संस्कार का अर्थ

संस्कार भी हिन्दू सामाजिक संगठन के मूल तत्वों में से एक है। संस्कार शब्द की व्युत्पत्ति समपूर्वक ‘कुत्र’ धातु से ‘धज’ प्रत्यय करके की गई है। शब्दार्थ की दृष्टि से संस्कार का अर्थ है-शुद्धि, परिष्कार अथवा स्वच्छता । वास्तव में संस्कार का अभिप्राय उस धार्मिक कृत्य अथवा अनुष्ठान से लगाया जाता है जो मनुष्य की शुद्धि तथा उसके शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक परिष्कार के लिये किया जाता है। इस प्रकार के अनुष्ठानों का प्रमुख उद्देश्य था- व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना। संस्कारों द्वारा प्राचीन आर्य ऋषियों ने जीवन के प्रत्येक अंगों को गुणों से भरने एवं विकसित करने का सद्प्रयास किया।

संस्कार की परिभाषाएँ

कुछ विद्वानों ने संस्कार को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-

  1. राजबली पाण्डेय – “वास्तव में संस्कार व्यंजक तथा प्रतीकात्मक अनुष्ठान है। उसमें बहुत-से अभिनयात्मक उद्गार और धर्म, वैज्ञानिक मुद्रायें एवं इंगिति पाई जाती है।”
  2. गोपालकृष्ण अग्रवाल- “संस्कार वह धार्मिक विधि-विधान है जो एक माध्यम के रूप में व्यक्ति के जैविक, मानसिक और सांस्कृतिक जीवन को परिष्कृत करके उसे एक सामाजिक सांस्कृतिक प्राणी बनाने में सहायक है। यह व्यक्तित्व के क्रमिक विकास की प्रक्रिया से सम्बद्ध है तथा इसका आधार व्यक्ति की आन्तरिक क्षमताओं का ही सही मार्ग निर्देशन करना है।”
  3. रवीन्द्रनाथ मुकर्जी-“संस्कार का अर्थ उन पवित्र अनुष्ठानों से है जो शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक परिष्कार के लिए किये जाते हैं।”
  4. जैमिनी “संस्कार वह प्रक्रिया है जिसके करने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के योग्य हो जाता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि संस्कार वह धार्मिक विधि-विधान है जो व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और सांस्कृतिक जीवन को परिष्कृत करके उसे एक सामाजिक प्राणी बनने में सहायक होता है।

संस्कारों के उद्देश्य

यद्यपि संस्कारों के अनेक उद्देश्य थे। उनमें से कुछ प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है-

  1. अग्निपुराण में कहा है, “संस्कारों के द्वारा संस्कृत (आत्मिक उन्नति प्राप्त) व्यक्ति भुक्ति (भोग) और मुक्ति दोनों पाता है। सभी (शारीरिक) रोगों से मुक्त होकर मनुष्य देवता (श्रेष्ठ व्यक्ति) के समान वृद्धि प्राप्त करता है।”
  2. संस्कारों का उद्देश्य समाज के मूल्यों एवं उसकी धारणाओं की रक्षा करना था।
  3. नैतिक गुणों का विकास करना।
  4. विभिन्न संस्कारों के द्वारा अशुभ शक्तियों जैसे भूत-प्रेत से व्यक्तियों की रक्षा करना।
  5. भौतिक सुख-सुविधा में वृद्धि करना।
  6. स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ति करना।
  7. व्यक्ति की आध्यात्मिक भावना व्यक्त करना। संस्कारों का उद्देश्य संस्कार्य व्यक्ति के हित के लिए अभीष्ठ प्रभावों को आमन्त्रित कर आकर्षित करना भी रहा है।

