कृष्ण जन्मअष्टमी की कथा || कृष्ण जन्म का रहस्य || जनमाष्टमी विशेष || KrishnaJanm Ashtami Katha

कृष्ण जन्मअष्टमी की कथा || कृष्ण जन्म का रहस्य || Happy Janmasthami 2021

जब भी विश्व में दुष्ट और राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों का कुशासन चालू हो जाता है, और सामान्य एवं निर्दोष जनता ऐसे राक्षसी प्रवृत्ति वाले शासकों के चंगुल में फँसती है तब भगवान को स्वयं अपने भक्तों एवं निर्दोष जनता की रक्षा के लिए किसी न किसी रूप में जन्म लेना पड़ता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु कई बार अवतार लेकर जनता एवं भक्तों के कष्टों का निवारण किया है. ठीक इसी प्रकार द्वापर युग में भी लगातार पाप अपनी सीमाओं को लगातार बढ़ा रहा था. जिसके चलते आम जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई थी. उनके कष्टों को निवारण करने के लिए भगवान विष्णु इस बार कृष्ण के रूप में जन्म लिया. इसलिए कृष्ण भगवान के जन्मदिन को जन्माष्टमी के नाम से सारे संसार में प्रतिवर्ष बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है

इस बार Happy Janmasthami 2021 अगस्त के महीने मे हैं। इस बार 31 अगस्त 2021 को janmasthami मनाया जाएगा।

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बाल कृष्ण का जन्म कब और कहाँ हुआ था? baal krishna ka janm kab aur kahan huaa tha?

भगवान कृष्ण का जन्म भद्रपद महीने के कृष्ण अष्टमी तिथि को घनघोर अंधेरी रात में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था तब उनकी माता देवकी तथा उनके पिता वसुदेव जी कंस के दुराचार को सहते हुए काल कोठरी में बंद थे. यह जेल मथुरा मे स्थिति थी, भगवान श्री कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था. उस समय मथुरा में भोजवंश के राजा श्री उग्रसेन जी का शासन एवं राज्य था लेकिन उग्रसेन के आताताई पुत्र कंस ने उग्रसेन से राजपाट छीन कर जेल में डाल दिया था और स्वयं मथुरा का शासक बन गया था.

कृष्ण की माता एवं पिता जेल में क्यों बंद थी? krishna ki mata evam pita jel ke kyu band the?

देवकी कंस की बहन थी, कंस अपनी बहन देवीकी से बहुत थी प्रेम करता था, और वह बहुत ही देवकी का सम्मान करता था. उसने बड़ी खुशी के साथ अपनी बहन देवकी का ब्याह यदुवंशी सरदार वसुदेव जी के साथ किया, तथा अपनी बहन के सम्मान में खुद रथ का सारथी बनकर अपनी बहन और बहनोई को उनके घर पहुंचाने के लिए निकल पड़ा,

जब कंस रथ को चलाते हुए जा रहा था जिसमें उसकी बहन देवकी और बहनोई वासुदेव जी थे, तभी बड़े घनघोर गरज के साथ आकाशवाणी हुई, जिसमें आकाशवाणी ने कंस को चेतावनी दी कि तू जिस बहन के लिए इतना प्रेम दर्शा रहा है, उसी बहन की आठवीं संतान तेरी मृत्यु का कारण बनेगी. और कंस उसी समय भयभीत होकर देवी की को मार देना चाहता था, परंतु आकाशवाणी में फिर उसे चेतावनी दी, कि जो अटल है उसे टाला नहीं जा सकता, अगर तू देवकी को मारने का प्रयास करेगा, तो तेरी मृत्यु आज और अभी सकती है, इसलिए कंस ने फिर देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया. और जब भी उनकी कोई संतान जन्म लेती, तो कंस अपने हाथों से देवकी के नवजात शिशुओं को जमीन पर पटक कर मार देता था. अगर देवकी और वसुदेव जी कारागार में नहीं होते तुम्हें किसी ना किसी तरीके से अपने संतानों की रक्षा कर लेते, इसी भय के चलते कंस ने अपनी बहन एवं बहनोई को कारागार में बंद किया हुआ था.

