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कुषाण कौन थे? और कुषाण वंश का संस्थापक कौन था?

कुषाण कौन थे

कुषाणों की राष्ट्रीयता के बारे में इतिहासकारों में मतभेद हैं। उनके शारीरिक लक्षण, उनकी वेशभूषा, भाषा तथा उनके पूर्व इतिहास के आधार पर कई विद्वानों ने उन्हें तुर्की, ईरानी या तिब्बती कहा है। डी.सी. सरकार ने कुषाणों को मूची जाति की एक शाखा माना है। करीब 165 ई.पू. में हिंगनू जाति ने उन्हें अपने निवास स्थान से निकाल दिया था। नये स्थान की खोज में जब ये लोग पश्चिम की ओर बढ़े तब उनकी मुठभेड़ वुसुन जाति के ईलि नदी के किनारे हुई। इस मुठभेड़ में कुसुन जाति के मुखिया ननतुमि का वध कर दिया गया। और यहाँ से इनकी शाखा दो भागों में विभक्त हुई एक शाखा दक्षिण की तरफ बढ़ी और दूसरी सीथियनों की भूमि की तरफ ।

सीथियनों को उनके निवास स्थान से भगाने के बाद कुषाण वहाँ बस गये, किन्तु वहाँ से सुन जाति ने इन्हें भगा दिया। तब फिर वे अक्सस घाटी की तरफ बढ़े और वहाँ समृद्ध एवं शांतिप्रिय लोगों का, जिन्हें चीनियों ने ताहिया (बेक्ट्रियन) के नाम से जाना है, दमन किया। शनैः शनैः यूची लोग करीब प्रथम ई.पू. के प्रारम्भ में बैक्ट्रिया और सोगडियाना में बस गए और अपनी घुमक्कड़ आदतों को छोड़ दिया। उनका देश अब (i) स्यूमी (हियूमी), (ii) शुआंग्मी (कुआंग्मो), (iii) कुईशुआंग (नुएईचुआंग), (iv) सितुन (हिथुम), और (v) तूमी में विभाजित हुआ। इनमें से तीसरा कबीला आगे चलकर कुषाण के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

कुषाण वंश का संस्थापक कौन था?

कुनुजुल कैडफिसस प्रथम कुषाण वंश का शासक था। उसने यूची की अन्य शाखाओं पर विजय प्राप्त कर कुषाणों को शक्तिशाली बनाया था। ऐसा पता चलता है कि उसने पहलवों पर विजय प्राप्त की थी तथा गन्धार और सीमा प्रांत पर भी अधिकार कर लिया था। कुजुल कैडफिसस के बाद उसका पुत्र विम कैडफिसस अथवा कैडफिसस द्वितीय शासक बना। लेकिन कैडफिसस द्वितीय ने ही भारत में कुषाण शासन की स्थापना की थी। उसने शैव धर्म ग्रहण कर लिया था।

कनिष्क कौन था?

विम कैडफिसस के बाद कुछ समय के लिए कुषाण साम्राज्य पर संकट के बादल घिर गये थे। किसी शक्तिशाली शासक के अभाव में संभवतः एक अथवा अनेक प्रांतीय शासकों ने शासन किया, जिनमें से एक सोटर मेगस की कुछ मुद्राएँ प्राप्त होती हैं जिनमें उसे कुषाण शासक कहा गया है। सोटर मेगस के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती।

फिर 78 ई. में (विम कैडफिसस की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद) कनिष्ठ कुषाण साम्राज्य का शासक बना। “कनिष्क का शासक बनना साम्राज्य की उन्नति के लिए उल्लेखनीय घटना थी।” (पुरी)। कनिष्क व विम कैडफिसस के पारस्परिक संबंधों के बारे में मतभेद है। कुछ ने दोनों को अलग-अलग माना है और कुछ ने एक ही वंश का। मथुरा के देवकुल में दोनों की ही प्रतिमाएँ मिली हैं।

