नंदी की पत्नी का नाम

भगवान शिव मे प्रिय भक्त नंदी की पत्नी का नाम सुयशा हैं। नंदी की पत्नी सुयशा मरुतो की पुत्री हैं। सुयशी पति व्रत को धरण करने वाली स्त्री थी तथा वह माता पार्वती की अनन्या भक्त थी।

मरुतो एक प्रकार के देव गण हैं, जिनकी संख्या 180 हैं लेकिन इनामे 49 प्रमुख हैं। वेदो के अनुसार ये मरुत रुद्र और वृश्री के पुत्र हैं, लेकिन कही कही पर इन मरुतो को कश्यप मुनि और दिति की संतान बताया गया हैं। इन मरुतो से ही सुयशी का जन्म हुआ था, जिनका विवाह भगवान शिव के अनन्या भक्त नंदी के साथ हुआ था। मरुतो का एक गण मे 7 लोग हैं इसी प्रकार मरुतो के कुल 7 गण हैं। जिनहे मिलकर मरुतो की संख्या 49 होती हैं। गण का अर्थ हैं की गिनती मे सैनिको का समूह। पुरानो के अनुसार मरुतों वायुकोण के दिक्पाल हैं। ये मरुतों देवताओ के रक्षक थे इसीलिए इन्हे देवगण भी कहा जाता हैं।

नंदी के पिता का नाम

नंदी के पिता का नाम मुनि शिलाद हैं। शिलाद मुनि एक बड़े ही ब्रांहचारी ऋषि थे। शिलाद मुनि ने भगवान शिव से पुत्र प्राप्ति के लिए वरदान मांगा था, जिसके बाद शिलाद मुनि को एक खेत से नंदी जी मिले थे। नंदी जी की माता नहीं हैं या यह कह सकते हैं की उनकी माता प्रकृति हैं।

नंदी का जन्म कैसे हुआ

प्राचीन समय में शिलाद नाम के एक बहुत ही प्रसिद्ध है ऋषि थे। भगवान की भक्ति में उनका मन इस तरीके से रच बस गया था कि वह ब्रम्हचर्य से कठोर व्रत का पालन करने लगे और गृहस्थ जीवन को त्याग कर भगवान की भक्ति और भजन में रम गए। लेकिन शिलाद मुनि के पूर्वजों को यह बात परेशान कर रही थी कि अगर शिलाद मुनी को कोई संतान नहीं हुई तो फिर पूर्वजों को पानी देने वाला कोई नहीं बचेगा। पूर्वजों ने शिलाद मुनि को अपनी चिंता के बारे में अवगत कराया, तो शिलाद मुनि ने निश्चय किया की वह तप से पुत्र प्राप्त करेंगे। लेकिन शादी तो नही करेंगे क्योंकि उन्होंने ब्रम्हचर्य का व्रत ले लिया हैं। इसलिए मुनि इंद्र की कठोर तपस्या करने लगे मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। तब मुनि ने एक ऐसे बालक की इच्छा जाहिर की जो कभी मृत्यु को प्राप्त ना हो। तथा सभी प्रकार के दुख और संताप से वह बालक मुक्त होना चाहिए। इंद्र ने मुनि को बताया कि इस प्रकार के वरदान को देने की शक्ति उनके अंदर नहीं है लेकिन भगवान शिव इस तरह के वरदान को आपको बड़ी आसानी से दे देंगे। यह सुनकर शिलाद मुनि भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे। भगवान शिव मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें एक जरा, जन्म और मृत्यु से रहित बालक का वरदान दिया। और अंतर्ध्यान हो गए। एक बार मुनि आश्रम के निकट एक भूमि को जोत रहे थे, तभी उन्हें एक बहुत ही सुंदर बालक भूमि से प्राप्त हुआ। मुनि ने जब उस बालक को अपनी गोद में उठाया तब आकाशवाणी हुई और आकाशवाणी ने कहा कि हे मुनि यह बालक तुम्हारा ही है। मुनि उस बालक को अपने आश्रम में आए और उसका नाम नंदी रखा। समय के साथ साथ नंदी नाम का वह बालक बड़ा होने लगा तभी एक दिन दो सिद्ध महात्मा शिलाद मुनि के आश्रम आए। उन दोनों महात्मा का मुनि तथा नंदी ने खूब स्वागत और सत्कार किया। जब दोनों महात्मा आश्रम से विदा लेने लगे तो उन्होंने नंदी के पिता यानी कि शिलाद मुनि को दीर्घायु रहने का वरदान दिया लेकिन नंदी के लिए उन दोनों ने एक शब्द भी नहीं कहा। नंदी के पिता को यह बात में बहुत ही आश्चर्य हुआ इसलिए उन्होंने दोनो महात्माओं से इसका कारण पूछा। तब दोनों महात्मा जनों ने बताया कि तुम्हारे पुत्र नंदी की आयु बहुत कम है इसलिए हमने इसे दीर्घायु का आशीर्वाद नहीं दिया। नंदी को जब अपने अल्पायु होने के बारे में पता चला तो उन्हें बहुत दुख हुआ क्योंकि जिस मनोरथ की पूर्ति के लिए उनका जन्म हुआ था वह उनकी मृत्यु के बाद अधूरा रह जाएगा। नंदी जी का जन्म उनके पूर्वजों की सेवा के लिए हुआ था इसलिए नंदी जी भगवान शिव की कठोर तपस्या करने के लिए नंदी पर्वत चले गए और वहां पर उन्होंने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की। भगवान शिव नंदी जी के कठोर तपस्या से बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें दीर्घायु होने का वरदान दिया तथा नंदी जी को अपना मित्र और कैलाश का द्वारपाल भी बनाया। इसके साथ-साथ नंदी जी सभी शिव गणों के अध्यक्ष भी हैं।