16 संस्कारों के नाम

हिन्दुओं का सम्पूर्ण जीवन संस्कारों से घिरा हुआ है। संस्कारों का वर्णन विशेष रूप से गृहसूत्रों में देखने को मिलता है। धर्म सूत्रों तथा स्मृतियों में भी इनका वर्णन है फिर भी, हिन्दू जीवन में कितने संस्कार होते हैं एवं होने चाहिए, इस सम्बन्ध में मतभेद है। गौतम धर्मसूत्र में संस्कारों की सबसे अधिक संख्या चालीस का उल्लेख मिलता है। वैखानस्त्र गृह-सूत्र अट्ठारह संस्कारों का वर्णन करता है जबकि पारस्कर, बोधायन तथा बाराह गृहसूत्र एवं मनुस्मृति तेरह संस्कारों का उल्लेख करते हैं। वेदों में, विशेष रूप से ऋग्वेद में केवल तीन संस्कारों का उल्लेख है और वे हैं – गर्भाधान, विवाह, मृत्यु। इसके अलावा यजुर्वेद में उपनयन तथा मुण्डन संस्कारों का भी उल्लेख मिलता है। ब्राह्मण ग्रन्थों एवं उपनिषदों में संस्कारों का कोई व्यवस्थित रूप नहीं है पर इसके बाद इनकी व्यवस्थित संख्या निश्चित की जाने लगी थी। बाद में धर्मसूत्रों मैं तो संस्कारों की संख्या बढ़ाने की होड़ सी लगी प्रतीत होती है क्योंकि आश्वालयन ग्यारह, पारस्कर, बोधायन व मनुस्मृति ने तेरह जबकि गौतम धर्मसूत्र ने चालीस संस्कारों का उल्लेख किया है। ऋषि दयानन्द ने सबको समन्वित कर सोलह संस्कार निर्धारित किये हैं। हम इन्हीं प्रमुख सोलह संस्कारों का वर्णन करेंगे।