कनिष्क की राजनीतिक उपलब्धियाँ

  1. कनिष्क के युद्ध एवं विजयें : कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रतापी शासक था। कनिष्क के समय में कुषाण- सत्ता अपने शिखर पर पहुँच गयी। कनिष्क अत्यन्त कुशल योद्धा, सेनापति एवं वीर शासक था। गद्दी पर बैठते समय अपने पूर्वजों का काफी बड़ा साम्राज्य उसने उत्तराधिकार में प्राप्त किया था, जिसे उसने अपनी विजयों से और भी विस्तृत किया। कनिष्क ने भारतीय प्रदेशों पर विजय प्राप्त करने के अतिरिक्त समकालीन पार्थिया एवं चीन साम्राज्य से भी युद्ध लड़े।
    1. पार्थिया से युद्ध – कनिष्क व पार्थिया के शासक के मध्य हुए युद्ध के विषय में चीनी स्रोतों से जानकारी मिलती है। चीनी-साहित्य से ज्ञात होता है कि पार्थिया के शासक ने कनिष्क पर आक्रमण किया था। पार्थिया के शासक द्वारा कुषाण साम्राज्य पर आक्रमण करने के दो कारण थे। प्रथम तो यह कि बैक्ट्रिया पर कनिष्क का अधिकार था। व्यापारिक दृष्टिकोण से बैक्ट्रिया अत्यन्त महत्वपूर्ण था, अतः पार्थिया का शासक बैक्ट्रिया पर अधिकार करना चाहता था। दूसरा कारण यह था कि एरियाना प्रदेश पर पहले पार्थिया का अधिकार था, किन्तु बाद में कुषाणों ने इस पर अधिकार कर लिया था, अतः पार्थिया का शासक एरियाना प्रदेश पर पुनः अधिकार चाहता था उपरोक्त उद्देश्यों से पार्थिया के शासक ने कनिष्क पर आक्रमण किया, किन्तु कनिष्क ने उसे परास्त कर दिया।
    2. रोम साम्राज्य से सम्बन्ध-कनिष्क के रोग-साम्राज्य से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध थे। इसका कारण यह था कि रोम की भी पार्थिया से शत्रुता थी। पार्थिया दोनों का ही शत्रु था, अतः कुषाण साम्राज्य व रोम के सम्बन्धों में दृढ़ता उत्पन्न हो गयी। दोनों में परस्पर दूतों का आदान-प्रदान किया।
    3. चीन से युद्ध – कुषाण वंश के समकालीन चीन में हान वंश शासन कर रहा था। हान वंश अत्यन्त शक्तिशाली वंश था। हान शासक के सेनापति पान चाओ (Pam- – chao) ने खोतान, कशगर, कुचा, आदि स्थानों पर विजय प्राप्त कर सम्पूर्ण चीनी तुर्किस्तान को अपने अधिकार में ले लिया था। इस प्रकार हान साम्राज्य की सीमायें कुषाण साम्राज्य की सीमाओं से मिलने लगी थीं।
  1. कनिष्क का साम्राज्य विस्तार : इस प्रकार विभिन्न विजयों के द्वारा कनिष्क ने एक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की। उसका साम्राज्य मध्य एशिया से सारनाथ तक विस्तृत था तथा पुरुषपुर (पेशावर) उसकी राजधानी थी। भारत के बाहर कुषाण साम्राज्य पर नियंत्रण हेतु कनिष्क ने दालवेर्जिन नामक स्थान पर एक दूसरी राजधानी कायम की थी। मध्य एशिया से सारनाथ तक विस्तृत उसके साम्राज्य में प्रदेश उसके आधीन थे।
    1. चीनी तुर्किस्तान-कनिष्क ने चीनी सेनापति पान-चाओ को परास्त करके चीनी तुर्किस्तान के यारकन्द, खोतान व काशगर पर अधिकार किया था।
    2. बैक्ट्रिया- बैक्ट्रिया कनिष्क को उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ था ।
    3. अफगानिस्तान-अफगानिस्तान पर भी कनिष्क ने विजय प्राप्त की थी। उत्तरी-पश्चिमी सीमाप्रांत-कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर इसी प्रदेश में थी।
    4. गान्धार – चीनी स्रोत गान्धार पर कनिष्क का आधिपत्य प्रमाणित करते हैं।
    5. काश्मीर – कल्हण ने अपनी कृति राजतरंगिणी में लिखा है कि कनिष्क का काश्मीर पर अधिकार था तथा चतुर्थ बौद्ध संगीति उसने कश्मीर में ही की थी।
    6. सिन्ध – सुई बिहार अभिलेख से सिन्ध पर कनिष्क के आधिपत्य की पुष्टि होती है। पंजाब- पंजाब पर भी कनिष्क का अधिकार था।
    7. उत्तर प्रदेश- कनिष्क की मुद्राओं, अभिलेखों व विभिन्न कलाकृतियों से ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश के विस्तृत भू-भाग पर कनिष्क का अधिकार था।
    8. बिहार व मगध-चीनी व तिब्बती लेखकों के वर्णन से ज्ञात होता है कि कनिष्क ने साकेत व पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया। बौद्ध परम्पराओं से ज्ञात होता है कि कनिष्क पाटलिपुत्र को जीतकर अश्वघोष को अपने साथ ले गया था। अतः सम्भव है कि कनिष्क ने बिहार व मगध पर विजय प्राप्त की हो।
    9. बंगाल एवं उड़ीसा – बंगाल एवं उड़ीसा में कुषाण की कुछ मुद्रायें प्राप्त हुई हैं जिनके आधार पर कुछ विद्वानों का विचार है कि बंगाल व उड़ीसा पर कनिष्क का अधिकार था, किन्तु ऐसा मानना उचित प्रतीत नहीं होता।
    10. मध्य प्रदेश – मध्यप्रदेश के कुछ स्थानों से कनिष्क की मुद्राओं व मथुरा शैली की कुछ मूर्तियों के मिलने के कारण कुछ विद्वान मध्यप्रदेश पर भी कनिष्क की सत्ता बताते हैं, किन्तु मात्र इस आधार पर ऐसा सोचना तर्कसंगत नहीं है।
    11. पश्चिमी भारत – कतिपय इतिहासकार पश्चिम भारत के क्षहरात एवं चष्टन-वंश को भी कुषाणों के अधीन मानते हैं, किन्तु इस विषय में प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण इस मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि कनिष्क का साम्राज्य पूर्व में बिहार से लेकर पश्चिम में खुरामान तक तथा उत्तर में खोतान से लेकर दक्षिण में कोंकण तक विस्तृत था