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नंदी को क्या खिलाना चाहिए

नंदी बाबा को सोमवार के दिन केला या फिर बतासा खिलाना चाहिए। इसके अलावा नंदी जी को छोटी छोटी पूड़ी और हलवा का प्रसाद भी चढ़ाया जा सकता है। हरी घास अगर मिल सके तो सोमवार के दिन किसी गली चौराहे में नंदी बाबा को हरी घास खिलाने से बहुत पुण्य मिलता है और सभी प्रकार के मनोरथ सिद्ध होते हैं।

नंदी का मुख किस दिशा में होना चाहिए

नंदी जी का मुख हमेशा शिव मंदिर की दिशा में होना चाहिए। भारत में जहां-जहां भी भगवान शंकर के मंदिर हैं उन मंदिर के बाहर नंदी जी को भी स्थापित किया गया है जिनका मुख भगवान शंकर की मंदिर की तरफ ही रहता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार भी नंदी जी का मुख हमेशा भगवान शंकर जहां पर स्थापित होते हैं उसी दिशा में होना चाहिए।

कभी भी नंदी जी का मुख भगवान शंकर के उल्टी तरस नहीं होता है। नंदी जी भगवान शंकर के द्वारपाल भी हैं इसलिए नंदी जी को मंदिर के बाहर स्थापित करना चाहिए और उनका मुख शंकर भगवान की मंदिर की तरफ करना चाहिए। इसके साथ यह भी ध्यान रखें की नंदी जी जहां पर होते हैं वहां पर भगवान शिव भी मौजूद होते हैं क्योंकि भगवान शिव ने स्वयं नंदी जी को यह वरदान दिया है कि जहां भी तुम निवास करोगे मैं भी तुम्हारे साथ वही रहूंगा। इसलिए जब मंदिर का निर्माण किया जाता है तो भगवान शंकर के साथ-साथ नंदी महाराज को भी स्थापित किया जाता है।

