हरतालिका व्रत कथा एवं हरतालिका व्रत क्या है? व्रत कब हैं और मुहूर्त क्या हैं?

हरतालिका व्रत कथा एवं हरतालिका व्रत क्या है? व्रत कब हैं और मुहूर्त क्या हैं?

हरतालिका तीज नाम का यह व्रत भारत का एक महत्वपूर्ण व्रत है, इस व्रत के दिन पवित्र धर्म को मानने वाले महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र की कामना हेतु व्रत रहती हैं. यह व्रत सभी व्रतों का राजा है, तथा बहुत ही कठिन व्रत इसे माना जा सकता है.

इस व्रत को करने वाली महिलाएं 24 घंटे से ज्यादा समय तक बिना पानी के रहती है, यह एक तरीके का निर्जला व्रत है, जिसमें महिलाएं 24 घंटे से ज्यादा वक्त तक बिना पानी और बिना खाना के रहती हैं. हिंदू धर्म की यही सबसे अच्छी खासियत है यहां पर किसी भी महिला या पुरुष को कोई मान्यता मानने के लिए दबाव नहीं दिया जाता, धार्मिक रूप से सभी जाति के लोगों, तथा लिंग के लोगों को स्वतंत्रता प्राप्त है. इस व्रत को महिलाएं अपनी स्वेच्छा से रखती हैं, अपने पति के लंबी आयु के लिए. कम्युनिस्ट सोच रखने वाले औरतें हमेशा व्रत का उपहास उड़ाते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि वह परिवारिक महिलाओं के प्रति ईर्ष्या भाव रखती हैं, क्योंकि उनके अंदर यह गुण नहीं होते.

अब हम आ जाते हैं हम व्रत पर, यह व्रत इस वर्ष 9 सितंबर 2021 को गुरुवार के दिन मनाया जाएगा. पवित्र धर्म के पंचांग के अनुसार प्रतिवर्ष भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को यह व्रत मनाया जाने का विधान है. इस व्रत के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लंबी आयु के लिए माता पार्वती की पूजा अर्चना करके उनका आशीर्वाद मांगती है.

तीज व्रत में महिलाएं घर में तरह-तरह के व्यंजन बनाते हैं, जिनमें सबसे खास मिष्ठान- पकवान गुजिया, सलोनी और बेसन के पापड़ हैं. हालांकि अब चीजों की उपलब्धता ज्यादा होने की वजह से, लोग कई प्रकार के मिष्ठान एवं पकवान बनाते हैं. जिसमें गुलाब जामुन और बेसन के लड्डू सबसे खास मिष्ठान है,

2021 में हरतालिका व्रत कब मनाया जाएगा? Hartalika vrat kab hain?

इस वर्ष हरतालिका व्रत गुरुवार के दिन 9 सितंबर 2021 को धूमधाम से मनाया जाएगा। हरतालिका व्रत की पूजन का सबसे उत्तम समय एवं मुहूर्त शाम 5 बजकर 45 मिनट से रात 8 बजकर 12 मिनट तक हैं।

आखिर इस दिन ही क्यों मनाया जाता है हरतालिका व्रत?

पौराणिक ग्रंथों के अध्ययन से यह पता चलता है की माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करने के लिए, इस व्रत का पालन किया था। और तभी से सभी पवित्र धर्म को मानने वाले लोग, इसी दिन माता पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा को अपने हाथों से बनाकर उनकी पूजा करते हैं, फूल-माला आदि चढ़ाते हैं, मंडप बनाते हैं, तरह-तरह के मिष्ठान चढ़ाते हैं। और हृदय की गहराइयों से मां पार्वती जी की पूजा अर्चना करते हुए रात भर जागरण करती हैं, जागरण के दौरान माता पार्वती और भोलेनाथ शंभू के मधुर भजन को गाती है। घर का माहौल स्वर्ग सा हो जाता है,

हरतालिका व्रत के लाभ के प्रमाण?