कृष्ण भगवान जन्म के तुरंत बाद कंस से कैसे बचें? krishna bhagvaan janm ke turant baad kans se kaise bache?

भद्रपद का महीना चल रहा था, कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्य रात्रि में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, उस समय सभी लोग गहरी नींद में थे, खूब जोरों की बारिश हो रही थी, शीतलता का मौसम था जिसकी वजह से लोग बड़ी ही सुविधा के साथ गहरी नींद में सो रहे थे. जैसे ही कृष्ण भगवान का जन्म हुआ तो उस समय कारागार के सभी सैनिक एवं सेनापति सो रहे थे, सभी दरवाजे अपने आप ही खुल गए. और वसुदेव जी के मन में अपने बच्चे को बचाने की तीव्र इच्छा जगी, और माया के प्रभाव से उन्होंने अपने बच्चे श्रीकृष्ण को एक टोकरी में रखकर जेल से बाहर निकल पड़े और गोकुल के लिए उन्होंने यमुना पार करने लगे, इस दौरान यमुना भगवान कृष्ण के चरणों को छूने के लिए लालायित हो पड़ी, और उसने अपने स्तर को बढ़ाना चालू कर दिया, वासुदेव जी 15 किलोमीटर चलते हुए यमुना को पार किए, इस दौरान कई बार यमुना का पानी उनके सर के ऊपर तक पहुंच जाया करता था. यमुना पार करके वासुदेव जी गोकुल के मुखिया नंदलाल जी के यहां गए, जैसा की माया ने उन्हें प्रेरणा दी थी, नंदलाल जी के यहां उसी दिन उनकी पत्नी यशोदा जी ने एक कन्या को जन्म दिया था यह कन्या और कोई नहीं बल्कि खुद माया थी, जो कन्या के रूप में जन्म ली थी. वसुदेव जी ने अपने पुत्र कृष्ण को यशोदा जी के बगल में रख दिया और उस छोटी कन्या को उठाकर टोकरी में रख लिया और वापस कारागार लौट आए, उनके वापस लौट आने पर सभी सैनिक होश में आ गए, और उन्होंने देखा की देवकी जी के बगल में एक बच्चा रुदन कर रहा है. सैनिकों ने तुरंत कंस को सूचना दी, कंस कारागार में आकर देवकी के बगल में लेटी उस कन्या को उठाकर जैसे ही पटकने वाला होता है, वह कन्या कंस के हाथ से छूट कर हवा में उड़ जाती है, और देवी माया का रूप ले लेती है. बहुत जोरों से हंसते हुए माया देवी, कंस को बोलती है, हे दुष्ट! तुझे मारने वाला देवकी का आठवां पुत्र जन्म ले चुका है. और यह बोलकर वह अंतर्ध्यान हो जाती हैं

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कृष्ण ने पूतना का वध कैसे किया? krishna ne putna ka vadh kaise kiya?

जब कंस के जासूसों ने बताया की गोकुल गांव में कई बच्चों ने जन्म लिया है, और संभव है की देवीकी की आठवीं संतान गोकुल मे ही कहीं छिपा हो सकता है, तब कंस ने कई राक्षसों को गोकुल में उपद्रव करने के लिए भेजा था, लेकिन चमत्कारी रूप से वह सभी राक्षस मारे गए। राक्षसों के मारे जाने की खबर सुनकर उसको लगने लगा कि गोकुल में कोई चमत्कारिक शक्ति जरूर है जो महा बलवानी राक्षसों को मार रहा है। इसलिए कंस ने अपनी मुंह बोली बहन पूतना को बुलाया, और उस चमत्कारिक शक्ति को ढूंढने के लिए पूतना को गोकुल गांव भेज दिया। कंस ने पूतना को स्पष्ट आदेश दिया कि जिस पर भी उसे शक हो उसे जिंदा ना छोड़ा जाए। पूतना एक मायावी और रूप बदल लेने में सक्षम राक्षसी थी। वह एक सुंदर स्त्री का रूप धारण करके गांव में घूमने लगी। भटकते भटकते वह नंद बाबा के घर जा पहुंची, जहां कृष्ण जन्म का उत्सव मनाया जा रहा था, पूतना ने कृष्ण भगवान को अपने गोद मे उठा कर ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी और हवा मे उड़ गई। पूरे गाँव मे शोर मच गया, लोग डर के मारे यहाँ- वहाँ भागने लगे। पूतना अपने स्तन मे जहर लगाए हुई थी, उसने कृष्ण भगवान को दूध पिलाने लगी, लेकिन थोड़ी ही देर बाद, पूतना को असहनीय दर्द का एहसास हुआ और वो जोरों से रोने एवं चिल्लाने लगी। इधर कृष्ण भगवान पूतना के प्राण खीच रहे थे और अंत मे पूतना ने दम तोड़ दिया। पूतना नीचे जमीन मे आगिरी और कृष्ण भगवान वही पास ही घाँस मे लेते लेते खेलने लगे। समस्त गोकुल वासी उन्हे खोजते हुये वहाँ पहुंचे तो नन्द बाबा जी ने जल्दी से बाल कृष्ण को गोद मे उठा लिया।