  1. शासन व्यवस्था (Administration) : कनिष्क का साम्राज्य अत्यन्त विशाल था, किन्तु उसकी शासन व्यवस्था के विषय में अत्यन्त अल्प जानकारी उपलब्ध है। चीनी-साहित्य से ज्ञात होता है कि उसने अपने जीते हुए प्रदेशों में शासक नियुक्त किये थे। सारनाथ के अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसका शासन प्रान्तीय क्षत्रपों के द्वारा होता था। एक ही राजधानी मथुरा व दूसरी की सम्भवतः काशी थी। मथुरा में महाक्षत्रप खरपल्लान और काशी में वनस्पर प्रान्तीय शासक थे। इस शासन का स्वरूप बहुत कुछ सैनिक था और इसका संगठन बहुत ठोस था।
  2. कनिष्क की मृत्यु (Kanishka’s Denth) : कनिष्क ने 23 अथवा 45 वर्ष राज्य किया था, तदोपरान्त उसके सेनापतियों ने ही कनिष्क के निरन्तर युद्धों से तंग आकर उसकी हत्या कर दी।
  3. कनिष्क का मूल्यांकन (Evaluation) : कनिष्क प्राचीन भारत के महानतम् शासकों में से एक है। उसने अपनी शक्ति के द्वारा एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी जिसकी सीमायें मध्य एशिया से सारनाथ तक विस्तृत थीं। निस्सन्देह कनिष्क एक कुशल योद्धा, विजेता तथा साम्राज्य-निर्माता था। एक विजेता होने के साथ ही कनिष्क एक कुशल प्रशासक भी था। उसने अपने विशाल-साम्राज्य को विभिन्न् प्रान्तों में विभक्त कर एक कुशल प्रशासन की स्थापना की थी। कनिष्क के समय में भारतीय- सभ्यता का भी विदेशों में प्रचार एवं प्रसार हुआ। इस सम्बन्ध में डॉ. राय चौधरी ने लिखा है, “कनिष्क के वंश ने भारतीय सभ्यता के लिए मध्य एवं पूर्वी एशिया का द्वार खोल दिया।” कनिष्क विजेता होने के अतिरिक्त एक विद्वान व्यक्ति था तथा विद्वानों का आश्रयदाता था। उसकी राजसभा में वसुमित्र, अश्वघोष, नागार्जुन जैसे विद्वान रहते थे। इसी कारण कनिष्क के शासनकाल में साहित्य की अपार उन्नति हुई। कनिष्क के शासनकाल को गान्धार कला के आविर्भाव ने अत्यन्त महत्वपूर्ण बना दिया क्योंकि इस कला के अन्तर्गत महात्मा बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण बौद्ध-धर्म के इतिहास के लिए एक अनूठी बात थी।