जब देश गुलाम था तो एक व्यापारी आयरलैंड से भारत आया हुआ था, यह कपड़ों का व्यापारी था। इसकी तबीयत बहुत खराब रहा करती थी, हर समय इसको कोई ना कोई बीमारी घेरे रहती थी। क्या बहुत पीड़ित था, अपने जीवन से परेशान हो चुका था। तब इसको किसी योग गुरु ने भारत भ्रमण के लिए बुलाया। व्यापारी का नाम पीटर था यह अपनी पत्नी के साथ भारत आया था। यह जब भारत भ्रमण कर रहा था उसी समय एक मंदिर में यह रुका, उस मंदिर में गांव भर की पूरी औरतें, रात होते ही एकत्रित हो गई। और माता पार्वती तथा भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करने लगी। मैं बेचारा पीटर, अपने साथ आए एक द्विभाषी भारतीय से इसके बारे में पूछा, तो उसने बताया की सभी भारतीय औरतें हैं, जो सबसे महान एवं पवित्र धर्म को पालन करती हैं। और अपने पति की लंबी उम्र की कामना के लिए यह पूजा अर्चना कर रही है। यह औरत साल में एक बार आता है।

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तब पीटर की पत्नी ने निश्चय किया कि वह भी यह व्रत या करेगी, और इसके बाद हर वर्ष भारत आती, और उसी मंदिर में अपने पति की लंबी उम्र की कामना के लिए व्रत किया करती। 2 वर्ष व्रत रखने के बाद तीसरे वर्ष जब व्रत का समय आया, तो पीटर बिल्कुल स्वस्थ हो चुका था।

इसी प्रकार इंग्लैंड में एक गंदी सोच वाला नास्तिक रहता था, कम्युनिस्ट विचारधारा को बहुत मानता था। लगातार लोगों को हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काता था, गंदी सोच वाले उस व्यक्ति की तबीयत खराब रहने लगी, उसकी पत्नी हिंदू धर्म में बहुत ही श्रद्धा रखती थी, लेकिन दुष्ट एवं राक्षस पति के कारण वह व्रत नहीं रख पाती थी। लेकिन जब पति की तबीयत खराब होने लगी, तो उसने जिद करके हरतालिका तीज का व्रत रखना प्रारंभ किया। चमत्कारिक रूप से चार व्रत करने के बाद ही उसका पति एकदम स्वस्थ हो गया। और वह है कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वाला, वापस हिंदू धर्म की मान्यताओं पर विश्वास रखने लगा।

ऐसे ही ना जाने कितनी कहानियां है, जो यह प्रमाणित करती है कि यह व्रत बहुत ही सर्वोच्च एवं उत्तम है।

हरतालिका तीज के व्रत का पूजन कैसे करते हैं?

महिलाएं पूरा दिन भर रहती हैं, सुबह जल्दी उठ कर, नहाकर भगवान का पूजन पाठ करती हैं, सिंगार करती हैं, अच्छे वस्त्र पहनती हैं, आभूषण पहनती है। घर की सभी महिलाएं, किचन में एकत्रित होकर तरह-तरह के व्यंजन बनाती हैं, और मिष्ठान बनाती हैं। आज वर्तमान समय में पुरुषों की सोच में बदलाव आया है, तो पुरुष भी महिलाओं के साथ मिलकर उनका हाथ बताते हैं, खाना बनाने मे मदद करते हैं। क्योंकि या व्रत बहुत कठिन है, इसलिए पुरुष, घर की कई कठिन कार्यों को स्वयं करते हैं। जैसे कि घर की साफ सफाई करना। बाजार से सामान लेकर आना, पानी भरना। शाम होते ही महिलाएं काली मिट्टी से भगवान शंकर और पार्वती जी की मूर्ति बनाती हैं, उन्हें बैठाने के लिए फूलों से मंडप बनाती हैं। रंगोली बनाई जाती है। लोक गीत गाए जाते हैं, आजकल तो भजन बजाने के यंत्र आते हैं उन के माध्यम से भजन को चलाया जाता है। पूजा के समय पंडित के माध्यम से पूजा विधि कराई जाती है, इसके बाद कथा सुनी जाती है, इस व्रत में हरतालिका व्रत की कथा सुनना बहुत ही उत्तम होता है। इसलिए इस व्रत की कथा को जरूर सुनना चाहिए, तथा पूरे होने के बाद, पंडित जी हवन कराते हैं। पूजा समाप्त की घोषणा होती है तो महिलाएं ₹51 देकर पंडित जी का पैर पड़ती है, पूड़ी सब्जी खीर खिलाकर, पंडित जी को प्रसाद के साथ विवाह किया जाता है। इसके बाद रात भर महिलाएं भजन कीर्तन करती हैं, और भक्ति में डूब जाती हैं। घर का माहौल बहुत ही अच्छा हो जाता है, धूप एवं अगरबत्ती की महक से पूरा घर महक रहा होता है, रोगी भी अपने को स्वस्थ महसूस करने लगता है।

हरतालिका तीज की व्रत कथा क्या है?