  1. गर्भाधान संस्कार- गर्भाधान के समय माता-पिता की प्रकृति, स्वास्थ्य और आचार व्यवहार का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। गर्भ धारण अथवा वीर्य का स्थापन- गर्भाशय में स्थिर करना, जिस क्रिया से होता है, उसी को गर्भाधान कहते हैं। वंश्वासन इस संस्कार को ऋतु संगम कहते हैं। इस संस्कार का उद्देश्य था सन्तान प्राप्ति ।
  2. पुंसवन- गर्भस्य वीर्य की पुष्टि के लिए यह संस्कार किया जाता है। इस संस्कार के करने से गर्भस्य शिशु पुत्र होता है। अधिकांश आचार्यों के अनुसार यह संस्कार गर्भाधान के तीसरे माह से होना चाहिए। पाराशर गृहसूत्र में कहा गया है कि दूसरे महीने में भी यह संस्कार हो सकता है। यह संस्कार पुरुषधारी नक्षत्रों में होना चाहिए। इस संस्कार के अवसर पर गर्भवती को प्रसन्नता के लिए आनन्दोत्सव का आयोजन भी किया जाता था।
  3. सीमन्तोन्नयन- इस संस्कार में पति अपनी पत्नी के केश को माँग के दोनों तरफ विभाजित कर देता है। आश्वलायन गृहसूत्र के अनुसार यह संस्कार गर्भ के चतुर्थ मास में किया जाता है। पाराशर गृहसूत्र के अनुसार इसे गर्भ के उपरांत छठे या आठवें महीने में करना चाहिए। भारतरत्न की वामन काने के अनुसार, सीमान्तोन्नयन का शाब्दिक अर्थ ऊपर की ओर मांग निकालना। यह संस्कार सामाजिकता और उत्सवप्रियता का प्रकाशन है। इसका उद्देश्य गर्भवती को प्रसन्न रखना तथा गर्भ नष्ट करने वाली चुड़ैल आदि बाधाओं को दूर करना था।
  4. जात कर्म- प्रसव के अवसर पर यह संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य है कि तीन-चार स्त्रियाँ जो कुशल हो प्रसव करने वाली स्त्री की सेवा में तल्लीन रहें ताकि उसकी वेदना कम हो और मन्त्रों के उच्चारण से अपशकुन दूर हों।
  5. नामकरण – हिन्दू संस्कृति में इस संस्कार को बहुत महत्व देते हैं और समारोहपूर्वक करते हैं। यह संस्कार बच्चों को नाम देने के समय पूरा किया जाता है। धर्मसूत्रों के अनुसार बच्चे का नामकरण दो बार होता है। प्रथम बार बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उसके माता- पिता के द्वारा गुप्त नाम दिया जाता है, जो किसी नक्षत्र के नाम पर आधारित रहता है, दूसरा नाम ग्यारहवें दिन दिया जाता है जिसका व्यवहार सभी लोग करते हैं। सूत्रकारों ने इस बात पर भी विवेचन किया है कि बालक और बालिकाओं के नाम में कितने शब्द खण्ड होने चाहिए और उनके नामों के अन्त में किस प्रकार के शब्द होने चाहिए। विभिन्न वर्णों के लिए अलग- अलग नामों के उदाहरण दिये गये हैं।
  6. निष्क्रमण – पाराशर गृहसूत्र के अनुसार जन्म के चतुर्थ मास में यह संस्कार होता है। उस समय बालक को स्नान कराकर तथा सुन्दर वस्त्र पहनाकर यज्ञवेदी के पास लाया जाता है और यज्ञ तथा हवन आदि करने के उपरांत थोड़ा-सा बाहर शुद्ध वायु में भ्रमण कराया जाता है तथा दिन में सूर्य एवं चन्द्रमा के दर्शन कराये जाते हैं।
  7. अन्नप्रासन- इस संस्कार के अनुसार शिशु को ठोस भोजन प्रथम बार दिया जाता है। अधिकांश आचार्य इस बात से सहमत हैं कि जन्म के बाद छठे महीने में अन्नप्रासन होना चाहिए। उस समय बालक को घृतयुक्त भात अथवा दही, शहद और घी तीनों को भात के साथ मिलाकर खिलाया जाता है।
  8. चूड़ाकरण – शिशु के केश को जब प्रथम बार काटा जाता है, तो उस संस्कार को चूड़ाकरण कहा गया है। इसे चूड़ाकर्सन, चौलकर्मन, चौल और चौड़ संस्कार भी कहते हैं। बच्चे के बाल सँवारने के विषय में अधिकांश सूत्रों का यही कहना है कि गौत्र, ऋषि तथा अपने परिवार प्रथा के अनुसार बाल सजाना चाहिए।
  9. कर्णवेध-यह संस्कार तीसरे या पाँचवे वर्ष में किया जाता है। कानों के बीघने से अनेक रोगों की रक्षा होना सुश्रुत संहिता में वर्णित है।