बौद्ध-धर्म को संरक्षण प्रदान करने के कारण कनिष्क को दूसरा अशोक कहा जाता था। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि कनिष्क ने बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार एवं उन्नति के लिए अथक प्रयत्न किये थे। किन्तु अशोक से कनिष्क की तुलना करना तर्कसंगत नहीं है। अशोक एक महान् शासक था जिसकी विश्व के किसी भी शासक से तुलना नहीं की जा सकती। यद्यपि अशोक और कनिष्क में कुछ समानतायें हैं, जैसे बौद्ध-धर्म को संरक्षण देना, प्रचार एवं प्रसार हेतु अन्य देशों में बौद्ध भिक्षुओं को भेजना तथा बौद्ध संगीतियों का आयोजन करना, तथापि उनमें अनेक विषमतायें भी हैं जिनका उल्लेख किया जाना आवश्यक है। अशोक ने बौद्ध-धर्म ग्रहण करने के पश्चात् धम्म यात्रायें प्रारम्भ की और बौद्ध-धर्म के प्रचार हेतु शिलाओं व स्तम्भों पर लेख उत्कीर्ण कराये। अशोक ने जनकल्याण के लिए धर्मशालाओं, चिकित्सालयों, कुओं आदि का निर्माण कराया और राह में छायादार वृक्ष लगवाये। कलिंग के युद्ध के पश्चात् अशोक ने धम्म-विजयों का आश्रय लिया, किन्तु कनिष्क ने उपरोक्त कार्य नहीं किये और साम्राज्य विस्तार हेतु मृत्यु तक युद्धों में व्यस्त रहा। अतः उपरोक्त साक्ष्यों के होते हुए यद्यपि कनिष्क की तुलना अशोक से नहीं की जा सकती तथापि उसकी विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धियों को देखते हुए, इनमें कोई सन्देह नहीं है कि कनिष्क भी एक महान् शासक था।

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कनिष्क के उत्तराधिकारियों और कुषाण साम्राज्य का पतन

कनिष्क के उत्तराधिकारी कुषाण वंशीय शासक अत्यन्त निर्बल होने के कारण उसके विस्तृत साम्राज्य को अक्षुण्ण न रख सके। कनिष्क के पश्चात् वासिष्क शासक बना। उसके शासनकाल की किसी उल्लेखनीय घटना के विषय में पता नहीं चलता। वासिष्क का उत्तराधिकारी हुविष्क था। हुविष्क ने दीर्घकाल तक शासन किया था तथा उसकी अनेक मुद्रायें प्राप्त हुई हैं, जिन पर रोम, ईरान और हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र उत्कीर्ण हैं, जिससे उसकी धार्मिक सहिष्णुता के विषय में पता चलता है। हुविष्क स्वयं बौद्ध-धर्म का अनुयायी था तथा उसने मथुरा में एक बौद्ध विहार का निर्माण कराया था। हुविष्क ने हुविष्कपुर नामक एक – नगर की स्थापना की थी। हुविष्क की मुद्राओं से ज्ञात होता है कि उसका साम्राज्य अफगानिस्तान, काश्मीर, पंजाब, मथुरा और पूर्वी उत्तरप्रदेश पर था। हुविष्क ने लगभग 138 ई. तक शासन किया था हुविष्क के पश्चात् वासुदेव शासक बना। वासुदेव एक निर्बल शासक था तथा ऐसा प्रतीत होता है कि उसका साम्राज्य पंजाब और उत्तरप्रदेश तक ही सीमित था। वासुदेव शैव धर्म का अनुयायी था