कथा प्रारम्भ

(हिमालय और मैना का विवाह)

नारद जी बोले- हे परमपिता ब्रह्मा जी। सती ने पर्वतराज की कन्या होकर किस प्रकार तक द्वारा शिवजी को प्राप्त किया, इसका पूरा वर्णन मुझे बताइए
ब्रह्मा जी बोले- मेरे परम प्रिय पुत्र! जब सती जी ने यज्ञ में शरीर त्याग दिया तब उन्होंने हिमालय के घर जन्म लेने का विचार किया। क्योंकि शिवलोक में स्थित मेनका ने सती देवी के लिए आराधना की थी। इसलिए सती जी मेनका की पुत्री बनकर उनके घर में जन्म लिया, इस जन्म में उनका नाम पार्वती हुआ।
नारद जी बोले- हे पिता! मुझे मेनका की उत्पत्ति एवं विवाह आदि सुनाइए।

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तब ब्रह्माजी बोले- उत्तर दिशा में हिमालय नाम का एक राजा था। जो श्रेष्ठ पर्वत की सभी समृद्धि यों से युक्त तथा बड़ा ही तेजस्वी था। उस पर्वत का दिव्य रूप है जो सर्वांग सुंदर विष्णु का रूप लिए हुए हैं, और वह संतो को बहुत प्रिय है। वह शैलराज हिमालय कहलाता है। उसने अपने कुल की वृद्धि के लिए विवाह की इच्छा की, सभी देवता पितरों के पास गए और बोले- कि आप देव कार्य के लिए अपनी पुत्री मेनका का विवाह हिमालय पर्वत राज के साथ कर दें। इससे सभी का भला होगा और देवताओं के पद पर आने वाली आपत्तियों का नाश होगा। पितृ गणों ने अपनी पुत्रियों के श्राप की बात याद कर मेनका का विवाह पर्वतराज से कर दिया, हिमालय के विवाह में ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता लोग आए थे। भारी आनंद रहा, विवाह उत्सव के बाद सभी देवता लोग मुनेश्वर शिव पार्वती का ध्यान कर अपने-अपने लोक चले गए।

( प्रथम अध्याय समाप्त)

दूसरा अध्याय – पितरों की कन्याओं को श्राप

ब्रह्मा जी बोले- हे नारद मेरे पुत्र दक्ष के 60 कन्याएं उत्पन्न हुई थी। उनको उन्होंने कश्यप आदि ऋषि यों से विवाह कराया। उनमें स्वधा नाम वाली कन्या को पितृश्वर को प्रदान किया। उनकी तीन कन्या उत्पन्न हुई, बड़ी पुत्री का नाम मेनका, मझली पुत्री का नाम धन्या और तीसरी का नाम कलावती था। हे मुनीश्वर एक समय में तीनो बहने श्वेतदीप मे भगवान विष्णु के दर्शन करने गई। उस समय वहां भारी उत्साह हुआ, उसमें सनकादिक ऋषि लोग भी आए हुए थे। सभी लोग सनकादिक ऋषि यों का स्वागत करने के लिए खड़े हो गए परंतु यह तीनों बहने, उनके स्वागत के लिए खड़ी नहीं हुई। इस पर क्रोधित होकर सनकादिक ऋषि यों ने श्राप दे दिया कि तुम तीनों घमंड में चूर हो, जिसकी वजह से तुम तीनों ने हमारा अपमान किया है। अतः तुम स्वर्ग से दूर जाकर मनुष्य बन जाओ। फिर इन तीनों बहनों ने सिर झुका कर प्रणाम किया और प्रार्थना करने लगी- हे मुनिवर! आप इस समय प्रसन्न हो जाइए, हम लोग तो मूर्ख हैं, ऐसी कृपा कीजिए जिससे हमें फिर से स्वर्ग की प्राप्ति करने। फिर भगवान शिव की माया से मोहित होकर सनत कुमार बोले- हे पितरों की कन्याओं अब तुम प्रसन्न होकर मेरे वचनों को सुनो- यह बड़ी कन्या पर्वतराज हिमालय की अर्धांगिनी बनेगी और पार्वती नाम की कन्या को उत्पन्न करेगी। जो भगवान शिव की पत्नी होंगी, दूसरी कन्या का नाम महायोगी होगा, जोकि जनक की पत्नी बनेगी, और लक्ष्मी रूपा सीता जी की मां बनने का गौरव प्राप्त करेंगे। तीसरी तीसरी पुत्री विवाह राजा वृषभानु से होगा, यह महामाया राधा को जन्म देंगी।

