सावन के महीने को शिव भगवान का प्रिय महिना माना जाता हैं, शास्त्रों के अनुसार भगवान शिवजी को खुश करने के लिए उनके भक्त सावन के महीने में कई तरह की पूजा पाठ करते हैं। उन्हें में से एक है सावन के महीने में शिवलिंग पर दूध चढ़ाना। शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के पीछे कई धार्मिक मान्यताएं हैं। लेकिन बहुत ही कम लोगो को पता हैं की शिव जी को दूध चढ़ने का वैज्ञानिक कारण भी हैं, हिन्दू को अपने धर्म का ज्ञान ना होने की वजह से और वामपंथी लोगो का देश के इतिहास एवं शिक्षा सुधार समितियों मे पकड़ होने की वजह से यह बाते लोगो तक कम ही पहुँच पाई हैं। वामपंथियों ने हमेशा सनातन धर्म के अच्छाइयों को दबाने का काम किया हैं। तो आइये सावन मे शिव जी को दूध क्यो चढ़ाया जाना प्रारम्भ हुआ उसके वैज्ञानिक कारण को जानते हैं।

कारण –

भगवान शिव एक अकेले ऐसे देव हैं जिनकी शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाता है। शिव भगवान दूसरों के कल्याण के लिए हलाहल विषैला दूध भी पी सकते हैं। शिव जी संहारकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का नाश होता है, मतलब जो विष है, वो सब कुछ शिव जी को भोग लगता है। पुराने जमाने में जब श्रावण मास में हर जगह शिव रात्रि पर दूध चढ़ता था, तब लोग समझ जाया करते थे कि इस महीने में दूध विष के सामान है और वे दूध इसलिये त्‍याग देते हैं कि कहीं उन्‍हें बरसाती बीमारियां न घेर ले।

अगर आयुर्वेद के नजरिये से देखा जाए तो सावन में दूध या दूध से बने खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिये क्‍योंकि इसमें वात की बीमारियाँ सबसे ज्यादा होती हैं। शरीर में वात-पित्त-कफ इनके असंतुलन से बीमारियाँ पैदा होती हैं। श्रावण के महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात बढ़ता है। तभी हमारे पुराणों में सावन के समय शिव को दूध अर्पित करने की प्रथा बनाई गई थी क्‍योंकि सावन के महीने में गाय या भैंस घास के साथ कई कीडे़-मकौड़ों का भी सेवन कर लेते हैं। जो दूध को हानिकारक बना देत है इसलिये सावन मास में दूध का सेवन न करते हुए उसे शिव को अर्पित करने का विधान बनाया गया है।

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एतिहासिक या पौराणिक कारण-

समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला तो पूरी पृथ्वी पर विष की घातकता के कारण व्याकुलता छा गयी, ऐसे में सभी देवों ने भगवान् शिव से विषपान करने की प्रार्थना की. भगवान् शिव ने जब विषपान किया तो विष के कारण उनका गला नीला होने लगा ऐसे में सभी देवों ने उनसे विष की घातकता को कम करने के लिए शीतल दूध का पान करने के लिए कहा. इसपर भी भोलेनाथ ने दूध से उनका सेवन करने की अनुमति मांगी, दूध से सहमति मिलने के बाद शिव ने उसका सेवन किया, जिससे विष का असर काफ़ी कम हो गया. बाकी बचे विष को सर्पों ने पिया. इस तरह समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष से सृष्टि की रक्षा की जा सकी.

शिव के शरीर में जाकर विष के अनिष्टकारी प्रभाव को कम करने के कारण दूध भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय है, यही कारण है कि शिवलिंग पर दूध जरूर चढ़ाया जाता है.