वासुदेव की मृत्यु के पश्चात् कुषाण साम्राज्य की अवनति तीव्रता से हुई तथा उत्तर भारत में नाग-भारशिवों, यौधेयों तथा मालवों की शक्ति में वृद्धि होने के कारण कुषाण- साम्राज्य निरन्तर पतन की ओर अग्रसर होता रहा। इस प्रकार कुषाण साम्राज्य के अधीन राज्य एक के बाद एक स्वतन्त्र होते गये और शीघ्र ही कुषाण साम्राज्य का पतन हो गया।

कुषाणों की समाज एवं संस्कृति के बारे में

कुषाणों के आधीन भारत में एक प्रकार से सर्वांगीण उन्नति हुई। सभ्यता एवं संस्कृति उन्नत हुई। मौर्य युग की भाँति इस काल की सभ्यता और संस्कृति की उन्नति के पीछे एक विशाल साम्राज्य द्वारा प्रदत्त सुविधायें थीं जिनके अभाव में सम्भवतः संस्कृति की विशेष उन्नति संभव न थी। मौर्य साम्राज्य के पतनोपरान्त प्रथम बार कुषाण साम्राज्य ही इतना विशाल था कि जिसके अन्तर्गत न केवल सम्पूर्ण उत्तरी भारत, अपितु इसके बाहर भी पर्याप्त भू-भाग, मध्य एशिया तक के थे। इस प्रकार भारत का विदेशों के साथ घनिष्ठतम सम्पर्क स्थापित हुआ। इसकी वजह से व्यापार भी फैला और धर्म का प्रचार-प्रसार भी हुआ। इस दृष्टि से कुषाण युग भारतीय संस्कृति के इतिहास में अत्याधिक महत्वपूर्ण है। सभ्यता और संस्कृति के निवास के अन्तर्गत मोटे रूप से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, साहित्यिक दशा एवं कला को सम्मिलित किया जाता है।

कुषाणों की राजनीतिक दशा

भारत की सीमायें उसकी प्राकृतिक एवं भौगोलिक सीमायें लांघकर मध्य एशिया के खोतान, काशगर, यारकन्द तथा पामीर के प्रदेश, बैक्ट्रिया, पार्थिया (आधुनिक सम्पूर्ण अफगानिस्तान और बुखारा) तक पहुँच गयी थीं। वासुदेव के बाद Law of Con- servation के बजाए Law of Contraction लागू हो गया, Intergration की बजाए Disintegaration की बात प्रभावशील होने लगी। विशाल साम्राज्य टूटकर छोटे प्रान्तों में बिखर गया और अन्त में विनष्ट ही हो गया।

कुषाणों की सामाजिक दशा

कुषाणों के समय देश की सामाजिक दशा अच्छी थी। जीवन बहुत सजीव था। इस बात की जानकारी हमें उस समय के साहित्य एवं कला से होती है। संस्कृत बौद्ध साहित्य से हमें पता चलता है कि समाज का विभाजन पेशे या पैसे पर नहीं परन्तु जन्म पर आधारित था। मथुरा के एक अभिलेख से हमें पता चलता है कि किसी एक कुटुम्ब के लोगों ने अलग-अलग व्यवसाय अपनाये थे। कुटुम्ब के लोग व्यक्तिगत भावना के बजाए सामूहिक भावना पर ज्यादा ध्यान देते थे। कुटुम्ब का मुखिया गृहपति कहलाता था तथा उसकी पत्नी भार्या, कुटुम्बिनी, धर्म पत्नी और सहचरी के नाम से जानी जाती थी। बहुधा विवाह सजातीय ही होते थे। कुषाणकालीन मूर्तियों से हमें पता चलता है कि पुरुष गले में हार और हाथ की कलाइयों में एक-एक चूड़ी पहनते थे, जबकि औरतें हार के साथ एक से अधिक चूड़ियाँ पहनती थीं। इसके अलावा, आभूषणों में पौंची, कर्णफूल, नूपुर भी प्रचलित थे। औरतें प्रसाधनों की अभ्यस्त थी। उस समय की मूर्तियों से हमें कई प्रकार के जूड़ों की शैली का पता चलता है।