तृणावर्त का वध बाल कृष्ण ने कैसे किया? trinaavart ka vadh baal krishna ne kaise kiya?

जब कंस को पता चला की बालकृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध कर दिया है। तब कंस ने एक राक्षस को कृष्ण को मारने के लिए गोकुल भेजा। इस राक्षस का नाम तृणावर्त  था, यह राक्षस बवंडर यानी कि बहुत बड़ा तूफान बना सकता था, इस तूफान को लंगडी आंधी भी कहते हैं। तृणावर्त  बवंडर का रूप लेकर गोकुल की ओर बढ़ने लगा, और जहां जहां से वह गुजरता वहां वह भारी तबाही मचाता था। बड़े-बड़े पेड़ों को उखाड़ देता था, घरों को उजाड़ देता था, तालाबों को सोख लेता था। जब वह नंद बाबा के घर पहुंचा, तो उसने बालकृष्ण को अपने साथ उड़ा ले गया। लेकिन जल्दी उसके समझ में आ गया कि यह बालक कोई साधारण बालक नहीं है, बल्कि इसमें कोई दैवीय शक्ति है। बालकृष्ण अपने वजन को बढ़ाने लगे, और तृणावर्त  अब बालकृष्ण के वजन को संभाल नहीं पा रहा था। और जब तृणावर्त  थक हार गया, तो उसने बवंडर को समाप्त कर दिया। जैसे ही तृणावर्त  ने बवंडर को समाप्त किया, बालकृष्ण ने उस राक्षस के गले को पकड़ लिया और धीरे-धीरे बालकृष्ण का शिकंजा कस्ता गया, जिससे राक्षस तृणावर्त  का वध हो गया।

वत्सासूर का वध बाल कृष्ण ने कैसे किया? vatsaasur ka vadh baal krishna ne kaise kiya?

कंस अब बालकृष्ण से डरने लगा था, और उसे यह विश्वास हो गया था की नंद का पुत्र कृष्ण ही वह बालक है जो कंस को मारेगा। इसलिए वह नंद के पुत्र कृष्ण को मारने के लिए लगातार षड्यंत्र करता रहता था। तृणावर्त  के मारे जाने के बाद कंस कुछ समय के लिए अपनी योजनाओं को रोक दिया, लेकिन कुछ वर्ष बीतने के बाद उसने अपने एक राक्षस मित्र को गोकुल भेजा, और उस राक्षस को समझा दिया की किसने को मारे बिना वापस ना आए। इस राक्षस का नाम वत्सासूर था। वत्सासूर ने एक बछड़े का रूप धारण कर लिया, और कृष्ण की गायों की झुंड में जाकर मिल गया। कृष्ण उस समय अपनी गायों को चरा रहे थे, जैसे ही उनकी नजर उस बछड़े पर पड़ी वह पहचान गए कि यह एक दैत्य है जो रूप बदल कर यहां पर विचरण कर रहा है। कृष्ण उसके पास जाकर, उसकी पूछ पकड़ लेते हैं, और मस्ती करते हुए गोल गोल घूमने लगते हैं। और खेल-खेल में ही कृष्ण ने उस बछड़े को उठाकर वृक्ष पर पटक दिया, और उस राक्षस का वहीं पर वध हो गया और वह अपने असली रूप पर आ गया।

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भगवान कृष्ण ने कैसे किया अगसुर का वध?

