगने के लिये कहा, परियों ने कहा- ‘महाराज। आपने कुछ देना है तो ढोलक वाले को ही दें। यह उसी का कमाल है।’

ढोलक वाला बोला- ‘महाराज आजकल तो कोई और ही ढोलक बजाता है। आप कुछ देना है तो उसे ही दें।’ विक्रमादित्य  से पूछा गया। उन्होंने दो वचन मांगे। एक वचन में अनारकली और दूसरे वचन में बुढ़िया के बहू-बेटे को, जो वहां रसोइए का काम कर रहे थे । इन्द्र को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि यही राजा विक्रमादित्य  है। उन्होंने अपने वचनों को पूरा किया।

इस तरह राजा विक्रमादित्य  छः मास के भीतर ही परी अनारकली और बुढ़िया के बहू-बेटे के साथ अपनी राजधानी वापस गए। बुढ़िया के बहू-बेटे को उसके पास पहुंचाया और अनारकली के साथ अपने महल लौट आए। सारी राजधानी में खुशियां मनाई गई और विक्रमादित्य  फिर सुखपूर्वक राज करने लगे।

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