खाने में चावल, जौ, गेहूं, दूध और सब्जियों का प्रचलन था। क्षत्रियों के लिये प्याज वर्जित थी। आमोद-प्रमोद में लोगों को गाने बजाने का शौक था। लोग जुआ भी खेलते थे। तक्षशिला के विहारों से कुछ पासे भी मिले हैं जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विहार में रहने वाले भिक्षुक द्यूत-क्रीड़ा में भी भाग लेते थे। यह तथ्य उस समय के भिक्षुओं की धार्मिक कुटलिता का द्योतक है। उस समय की शिक्षा विशेषकर धार्मिक प्रवृत्ति की थी। छोटे बालकों को प्रारम्भिक विषयों की जानकारी दी जाती थी और बड़ों को वैदिक आदि साहित्य की। अध्ययन में जाति का भी दखल होता था। ब्राह्मणों को कर्मकाण्ड एवं दर्शन की शिक्षा दी जाती थी तथा क्षत्रियों को सैनिक, भौतिक तथा मनोवैज्ञानिक, वैश्यों को व्यावहारिक (वाणिज्य एवं व्यापार) की। शूद्र भी दीक्षित किये जाते थे। शल्य चिकित्सा आदि की शिक्षा का एक प्रकार से विशिष्टीकरण था। इसमें विशेषकर द्विज रुचि लेते थे। शिक्षक और शिष्ट के सम्बन्ध आचार-संहिता पर आधारित थे। पढ़ने का ढंग लिखित एवं मुखाग्र दोनों ही था। साहित्य से पता चलता है कि इस समय नारी शिक्षा तिरस्कृत नहीं थी। कई विदुषियों के बारे में हमें जानकारी मिलती है। मिलिन्दपन्ह से हमें मृतकों के दाह संस्कार के बारे में पता चलता है। लोक विलाप करके रोते थे तथा छाती पीटते थे। शव को कफन से ढका जाता था। अश्वघोष ने यह भी बतलाया है कि ऐसे समय किस रंग के कपड़े पहनने चाहियें।

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कुषाणों के आर्थिक दशा

देश में अतिरिक्त एवं बाह्य शान्ति व्यवस्था के कारण समृद्धि का वातावरण था। उपज के विकास तथा गमनागमन और यातायात के विकसित साधन-प्रचुरता में उपलब्ध होने की वजह से भारत के पाश्चात्य जगत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध बहुत अधिक दृढ़ हो गया। कुषाणं साम्राज्य के विभिन्न भागों से माल बाहर भेजा जाता था। उत्तर- पश्चिम की ओर से व्यापारिक पश्चिमी तट से समुद्री मार्ग था। रोमन साम्राज्य के साथ भारत का व्यापार लाभदायक था। इतिहासकार मोम्सन के अनुसार रोम को भारत से आयात केल्य में बहुत बड़ी मात्रा में सोना देना पड़ता था। अपने देश से इतना सोना निकल जाने पर रोमन लेखक प्लिनी ने दुःख प्रकट किया है। कहा जाता है कि भारत से मंगाई गई मलमल को कई बार लपेट कर रोम के बाजारों में घूमने वाली रोमन स्त्रियाँ नगर की नैतकिता के लिए भय बन गई थीं। अन्त में विवश होकर वहाँ की सरकार ने भारत से मलमल का आयात बन्द कर दिया। रोम के साथ व्यापार पश्चिमी तथा दक्षिणी भारत के बन्दरगाहों से किया जाता था। इन प्रदेशों से बड़ी संख्या में रोमन सिक्कों की प्राप्ति से इस बात की पुष्ट होती है। इन रोमन सिक्कों का प्रभाव कुषाण व गुप्त राजाओं के सिक्कों पर भी पड़ा।