नंदी के कान में क्या बोलना चाहिए

ऐसा माना जाता है कि नंदी जी के कान में अगर चुपचाप किसी प्रकार की मनोकामना मांगी जाए तो वह जल्दी पूरी होती है। नंदी जी के काम में मांगी गई मनोकामना का अर्थ यह है कि नंदी जी हमारी तरफ से उस मनोकामना को भगवान शिव के सामने प्रस्तुत करेंगे और जो भी बात नंदी महाराज भगवान शिव के सामने प्रस्तुत करेंगे भगवान शिव उस बात को काटेंगे नहीं। इसीलिए भक्तगण भगवान शिव से मनोकामना तो मानते ही हैं इसके साथ ही नंदी जी के काम में भी अपनी मनोकामना मांगते हैं। लेकिन नंदी जी के कान में मनोकामना कहने के कुछ नियम है जो कि निम्न प्रकार से है।

  1. नंदी जी से मनोकामना मांगने के पहले उनकी पूजा करनी चाहिए उसके बाद ही नंदी जी के कान में अपनी मनोकामना कहीं चाहिए।
  2. नंदी जी के कान में मनोकामना कहने से पहले यह सुनिश्चित करें कि जो भी मनोकामना आप मानने वाले हैं वह नंदी जी के बाएं कान में ही बोले।
  3. नंदी जी के कान में मनोकामना कहते समय इस बात का जरूर ध्यान रखें कि आसपास कोई दूसरा व्यक्ति आपकी मनोकामना को ना सुन पाए।
  4. जब भी नंदी जी के कान में अपनी मनोकामना बोले उस वक्त अपने होंठ को अपने दोनों हाथों से ढक लेना चाहिए जिससे कोई यह ना देख पाए कि आप क्या बोलने का प्रयास कर रहे हैं।
  5. नंदी जी के कान में मनोकामना बोलते समय यह ध्यान रखें कि आप किसी की बुराई ना करें।
  6. नंदी जी के कान में मनोकामना कहने के बाद गांधी जी को प्रणाम करें और उन्हें कुछ भेंट अर्पित करें जैसे कि फल और प्रसाद आदि।
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नंदी की पूजा कैसे करें

जब भी किसी से मंदिर में जाएं तो भगवान शंकर को जल अभिषेक करने के बाद नंदी जी के समक्ष दीपक जलाना चाहिए तथा नंदी महाराज की आरती करनी चाहिए आरती करने के बाद नंदी जी के कान में अपनी मनोकामना बोलनी चाहिए तथा उस मनोकामना को किसी और को नहीं बताना चाहिए। भगवान शंकर की पूजा करने के बाद नंदी जी की पूजा करना अनिवार्य होता है। जहां भी होते हैं वहां पर नंदी जी विराजमान जरूर होते हैं। नंदी जी कैलाश पर्वत के द्वारपाल हैं तथा सभी बड़ों के अध्यक्ष भी हैं।

सपने में नंदी देखना

सपने में नंदी देखने का मतलब है कि भगवान शिव आप पर प्रसन्न हैं और आने वाले समय में आपके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे तथा उनमें किसी भी प्रकार की कोई बाधा नहीं आएगी। जिन व्यक्तियों को सपने में नंदी दिखे उन्हें सोमवार के दिन भगवान शंकर को दूध से स्नान कराना चाहिए और नंदी जी को प्रसाद में केला अर्पित करना चाहिए।

नंदी पहाड़ी कहां स्थित है

नंदी पहाड़ी कर्नाटक के चिकबल्लपुर में स्थित एक बहुत ही लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। इस पहाड़ी से अरकावती नाम की नदी का उद्गम होता है। अंग्रेजी में इसे नंदीहिल्स के नाम से भी जाना जाता है। यह पहाड़ी चिकबलपुर शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित हैं। बेंगलुरु से इस नंदी पहाड़ी की दूरी लगभग 45 किलोमीटर है।

नंदी हिल कर्नाटक में अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। आसपास के लोग छुट्टी के दिनों में यहां घूमने के लिए आते हैं। इसके साथ ही यहां पर कई दर्शनिक मंदिर भी हैं। इस पहाड़ का नाम भगवान शंकर के द्वारपाल नंदी के नाम पर रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि नंदी ने यहां पर भगवान शंकर की तपस्या की थी।

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