अगासुर हिंदू और वैदिक शास्त्रों में एक राक्षस है। वह मथुरा के राजा कंस के सेनापतियों में से एक थे, [१] [२] दानव पूतना और बकासुर के बड़े भाई।

राजा कंस ने कृष्ण के जीवन पर कई प्रयास किए, वे सभी असफल रहे। फिर उसने कृष्ण को मारने के लिए अघासुर को भेजा, जिसने स्वेच्छा से यह जानकर कि उसके छोटे भाई पूतना और बकासुर को कृष्ण ने मार डाला था। उन्होंने एक पहाड़ के खिलाफ अपने खुले मुंह को छिपाने के लिए 8 मील लंबे सांप का रूप धारण किया। सभी चरवाहे लड़के एक गुफा समझकर राक्षस के मुंह में प्रवेश कर गए। जब सांप अपना मुंह बंद कर लेता है, तो लोग सांस नहीं ले पाएंगे और अंत में उनकी मृत्यु हो जाती है।

उनके आने पर कृष्ण ने नाग में प्रवेश किया और फिर अपने शरीर का आकार बढ़ाया। जवाब में, दानव ने भी अपने शरीर का आकार बढ़ाया। इसके बावजूद उनकी सांस थम गई। दम घुटने से उसकी आंखें इधर-उधर लुढ़क गईं और फिर बाहर निकल गईं। हालाँकि, दानव की जीवन शक्ति किसी भी आउटलेट से नहीं गुजर सकती थी, और इसलिए यह अंत में अगासुर के सिर के शीर्ष में एक छेद से बाहर निकल गई। इस प्रकार, राक्षस का अंत कृष्ण के हाथ में होता है।

भगवान कृष्ण किस वंश के थे? bhagvaan krishna kis vansh ke the?

राजा ययाति के दो संताने थी। उनका नाम यदु और कुरु था। महाभारत के भीष्म पितामह, धृतराष्ट्र दुर्योधन पांडू आदि यह सब कुरु वंश के थे। और यदु के बस आगे चलकर यादव वंश कहलाया। राजा ययाति ने मुंह में फंस कर अपने पुत्रों से उनकी जवानी मांगी थी, यदु ने अपनी पितृ भक्ति दिखाते हुए अपनी जवानी अपने पिता को दे दी थी। किसी अनबन की वजह से यदु को श्राप मिल गया था किसके वंशज कभी भी राजगद्दी नहीं। और सत्ता राजा ययाति के पुत्र कुरु को मिल गई थी, कुरु और यदुवंशी दोनों ही एक ही वंश से थे, और चंद्रवंशी कहलाते थे। जबकि भगवान श्री राम सूर्यवंशी वंश के थे। प्राचीन काल में दो बंधुओं को बहुत ही प्रमुख माना गया है, सूर्यवंश और चंद्रवंश। कृष्ण भगवान चंद्रभान से संबंधित थे, और राजा ययाति के पुत्र यदु के वंशज हुए।

भगवान कृष्ण की बहन कौन थी? bhagvaan krishna ki bahan kaun thi?

चार बहनों का वर्णन मिलता है, यशोदा जी की एक पुत्री थी जिनका नाम एकांकी था। इन्होंने एकांत धारण कर लिया था, और यादव वंश के लोग इनको अपनी कुल माता के रूप में आज भी पूछते हैं, इसके अलावा कृष्ण भगवान की एक बहन सुभद्रा जी भी हैं, सुभद्रा जी कृष्ण भगवान की सौतेली मां रोहिणी की पुत्री हैं, रोहिणी जी के दो संताने थी, बलराम और सुभद्रा, सुभद्रा कृष्ण भगवान की प्रिय बहन थी और कृष्ण भगवान ने उनका विवाह अपने प्रिय मित्र अर्जुन के साथ कर दिया था। इसके अलावा महामाया भी कृष्ण भगवान की बहन है, जब वासुदेव जी कृष्ण भगवान को बदलने के लिए नंद बाबा के घर आए थे, तो उस समय यशोदा जी ने महामाया को पुत्र के रूप में जन्म दिया था। इसके अलावा भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को भी अपनी बहन माना है,

भगवान कृष्ण ने कंस का वध कैसे किया? bhagvaan krishna ne kans ka vadh kaise kiya?