  10. उपनयन संस्कार—यह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इसे यज्ञोपवित संस्कार भी कहते हैं। भारतीय समाज के इतिहास में उपनयन शब्द का अर्थ समय-समय पर बदलता रहा है। अथर्ववेद और ब्राह्मणों के युग में उपनयन का अर्थ होता था विद्यार्थी को अपने संरक्षण में लेना। सूत्रों के काल में भी इस संस्कार का उद्देश्य विद्यार्थी को अपने संरक्षण में लेना ही है। कालान्तर में जब उपनयन की रहस्यात्मक प्रतिष्ठा बढ़ने लगी, तो लोग इसके मौलिक अर्थ को भूलने लगे तथा यह समझने लगे कि उपनयन में गायत्री मंत्र के द्वारा द्वितीय जन्म की भावना अधिक सन्निहित रहती है। उपनयन उस संस्कार को कहा जाता था। जिसके द्वारा बालक को शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु के समीप ले जाया जाता था। समय अनुसार इसकी प्रणाली बदलती गई। मौलिक अर्थ और महत्व बिल्कुल बदल गये और आज केवल तीन डोरों का ‘जनेऊ’ बनकर रह गया है। जो प्रारम्भ में यज्ञ के समय धारण करने के लिए वस्त्र था वह छोटा होता हुआ केवल तीन सूत्रों के रूप में रह गया है। पाराशर और आश्वालय गृहसूत्रों के अनुसार ब्राह्मण के बालक का उपनयन आठवें वर्ष, क्षत्रिय बालक का ग्यारह वर्ष में और वैश्य के बालक का बारहवें वर्ष में करने का आदेश है।
  11. वेदारम्भ संस्कार-गायत्री मंत्र से लेकर सांगोपांग वेदों का अध्ययन करने के लिए जो नियम धारण किया जाता है उसे वेदारम्भ संस्कार कहते हैं।
  12. समावर्तन संस्कार-समावर्तन का अर्थ है विद्यार्थी का अपने विद्यालय से घर लौट आना है। इस संस्कार के सम्पादन के अवसर पर विद्यार्थी को अभिषेक कराया जाता था। जिसका मतलब था कि वह पूर्णरूपेण वैदिक अध्ययन में दीक्षित हो चुका है। इस संस्कार को स्नान भी कहा जाता है। जो भी विद्यार्थी अपनी योग्यता से गुरु को प्रसन्न कर सकते थे, वे ही स्नान के अधिकारी माने जाते थे। सभी विद्यार्थियों को स्नान करने का अधिकार नहीं था ।
  13. विवाह संस्कार या गार्हपत्य संस्कार-गृहस्थाश्रम में प्रवेश विवाह करके होता था। प्राचीन ऋषियों ने स्त्री और पुरुष के सम्पर्क को विवाह की मर्यादा में बाँधकर सामाजिक व्यवस्था को दृढ़ किया था। वैदिक काल में वर की आयु 24 वर्ष, वधू की आयु 16 वर्ष मानी गई। स्मृतिकाल में कन्या के विवाह की आयु कम कर दी गई। ऋतु काल से पूर्व ही उसका विवाह कर देना उत्तम माना गया।
  14. वानप्रस्थ संस्कार – जीवन के तृतीय भाग में मनुष्य वानप्रस्थ में प्रवेश करता है। वह गृहस्थ आश्रम का परित्याग करके और घर के सम्पूर्ण उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर वानप्रस्थ आश्रम को स्वीकार करता था । वानप्रस्थ ग्रहण करने वाला सर्वप्रथम अग्निहोत्र करके इष्ट मित्रों और सम्बन्धियों से विदा लेकर तपोवन में चला जाता था। किन्तु वहाँ भी वह शिखासूत्र, संध्योपासन, अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मों का त्याग नहीं करता था ।
  15. सन्यास संस्कार – सन्यास आश्रम में प्रवेश करते समय कुछ संस्कार होते थे तथा केश मुण्डन आदि । अग्निहोत्र में विशेष मंत्रों के साथ आहुति देते हैं। सन्यास ग्रहण करने वाला काषाय वस्त्र धारण कर हाथ में दण्ड और भिक्षा पात्र लेता था। इसके उपरान्त वह सम्पूर्ण लोक हित की कामना करता हुआ हुआ पृथ्वी पर विचरण करता था।
  16. अन्त्येष्टी संस्कार- मृत्युपरान्त अन्त्येष्टी संस्कार किया जाता है। मृतक के शरीर को स्नान कराकर उस पर चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों का लेप कर शरीर को नवीन वस्त्र में लपेटकर श्मशान ले जाकर शव को लड़कियों की चिता पर रख कर प्रज्जवलित किया जाता है। इसके साथ ही वेद मन्त्रों का उच्चारण करते हुए आहुतियाँ दी जाती हैं और शव भस्म हो जाता है। अस्थि प्रवाह आदि अन्य क्रियायें भी इसी संस्कार से जुड़ी हैं।
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