कुषाणों के मुद्रा और धार्मिक दशा

आर्थिक व्यवस्था / दशा में सिक्कों का अपना महत्व है। ये विनिमय के माध्यम रहे, पर प्राचीन सिक्के धार्मिक दशा पर भी प्रभाव डालते हैं, कुषाणों के सिक्के भी इन्होंने काफी तादाद में पीले, सफेद और ताम्र (सोने, चांदी, तांबे) सिक्के प्रसारित किये। इन पर ईरानी मिश्र (मित्र), आर्दोक्ष चन्द्रदेव (माही), वेरेथ्राग्ना, अहुरमज्दा, यूनानी हेफीस्तस, सेलीन (Salene-चंद्रदेवी), हेलिओज (Hellius – सूर्यदेव), हेरोक्जिल (Haracles), एलमी नाना और भारतीय शिव, स्कन्द, वायु, यम, वरुण विशाखा, उमा, बुद्ध (Boddo) आदि देवी-देवताओं का अंकन है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कुषाण नरेश धार्मिक मामलों में सार्वभौमिक (Comopolitean) विचार वाले थे। वे अपने साम्राज्य के समस्त धर्मों का सम्मान करते थे और उन सबके देवी-देवताओं को आदर व सम्मान की दृष्टि से देखते थे। इसके अतिरिक्त यह भी भास होता है कि कुषाणों के विशाल साम्राज्य में विविध धर्मों के अनुयायी निवास करते थे और उन सबको सन्तुष्ट करने के लिए कुषाण सम्राटों ने उनके प्रमुख देवी-देवताओं को अपनी मुद्राओं में अंकित किया। सिक्कों पर देवताओं का संयोजन कुषाणों की सामान्य सांस्कृतिक परम्पराओं के साथ उनकी धार्मिक सहिष्णुता की नीति को भी प्रतिबम्बित करती है। निःसन्देह उनमें उदार धार्मिक सहिष्णुता थी। प्राचीन मगध के बिम्बिसार और अजात शत्रु की, मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त और अशोक की धार्मिक सहिष्णुता और उदारता की नीति कुषाण सम्राटों ने अक्षुण्ण बनाये रखी। उन्होंने अपने साम्राज्य में यूनानी और ईरानी धर्मावलम्बियों को ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म को मानने वालों को एक जैसे अधिकार दिये थे। सुदूर अतीत में यह एक बड़ी विशेषता थी ।

  1. हिन्दू धर्म-लोगों में विष्णु, शिव, गणेश की पूजा का प्रचलन था। हिन्दुओं की उपासना के साधनों में मन्दिर और मूर्ति पूजा सम्मिलित थी।
  2. जैन धर्म– जैनियों ने भी बौद्ध उपासना की विधियों का अनुसरण किया तथा स्तूपों, मन्दिरों और तीर्थंकारों की मूर्तियों का प्रचार किया। तमिल देशों में जैन धर्म फैला और इसका परिणाम यह हुआ कि तमिल भाषा में एक मूल्यवान साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ ।
  3. बौद्ध-धर्म- धार्मिक क्षेत्र में इस काल की सबसे महत्वपूर्ण बात बौद्ध धर्म एक सम्प्रदाय का उदय होना थी। महायान का जन्म कुषाण युग में ही हुआ और इससे भेद दिखाने के लिए पुराने मत का नाम हीनयान रख दिया गया। कुषाणों ने जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, धार्मिक सहिष्णुता का अनुसरण किया। उन्होंने व्यक्तिगत धर्म को जनता या राज्य धर्म बनाने की चेष्टा नहीं की। महायान का शब्दार्थ है महाचक्र। इसका प्रचार मुख्य रूप से चीन, जापान तथा तिब्बत आदि एशिया के ऊपर देशों में होने के कारण इसे उत्तरी बौद्ध धर्म भी होते हैं। हीनयान या लघुचक्र का विकास लंका, बर्मा आदि दक्षिण देशों में होने से यह दक्षिणी बौद्ध-धर्म भी कहलाता है।

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