कृष्ण और बलराम ने मथुरा नगर के भव्यता के रे में बहुत ही प्रसिद्धि सुन चुके थे। जैसे ही कृष्ण और बलराम मथुरा में प्रवेश करते हैं, उनके मन में उत्सुकता के सागर हिलोरे खाने लगे। मथुरा वासियों मे कृष्ण कृष्ण को लेकर बहुत उत्सुकता थी, बहुत तेरे मथुरा वासी कृष्ण के प्रति स्नेह और सम्मान का भाव रखते थे। कृष्ण कंस के शस्त्रागार में घूमते घूमते पहुंचे, वहां के रक्षकों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, पर वह कृष्ण से ना जीत पाए और हार गए। वहीं पर शिव धनुष रखा हुआ था, जिसे दिव्य लोगों के अलावा कोई भी उठा नहीं सकता था। जब कृष्ण ने धनुष उठाने की इच्छा जाहिर की, तो वहां पर मौजूद नगरवासी कृष्ण पर हंसने लगे। लेकिन जैसे ही कृष्ण ने धनुष को उठाया वाह धनुष टूट गया, यह देख वहां के लोग दंग रह गए, यह खबर पूरे मथुरा में बिजली की तरह फैल गई। कंस को जब यह बात पता चली तो वह और घबरा गया। कंस ने चारूण और मुष्टिक नाम के पहलवानों को और बलराम के वध के लिए भेजा। इसके अलावा कंस ने एक मतवाले हाथी को भी कृष्ण और बलराम की हत्या के लिए भेजा था पर दोनों भाइयों ने उस मतवाले हाथी अक्ल को ठिकाने लगा दिया, और उसका वध कर दिया। उसी प्रकार कृष्णा और बलराम ने कंस के द्वारा भेजें पहलवानों को भी पराजित कर दिया। कृष्ण के इन कारनामों को देखने और सुनने के बाद कंस के समर्थकों में डर और भय व्याप्त हो गया। और वह यहां वहां भागने लगे। इसी भगदड़ के दौरान कृष्ण ने कंस की ओर गए, और कंस के साथ द्वंद युद्ध करने लगे। इसी दौरान आखिर किसने दुराचारी राजा कंस का वध कर दिया। यह खबर फैलते ही पूरे मथुरा में कृष्ण की जय जयकार होने लगी।

भगवान कृष्ण के सौ नाम कौन से हैं? bhagvaan krishna ke 100 naam kya hain?

मान्यता है कि जो भगवान के 100 नामों का जाप करता है, भगवान उसके सभी कष्टों को धीरे हर लेते हैं। उसे बुद्धि, विवेक और बल प्रदान करते हैं। तो भगवान कृष्ण के वह 100 नाम कौन से हैं, जिनके जब से यह कष्ट दूर हो जाते हैं, तो आइए जानते हैं वह सौ नाम
श्रीकृष्ण के 108 नाम