मेनका को पार्वती का वरदान प्राप्त होगा, वह कैलाश तक जाएगी, तुम पितरों की कन्या हो, अतः तुम पृथ्वी पर भी स्वर्ग के विलास पाओगी। इस प्रकार कहकर मुनिराज अंतर्ध्यान हो गए, और वह तीनों बहने पुराने घर की ओर चली गई

( दूसरा अध्याय समाप्त)

तीसरा अध्याय – हिमालय का तप तथा पार्वती जी का जन्म

ब्रह्मा जी बोले- हिमालय और मैना उमा देवी को पुत्री रूप में पाने के लिए, कठोर तप करने लगे। चैत्र मास से लेकर उन्होंने व्रत आराधना शुरू की तथा 27 वर्ष तक व्रत किया। धूप दीप आदि से दुर्गा की पूजा करके निराहार रहकर आराधना की, उनके व्रत से मां दुर्गा प्रसन्न होकर प्रकट हुई और बोली- हे पर्वतराज और मैना मैं आपके व्रत से बहुत प्रसन्न हुई, मांगो जो वरदान मांगना है।

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मैना ने 100 पुत्र मांगे तथा पुत्री के रूप में उमादेवी से स्वयं प्रकट होने की प्रार्थना की। इस प्रकार उमा देवी वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गई। कुछ समय बाद मैना रानी ने गर्भधारण किया और 10 महीने पूर्ण होने पर उन्हें पुत्री की प्राप्ति हुई, यह और कोई नहीं सती शिवा कल्याणी थी।

तीसरा अध्याय समाप्त

चौथा अध्याय- नारद जी का उमा को उपदेश

ब्रह्मा जी बोले- हे नारद! तब उमा देवी कन्या के रूप में प्रगट हो सांसारिक जीव की भांति रुदन करने लगी। उस कन्या के रुदन को सुनकर सब आनंदित हुए। उनके नामकरण आदि संस्कार कराए गए। जगदंबा भी नाना प्रकार की क्रीड़ाए करने लगी और बड़ी होने लगी। एक बार हे नारद, तुम हिमालय के घर सिर की प्रेरणा से गए और वहां हिमाचल ने तुम्हारा सत्कार कर कन्या पार्वती के भविष्य के बारे में पूछा।

तुमने कहा- यह कन्या बड़ी भाग्यशाली है, परंतु इसका पति दिगंबर योगी, निर्गुण, कामवासना रहित, माता-पिता हीन, अभिमान रहित तथा साधु वेश भारी होगा। यह सुनकर हिमालय राज और मैना रानी बहुत दुखी हुए। परंतु हे नारद तुमने कहा कि यह सभी लक्षण अशुभ है, परंतु यह सभी लक्षण भगवान शिव में भी मौजूद है। और यह लक्षण भगवान शिव के लिए माने गए हैं। अतः पार्वती को सिर की प्राप्ति के लिए व्रत करना चाहिए। भगवान शिव बुरे से बुरे लक्षणों को भी हितकारी बना देते हैं। ऐसा उपदेश देकर हे नारद, तुम वहां से चले गए।

चौथा अध्याय समाप्त

पांचवा अध्याय – पार्वती का सपना

ब्रह्मा जी बोले- एक बार महिला ने अपने पति से कहा- हे नाथ पार्वती अब बड़ी हो गई है। पार्वती के लिए योग्य वर की तलाश कीजिए, इस पर हिमालय ने कहा- हे देवी नारद जी की बात कभी झूठी नहीं होगी, इसलिए पार्वती को शिव की तपस्या करने को कहो। इस प्रकार की बात सुनकर मैना के आंखों में आंसू भर आए और वह पार्वती जी के कोमलता को देखकर अच्छे से दुखी हुई।

यह देखकर पार्वती बोली- माता जो मैंने आज प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में एक सपने देखा है, उसे जरा आप उन्हें। मुझे एक तपस्वी ब्राह्मण में पूर्वक कहा है कि मैं भगवान रुद्र की प्राप्ति के लिए, व्रत करूं, सभी मेरे जीवन में आने वाले कष्ट दूर होंगे, यह बात सुनकर मैना और हिमांचल, पार्वती जी के व्रत की तैयारी करने लगे।

पांचवा अध्याय समाप्त

छठवाँ अध्याय – शिव हिमाचल संवाद