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1. कृष्ण 2. कमलनाथ 3. वासुदेव
4. सनातन 5. वसुदेवात्मज 6. पुण्य
7. लीलामानुष विग्रह 8. श्रीवत्स कौस्तुभधराय 9. यशोदावत्सल
10. हरि 11. चतुर्भुजात्त चक्रासिगदा 12. सङ्खाम्बुजा युदायुजाय
13. देवाकीनन्दन 14. श्रीशाय 15. नन्दगोप प्रियात्मज
16. यमुनावेगा संहार 17. बलभद्र प्रियनुज 18. पूतना जीवित हर
19. शकटासुर भञ्जन 20. नन्दव्रज जनानन्दिन 21. सच्चिदानन्दविग्रह
22. नवनीत विलिप्ताङ्ग 23. नवनीतनटन 24. मुचुकुन्द प्रसादक
25. षोडशस्त्री सहस्रेश 26. त्रिभङ्गी 27. मधुराकृत
28. शुकवागमृताब्दीन्दवे 29. गोविन्द 30. योगीपति
31. वत्सवाटि चराय 32. अनन्त 33. धेनुकासुरभञ्जनाय
34. तृणी-कृत-तृणावर्ताय 35. यमलार्जुन भञ्जन 36. उत्तलोत्तालभेत्रे
37. तमाल श्यामल कृता 38. गोप गोपीश्वर 39. योगी
40. कोटिसूर्य समप्रभा 41. इलापति 42. परंज्योतिष
43. यादवेंद्र 44. यदूद्वहाय 45. वनमालिने
46. पीतवससे 47. पारिजातापहारकाय 48. गोवर्थनाचलोद्धर्त्रे
49. गोपाल 50. सर्वपालकाय 51. अजाय
52. निरञ्जन 53. कामजनक 54. कञ्जलोचनाय
55. मधुघ्ने 56. मथुरानाथ 57. द्वारकानायक
58. बलि 59. बृन्दावनान्त सञ्चारिणे 60. तुलसीदाम भूषनाय
61. स्यमन्तकमणेर्हर्त्रे 62. नरनारयणात्मकाय 63. कुब्जा कृष्णाम्बरधराय
64. मायिने 65. परमपुरुष 66. मुष्टिकासुर चाणूर मल्लयुद्ध विशारदाय
67. संसारवैरी 68. कंसारिर 69. मुरारी
70. नाराकान्तक 71. अनादि ब्रह्मचारिक 72. कृष्णाव्यसन कर्शक

 
73. शिशुपालशिरश्छेत्त
74. दुर्यॊधनकुलान्तकृत
75. विदुराक्रूर वरद
76. विश्वरूपप्रदर्शक
77. सत्यवाचॆ
78. सत्य सङ्कल्प
79. सत्यभामारता
80. जयी
81. सुभद्रा पूर्वज
82. विष्णु
83. भीष्ममुक्ति प्रदायक
84. जगद्गुरू
85. जगन्नाथ
86. वॆणुनाद विशारद
87. वृषभासुर विध्वंसि
88. बाणासुर करान्तकृत
89. युधिष्ठिर प्रतिष्ठात्रे
90. बर्हिबर्हावतंसक
91. पार्थसारथी
92. अव्यक्त
93. गीतामृत महोदधी
94. कालीयफणिमाणिक्य रञ्जित श्रीपदाम्बुज
95. दामॊदर
96. यज्ञभोक्त
97. दानवॆन्द्र विनाशक
98. नारायण
99. परब्रह्म
100. पन्नगाशन वाहन
101. जलक्रीडा समासक्त गॊपीवस्त्रापहाराक
102. पुण्य श्लॊक
103. तीर्थकरा
104. वॆदवॆद्या
105. दयानिधि
106. सर्वभूतात्मका
107. सर्वग्रहरुपी
108. परात्पराय

कृष्ण भगवान और माता रुक्मणी

रुक्मिणी एक हिंदू देवी और कृष्ण की पहली रानी पत्नी हैं। उन्हें विष्णु की पत्नी लक्ष्मी के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। विदर्भ राज्य के राजा भीष्मक के घर जन्मी, रुक्मिणी को सुंदर, बुद्धिमान और गुणी बताया गया है। जब उसके भाई रुक्मी ने शिशुपाल से जबरदस्ती उसकी शादी कराने की कोशिश की, तो उसने कृष्ण से उसका अपहरण करने के लिए कहा। कृष्ण वीरतापूर्वक उसके साथ भाग गए और उनके प्रद्युम्न सहित दस बच्चे थे। रुक्मिणी की पूजा मुख्य रूप से महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में की जाती है। महाराष्ट्र के लोग उन्हें विठोबा (कृष्ण का एक क्षेत्रीय रूप) से सम्मानित करते हैं और उन्हें रखुमाई कहते हैं। दक्षिण भारत में, उन्हें कृष्ण और उनकी सह-पत्नी सत्यभामा के साथ पूजा जाता है।

कृष्ण भगवान और सत्यभामा का विवाह

सत्यभामा द्वारका के शाही कोषाध्यक्ष यादव राजा सत्रजित की बेटी थी, जो स्यामंतक रत्न के मालिक थे। सत्रजित, जिसने सूर्य से हीरा प्राप्त किया था और द्वारका के राजा कृष्ण ने यह कहते हुए इसके लिए कहा था कि यह उसके पास सुरक्षित रहेगा, तब भी वह उसे नहीं छोड़ेगा। इसके कुछ ही समय बाद, सत्रजित का भाई प्रसेन मणि पहनकर शिकार के लिए निकला, लेकिन एक शेर ने उसे मार डाला। रामायण में अपनी भूमिका के लिए जाने जाने वाले जाम्बवन ने शेर को मार डाला और अपनी बेटी जाम्बवती को हीरा दे दिया। जब प्रसेन वापस नहीं लौटा, तो सत्रजीत ने कृष्ण पर गहना के लिए प्रसेन को मारने का झूठा आरोप लगाया।

कृष्ण, अपनी प्रतिष्ठा पर लगे दाग को हटाने के लिए, अपने आदमियों के साथ गहना की तलाश में निकल पड़े और उसे अपनी बेटी के साथ जाम्बवन की गुफा में मिला। जाम्बवान ने कृष्ण को एक घुसपैठिया समझकर हमला किया जो गहना लेने आया था। वे 28 दिनों तक एक-दूसरे से लड़े, जब जाम्बवन, जिसका पूरा शरीर कृष्ण की तलवार के चीरों से बहुत कमजोर हो गया था, ने आखिरकार उसे राम के रूप में पहचान लिया और भगवान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

कृष्ण से युद्ध करने के लिए पश्चाताप के रूप में, जाम्बवन ने कृष्ण को रत्न और उनकी बेटी जाम्बवती को विवाह में दिया। कृष्ण ने वह गहना सत्रजीत को लौटा दिया, जिसने बदले में अपने झूठे आरोप के लिए माफी मांगी। उन्होंने तुरंत कृष्ण को रत्न और उनकी बेटी सत्यभामा को शादी में देने की पेशकश की। कृष्ण ने उन्हें स्वीकार कर लिया लेकिन गहना से इनकार कर दिया।[1]

कृष्ण के साथ सत्यभामा के 10 पुत्र थे – भानु, स्वाभानु, सुभानु, भानुमान, प्रभानु, अतिभानु, प्रतिभानु, श्रीभानु, बृहदभानु और चंद्रभानु। [२] [३]

कृष्ण और जामवंती की शादी की कथा

जाम्बवती, एक संरक्षक, का अर्थ है जाम्बवन की बेटी। जाम्बवन या जाम्बवत हिंदू महाकाव्य रामायण में वानर-राजा सुग्रीव के सलाहकार के रूप में प्रकट होते हैं, जिन्होंने राम, कृष्ण के पिछले मानवीय रूप की सहायता की थी। यद्यपि उन्हें अक्सर यहाँ एक सुस्त भालू के रूप में वर्णित किया जाता है, उन्हें बंदरों के साथ भी पहचाना जाता है क्योंकि उनका स्वभाव गोरिल्ला, चिम्पांजी या यहां तक कि बंदरों के समान या समान होता है। [४] [५] महाकाव्य महाभारत में, जाम्बवन को जाम्बवती के पिता के रूप में पेश किया गया है। [3] भागवत पुराण और हरिवंश उन्हें भालुओं का राजा कहते हैं।[3][6] जाम्बवंती द्वापर युग में द्वारका के राजा हिंदू भगवान कृष्ण की दूसरी पत्नी हैं। वह भालू-राजा जाम्बवन की इकलौती बेटी थी। कृष्ण ने उससे विवाह किया, जब उसने चोरी हुए स्यामंतक रत्न को पुनः प्राप्त करने के लिए जाम्बवन को हराया।[1]